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Global Search for JAIN Aagam & Scriptures| Scripture Name | Translated Name | Mool Language | Chapter | Section | Translation | Sutra # | Type | Category | Action |
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| Pushpika | पूष्पिका | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-४ बहुपुत्रिका |
Hindi | 8 | Sutra | Upang-10 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] जइ णं भंते! समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं पुप्फियाणं तच्चस्स अज्झयणस्स अयमट्ठे पन्नत्ते, चउत्थस्स णं भंते! अज्झयणस्स पुप्फियाणं समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं के अट्ठे पन्नत्ते?
एवं खलु जंबू! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नामं नयरे। गुणसिलए चेइए। सेणिए राया। सामी समोसढे। परिसा निग्गया।
तेणं कालेणं तेणं समएणं बहुपुत्तिया देवी सोहम्मे कप्पे बहुपुत्तिए विमाने सभाए सुहम्माए बहुपुत्तियंसि सोहासणंसि चउहिं सामानियसाहस्सीहिं चउहिं महत्तरियाहिं जहा सूरियाभे जाव भुंजमाणी विहरइ।
इमं च णं केवलकप्पं जंबुद्दीवं दीवं विउलेणं ओहिणा आभोएमाणी-आभोएमाणी Translated Sutra: भगवन् ! यदि श्रमण यावत् निर्वाणप्राप्त भगवान महावीर ने पुष्पिका के तृतीय अध्ययन का यह भाव निरूपण किया है तो भदन्त ! चतुर्थ अध्ययन का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ? हे जम्बू ! उस काल और उस समय में राजगृह नगर था। गुणशिलक चैत्य था। राजा श्रेणिक था। स्वामी का पदार्पण हुआ। परिषद् नीकली। उस काल और उस समय में सौधर्मकल्प | |||||||||
| Pushpika | पूष्पिका | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-५ पूर्णभद्र |
Hindi | 9 | Sutra | Upang-10 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] जइ णं भंते! समणेणं भगवया महावीरेणं पुप्फियाणं चउत्थस्स अज्झयणस्स अयमट्ठे पन्नत्ते, पंचमस्स णं भंते! अज्झयणस्स पुप्फियाणं समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं के अट्ठे पन्नत्ते?
एवं खलु जंबू! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नामं नयरे। गुणसिलए चेइए। सेणिए राया। सामी समोसरिए। परिसा निग्गया।
तेणं कालेणं तेणं समएणं पुण्णभद्दे देवे सोहम्मे कप्पे पुण्णभद्दे विमाने सभाए सुहम्माए पुण्णभद्दंसि सीहासनंसि चउहिं सामानियसाहस्सीहिं जहा सूरियाभे जाव बत्तीसइविहं नट्टविहिं उवदंसित्ता जाव जामेव दिसिं पाउब्भूए तामेव दिसिं पडिगए। कूडागारसाला। पुव्वभवपुच्छा।
एवं खलु Translated Sutra: भगवन् ! यदि श्रमण यावत् निर्वाणप्राप्त भगवान महावीर ने पुष्पिका नामक उपांग के चतुर्थ अध्ययन का यह भाव प्रतिपादन किया है तो भगवन् ! पंचम अध्ययन का क्या अर्थ कहा है ? आयुष्मन् जम्बू ! उस काल और उस समय राजगृह नगर था। गुणशिलक चैत्य था। श्रेणिक राजा था। स्वामी पधारे। परिषद् दर्शन करने नीकली। उस काल और उस समय | |||||||||
| Pushpika | पूष्पिका | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ माणिभद्र |
Hindi | 10 | Sutra | Upang-10 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] जइ णं भंते! समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं पुप्फियाणं पंचमस्स अज्झयणस्स अयमट्ठे पन्नत्ते, छट्ठस्स णं भंते! अज्झयणस्स पुप्फियाणं समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं के अट्ठे पन्नत्ते?
एवं खलु जंबू! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नयरे। गुणसिलए चेइए। सेणिय राया। सामी समोसरिए।
तेणं कालेणं तेणं समएणं माणिभद्दे देवे सभाए सुहम्माए माणिभद्दंसि सीहासनंसि चउहिं सामानियसाहस्सीहिं जहा पुण्णभद्दो तहेव आगमनं नट्टविही पुव्वभवपुच्छा। मणिवई नयरी, माणि-भद्दे गाहावई, थेराणं अंतिए पव्वज्जा, एक्कारस अंगाइं अहिज्जइ, बहूइं वासाइं परियाओ, मासिया संलेहणा, सट्ठिं भत्ताइं, Translated Sutra: भगवन् ! यदि श्रमण यावत् निर्वाणप्राप्त भगवान् ने पुष्पिका के पंचम अध्ययन का यह आशय कहा है तो इसके षष्ठ अध्ययन का क्या अर्थ बताया है ? आयुष्मन् जम्बू ! उस काल और उस समय राजगृह नगर था। गुण – शिलक चैत्य था। राजा श्रेणिक था। महावीर स्वामी का पदार्पण हुआ। मणिभद्र देव सुधर्मासभा के मणिभद्र सिंहासन पर बैठकर यावत् | |||||||||
| Pushpika | पूष्पिका | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-७ थी १० |
Hindi | 11 | Sutra | Upang-10 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] एवं दत्ते ७, सिवे ८, बले ९, अनाढिए १०, सव्वे जहा पुण्णभद्दे देवे।
दो सागरोवमाइं ठिई।
विमाना देवसरिनामा।
पुव्वभवे दत्ते चंदनानामाए, सिवे मिहिलाए बले हत्थिपुरे नयरे, अनाढिए काकंदीए।
चेइयाइं–जहा संगहणीए। Translated Sutra: इसी प्रकार दत्त, शिव, बल और अनादृत, इन सभी देवों को पूर्णभद्र देव के समान जानना। सभी की दो – दो सागरोपम की स्थिति है। इन देवों के नाम के समान ही इनके विमानों के नाम हैं। पूर्वभव में दत्त चन्दना नगरी में, शिव मिथिला, बल हस्तिनापुर और अनादृत काकन्दी नगरी में जन्मे थे। | |||||||||
| Pushpika | પૂષ્પિકા | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-१ चंद्र |
Gujarati | 3 | Sutra | Upang-10 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] जइ णं भंते! समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं पुप्फियाणं दस अज्झयणा पन्नत्ता, पढमस्स णं भंते! अज्झयणस्स पुप्फियाणं समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं के अट्ठे पन्नत्ते?
एवं खलु जंबू! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नामं नयरे। गुणसिलए चेइए। सेणिए राया।
तेणं कालेणं तेणं समएणं सामी समोसढे। परिसा निग्गया।
तेणं कालेणं तेणं समएणं चंदे जोइसिंदे जोइसराया चंदवडिंसए विमाने सभाए सुहम्माए चंदंसि सीहासणंसि चउहिं सामानियसाहस्सीहिं जाव विहरइ।
इमं च णं केवलकप्पं जंबुद्दीवं दीवं विउलेणं ओहिणा आभोएमाणे-आभोएमाणे पासइ, पच्छा समणं भगवं महावीरं जहा सूरियाभे आभियोगं Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧ | |||||||||
| Pushpika | પૂષ્પિકા | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-३ शुक्र |
Gujarati | 5 | Sutra | Upang-10 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] जइ णं भंते! समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं पुप्फियाणं दोच्चस्स अज्झयणस्स अयमट्ठे पन्नत्ते, तच्चस्स णं भंते! अज्झयणस्स पुप्फियाणं समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं के अट्ठे पन्नत्ते?
एवं खलु जंबू! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नयरे। गुणसिलए चेइए। सेणिए राया। सामी समोसढे। परिसा निग्गया।
तेणं कालेणं तेणं समएणं सुक्के महग्गहे सुक्कवडिंसए विमाने सुक्कंसि सीहासनंसि चउहिं सामानियसाहस्सीहिं जहेव चंदो तहेव आगओ, नट्टविहिं उवदंसित्ता पडिगओ।
भंते! त्ति भगवं गोयमे समणं भगवं महावीरं पुच्छा। कूडागारसाला दिट्ठंतो।
एवं खलु गोयमा! तेणं कालेणं तेणं समएणं वाणारसी Translated Sutra: સૂત્ર– ૫. ભગવન્ ! જો નિર્વાણ પ્રાપ્ત શ્રમણ ભગવંત મહાવીરે પુષ્પિકા ઉપાંગના બીજા અધ્યયનનો આ અર્થ કહ્યો છે તો, ભગવંત મહાવીરે ત્રીજા અધ્યયનનો શો અર્થ કહ્યો છે ? હે જમ્બૂ ! તે કાળે રાજગૃહ નામે નગર હતું, ગુણશીલ નામે ચૈત્ય હતું, ત્યાં શ્રેણિક નામે રાજા હતો. કોઈ દિવસે ભગવંત મહાવીર સ્વામી સમોસર્યા, દર્શનાર્થે પર્ષદા | |||||||||
| Pushpika | પૂષ્પિકા | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-३ शुक्र |
Gujarati | 7 | Sutra | Upang-10 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] महुणा य घएण य तंदुलेहि य अग्गिं हुणइ, चरुं साहेइ, साहेत्ता बलिं वइस्सदेवं करेइ, करेत्ता अतिहिपूयं करेइ, करेत्ता तओ पच्छा अप्पणा आहारं आहारेइ।
तए णं से सोमिले माहणरिसी दोच्चं छट्ठक्खमणं उवसंपज्जित्ताणं विहरइ।
तए णं से सोमिले माहणरिसी दोच्चछट्ठक्खमणपारणगंसि आयावणभूमीओ पच्चोरुहइ, पच्चोरुहित्ता वागलवत्थनियत्थे जेणेव सए उडए तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता किढिणसंकाइयं गेण्हइ, गेण्हित्ता दाहिणं दिसिं पोक्खेइ, दाहिणाए दिसाए जमे महाराया पत्थाणे पत्थियं अभिरक्खउ सानिलमाहणरिसिंअभिरक्खउ सोमिलमाहणरिसिं, जाणि य तत्थ कंदाणि य मूलाणि य तयाणि य पत्ताणि य पुप्फाणि Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૫ | |||||||||
| Pushpika | પૂષ્પિકા | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-४ बहुपुत्रिका |
Gujarati | 8 | Sutra | Upang-10 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] जइ णं भंते! समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं पुप्फियाणं तच्चस्स अज्झयणस्स अयमट्ठे पन्नत्ते, चउत्थस्स णं भंते! अज्झयणस्स पुप्फियाणं समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं के अट्ठे पन्नत्ते?
एवं खलु जंबू! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नामं नयरे। गुणसिलए चेइए। सेणिए राया। सामी समोसढे। परिसा निग्गया।
तेणं कालेणं तेणं समएणं बहुपुत्तिया देवी सोहम्मे कप्पे बहुपुत्तिए विमाने सभाए सुहम्माए बहुपुत्तियंसि सोहासणंसि चउहिं सामानियसाहस्सीहिं चउहिं महत्तरियाहिं जहा सूरियाभे जाव भुंजमाणी विहरइ।
इमं च णं केवलकप्पं जंबुद्दीवं दीवं विउलेणं ओहिणा आभोएमाणी-आभोएमाणी Translated Sutra: ભગવન્ ! જો નિર્વાણ પ્રાપ્ત શ્રમણ ભગવંત મહાવીરે પુષ્પિકા ઉપાંગના ત્રીજા અધ્યયનનો આ અર્થ કહ્યો છે તો, ભગવંત મહાવીરે ચોથા અધ્યયનનો શો અર્થ કહ્યો છે ? નિશ્ચે હે જંબૂ! તે કાળે તે સમયે રાજગૃહ નામે નગર હતુ, ગુણશીલ નામે ચૈત્ય હતુ, શ્રેણિક નામે રાજા હતો. ભગવંત મહાવીર સ્વામી સમોસર્યા, પર્ષદા દર્શનાર્થે નીકળી. તે કાળે | |||||||||
| Pushpika | પૂષ્પિકા | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-५ पूर्णभद्र |
Gujarati | 9 | Sutra | Upang-10 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] जइ णं भंते! समणेणं भगवया महावीरेणं पुप्फियाणं चउत्थस्स अज्झयणस्स अयमट्ठे पन्नत्ते, पंचमस्स णं भंते! अज्झयणस्स पुप्फियाणं समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं के अट्ठे पन्नत्ते?
एवं खलु जंबू! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नामं नयरे। गुणसिलए चेइए। सेणिए राया। सामी समोसरिए। परिसा निग्गया।
तेणं कालेणं तेणं समएणं पुण्णभद्दे देवे सोहम्मे कप्पे पुण्णभद्दे विमाने सभाए सुहम्माए पुण्णभद्दंसि सीहासनंसि चउहिं सामानियसाहस्सीहिं जहा सूरियाभे जाव बत्तीसइविहं नट्टविहिं उवदंसित्ता जाव जामेव दिसिं पाउब्भूए तामेव दिसिं पडिगए। कूडागारसाला। पुव्वभवपुच्छा।
एवं खलु Translated Sutra: ભગવન્ ! જો નિર્વાણ પ્રાપ્ત શ્રમણ ભગવંત મહાવીરે પુષ્પિકા ઉપાંગના ચોથા અધ્યયનનો આ અર્થ કહ્યો છે તો, ભગવંત મહાવીરે પાંચમાં અધ્યયનનો શો અર્થ કહ્યો છે ? હે જંબૂ ! તે કાળે તે સમયે, રાજગૃહ નામે નગર હતું, ગુણશીલ નામે ચૈત્ય હતું, શ્રેણિક નામેરાજા હતો. ભગવંત મહાવીરસ્વામી પધાર્યા, પર્ષદા દર્શનાર્થે નીકળી, તે કાળે તે સમયે | |||||||||
| Pushpika | પૂષ્પિકા | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ माणिभद्र |
Gujarati | 10 | Sutra | Upang-10 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] जइ णं भंते! समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं पुप्फियाणं पंचमस्स अज्झयणस्स अयमट्ठे पन्नत्ते, छट्ठस्स णं भंते! अज्झयणस्स पुप्फियाणं समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं के अट्ठे पन्नत्ते?
एवं खलु जंबू! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नयरे। गुणसिलए चेइए। सेणिय राया। सामी समोसरिए।
तेणं कालेणं तेणं समएणं माणिभद्दे देवे सभाए सुहम्माए माणिभद्दंसि सीहासनंसि चउहिं सामानियसाहस्सीहिं जहा पुण्णभद्दो तहेव आगमनं नट्टविही पुव्वभवपुच्छा। मणिवई नयरी, माणि-भद्दे गाहावई, थेराणं अंतिए पव्वज्जा, एक्कारस अंगाइं अहिज्जइ, बहूइं वासाइं परियाओ, मासिया संलेहणा, सट्ठिं भत्ताइं, Translated Sutra: ભગવન્ ! જો નિર્વાણ પ્રાપ્ત શ્રમણ ભગવંત મહાવીરે પુષ્પિકા ઉપાંગના ચોથા અધ્યયનનો આ અર્થ કહ્યો છે તો, ભગવંત મહાવીરે પાંચમાં અધ્યયનનો શો અર્થ કહ્યો છે ? હે જંબૂ ! તે કાળે૦ રાજગૃહ નામે નગર હતું, ગુણશીલ નામે ચૈત્ય હતું, શ્રેણિક નામે રાજા હતો. ભગવંત મહાવીરસ્વામી પધાર્યા. તે કાળે તે સમયે માણિભદ્ર દેવ સુધર્માસભામાં | |||||||||
| Pushpika | પૂષ્પિકા | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-७ थी १० |
Gujarati | 11 | Sutra | Upang-10 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] एवं दत्ते ७, सिवे ८, बले ९, अनाढिए १०, सव्वे जहा पुण्णभद्दे देवे।
दो सागरोवमाइं ठिई।
विमाना देवसरिनामा।
पुव्वभवे दत्ते चंदनानामाए, सिवे मिहिलाए बले हत्थिपुरे नयरे, अनाढिए काकंदीए।
चेइयाइं–जहा संगहणीए। Translated Sutra: એ પ્રમાણે દત્ત, શિવ, બલ, અનાદૃત એ ચારે પૂર્ણભદ્ર દેવની સમાન જાણવું. બધાની બે સાગરોપમ સ્થિતિ. વિમાનોના નામો દેવો સદૃશ છે. પૂર્વભવમાં દત્ત – ચંદનામાં, શિવ – મિથિલામાં, બલ – હસ્તિનાપુરમાં, અનાદૃત – કાકંદી નગરીમાં ઉત્પન્ન થયા. બધા મહાવિદેહે મોક્ષે જશે. | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Hindi | 5 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तेणं कालेणं तेणं समएणं सूरियाभे देवे सोहम्मे कप्पे सूरियाभे विमाने सभाए सुहम्माए सूरियाभंसि सीहासनंसि चउहिं सामानियसाहस्सीहिं, चउहिं अग्गमहिसीहिं सपरिवाराहिं, तिहिं परिसाहिं, सत्तहिं अनिएहिं, सत्तहिं अनियाहिवईहिं, सोलसहिं आयरक्खदेवसाहस्सीहिं, अन्नेहिं बहूहिं सूरियाभ-विमानवासीहिं वेमानिएहिं देवेहिं देवीहिं य सद्धिं संपरिवुडे महयाहयनट्ट गीय वाइय तंती तल ताल तुडिय घन मुइंग पडुप्पवादियरवेणं दिव्वाइं भोगभोगाइं भुंजमाणे विहरति, इमं च णं केवलकप्पं जंबुद्दीवं दीवं विउलेणं ओहिणा आभोएमाणे-आभोएमाणे पासति।
तत्थ समणं भगवं महावीरं जंबुद्दीवे (दीवे?) भारहे Translated Sutra: उस काल उस समय में सूर्याभ नामक देव सौधर्म स्वर्ग में सूर्याभ नामक विमान की सुधर्मा सभा में सूर्याभ सिंहासन पर बैठकर चार हजार सामानिक देवों, सपरिवार चार अग्रमहिषियों, तीन परिषदाओं, सात अनीकों, सात अनीकाधिपतियों, सोलह हजार आत्मरक्षक देवों तथा और बहुत से सूर्याभ विमानवासी वैमानिक देवदेवियों सहित अव्याहत निरन्तर | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Hindi | 10 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं ते आभिओगिया देवा समणेणं भगवया महावीरेणं एवं वुत्ता समाणा हट्ठतुट्ठ-चित्तमानंदिया पीइमणा परमसोमनस्सिया हरिसवसविसप्पमाणहियया समणं भगवं महावीरं वंदंति नमंसंति, वंदित्ता नमंसित्ता उत्तरपुरत्थिम दिसीभागं अवक्कमंति, अवक्कमित्ता वेउव्वियसमुग्घाएणं समोहण्णंति, समोहणित्ता संखेज्जाइं जोयणाइं दंडं निसिरंति, तं जहा–रयनाणं वइराणं वेरुलियाणं लोहियक्खाणं मसारगल्लाणं हंसगब्भाणं पुलगाणं सोगंधियाणं जोईरसाणं अंजनाणं अंजनं-पुलगाणं रयनाणं जायरूवाणं अंकाणं फलिहाणं रिट्ठाणं अहाबायरे पोग्गले परिसाडेंति, परिसाडेत्ता अहासुहुमे पोग्गले परियायंति, परियाइत्ता Translated Sutra: तदनन्तर श्रमण भगवान महावीर के इस कथन को सूनकर उन आभियोगिक देवों ने हर्षित यावत् विकसितहृदय होकर भगवान महावीर को वन्दन – नमस्कार किया। वे उत्तर – पूर्व दिग्भाग में गए। वहाँ जाकर उन्होंने वैक्रिय समुद्घात किया और संख्यात योजन का दण्ड बनाया जो कर्केतन यावत् रिष्टरत्नमय था और उन रत्नों के यथाबादर पुद्गलों | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Hindi | 11 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से सूरियाभे देवे तेसिं आभिओगियाणं देवाणं अंतिए एयमट्ठं सोच्चा निसम्म हट्ठतुट्ठ चित्तमानंदिए पीइमने परमसोमनस्सिए हरिसवस विसप्पमाणहियए पायत्ताणियाहिवइं देवं सद्दावेति, सद्दावेत्ता एवं वयासी– खिप्पामेव भो! देवानुप्पिया! सूरियाभे विमाने सभाए सुहम्माए मेघोघरसियगभीरमहुरसद्दं जोयणपरिमंडल सूसरं घंटं तिक्खुत्तो उल्लालेमाणे-उल्लालेमाणे महया-महया सद्देणं उग्घोसेमाणे-उग्घोसेमाणे एवं वयाहि–
आणवेइ णं भो! सूरियाभे देवे, गच्छति णं भो! सूरियाभे देवे जंबुद्दीवे दीवे भारहे वासे आमलकप्पाए नयरीए अंबसालवने चेइए समणं भगवं महावीरं अभिवंदए, तुब्भेवि णं भो! देवानुप्पिया! Translated Sutra: आभियोगिक देवों से इस अर्थ को सूनने के पश्चात् सूर्याभदेव ने हर्षित, सन्तुष्ट यावत् हर्षातिरेक से प्रफुल्ल हृदय हो पदाति – अनीकाधिपति को बुलाया और बुलाकर कहा – हे देवानुप्रिय ! तुम शीघ्र ही सूर्याभ विमान की सुधर्मा सभा में स्थित मेघसमूह जैसी गम्भीर मधुर शब्द करने वाली एक योजन प्रमाण गोलाकार सुस्वर घंटा | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Hindi | 12 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से पायत्ताणियाहिवती देवे सूरियाभेणं देवेणं एवं वुत्ते समाणे हट्ठतुट्ठ-चित्तमानंदिए पीइमने परमसोमनस्सिए हरिसवसविसप्पमाणहियए करयलपरिग्गहियं दसनहं सिरसावत्तं मत्थए अंजलिं कट्टु एवं देवो! तहत्ति आणाए विनएणं वयणं पडिसुणेंति, पडिसुणेत्ता जेणेव सूरियाभे विमाने जेणेव सभा सुहम्मा जेणेव मेघोघरसिय-गंभीरमहुरसद्दा जोयणपरिमंडला सुस्सरा घंटा तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता तं मेघोघरसियगंभीरमहुरसद्दं सूसरं घंटं तिक्खुत्तो उल्लालेति।
तए णं तीसे मेघोघरसियगंभीरमहुरसद्दाए जोयणपरिमंडलाए सूसराए घंटाए तिक्खुत्तो उल्लालियाए समाणीए से सूरियाभे विमाने पासायविमान-निक्खुडावडियसद्दघंटापडिसुया-सयसहस्ससंकुले Translated Sutra: तदनन्तर सूर्याभदेव द्वारा इस प्रकार से आज्ञापित हुआ वह पदात्यनीकाधिपति देव सूर्याभदेव की इस आज्ञा को सूनकर हृष्ट – तुष्ट यावत् प्रफुल्ल – हृदय हुआ और विनयपूर्वक आज्ञावचनों को स्वीकार करके सूर्याभ विमान में जहाँ सुधर्मा सभा थी और उसमें भी जहाँ मेघमालवत् गम्भीर मधुर ध्वनि करने वाली योजन प्रमाण गोल सुस्वर | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Hindi | 13 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं ते सूरियाभविमानवासिणो बहवे वेमाणिया देवा य देवीओ य पायत्ताणियाहिवइस्स देवस्स अंतिए एयमट्ठं सोच्चा निसम्म हट्ठतुट्ठचित्तमानंदिया पीइना परमसोमनस्सिया हरिसवस विसप्प-माणहियया अप्पेगइया वंदनवत्तियाए अप्पेगइया पूयणवत्तियाए अप्पेगइया सक्कारवत्तियाए अप्पेगइया सम्मानवत्तियाए अप्पेगइया कोऊहलवत्तियाए अप्पेगइया असुयाइं सुणिस्सामो, अप्पेग-इया सुयाइं अट्ठाइं हेऊइं पसिणाइं कारणाइं वागरणाइं पुच्छिस्सामो, अप्पेगइया सूरियाभस्स देवस्स वयणमनुयत्तेमाणा अप्पेगइया अन्नमन्नमनुवत्तेमाणा अप्पेगइया जिनभतिरागेणं अप्पेगइया धम्मो त्ति अप्पेगइया जीयमेयं Translated Sutra: तदनन्तर पदात्यनीकाधिपति देव से इस बात को सूनकर सूर्याभविमानवासी सभी वैमानिक देव और देवियाँ हर्षित, सन्तुष्ट यावत् विकसितहृदय हो, कितने वन्दना करने के विचार से, कितने पर्युपासना की आकांक्षा से, कितने सत्कार की भावना से, कितने सम्मान की ईच्छा से, कितने जिनेन्द्र भगवान प्रति कुतूहलजनित भक्ति – अनुराग से, कितने | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Hindi | 14 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से सूरियाभे देवे ते सूरियाभविमानवासिणो बहवे वेमाणिया देवा य देवीओ य सव्विड्ढीए जाव अकालपरिहीनं चेव अंतियं पाउब्भवमाणे पासति, पासित्ता हट्ठतुट्ठ चित्तमानंदिए पीइमने परम-सोमनस्सिए हरिसवसविसप्पमाणहियए आभिओगियं देवं सद्दावेति, सद्दावेत्ता एवं वयासी–
खिप्पामेव भो! देवानुप्पिया! अनेगखंभसयसन्निविट्ठं लीलट्ठियसालभंजियागं ईहामिय उसभ तुरग नर मगर विहग वालग किन्नर रुरु सरभ चमर कुंजर वनलय पउमलयभत्तिचित्तं खंभुग्गय वइरवेइया परिगयाभिरामं विज्जाहर जमलजुयल जंतजुत्तं पिव अच्चीसहस्समालणीयं रूवग-सहस्सकलियं भिसमाणं भिब्भिसमाणं चक्खुल्लोयणलेसं सुहफासं Translated Sutra: इसके पश्चात् विलम्बि किये बिना उन सभी सूर्याभविमानवासी देवों और देवियों को अपने सामने उपस्थित देखकर हृष्ट – तुष्ट यावत् प्रफुल्लहृदय हो सूर्याभदेव ने अपने आभियोगिक देव को बुलाया और बुलाकर उससे इस प्रकार कहा – हे देवानुप्रिय ! तुम शीघ्र ही अनेक सैकड़ों स्तम्भों पर संनिविष्ट एक यान की विकुर्वणा करो। जिसमें | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Hindi | 15 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से आभिओगिए देवे सूरियाभेणं देवेणं एवं वुत्ते समाणे हट्ठतुट्ठ चित्तमानंदिए पीइमने परमसोमनस्सिए हरिसवस विसप्पमाणहियए करयलपरिग्गहियं दसनहं सिरसावत्तं मत्थए अंजलिं कट्टु एवं देवो! तहत्ति आणाए विनएणं वयणं पडिसुणेइ, पडिसुणित्ता उत्तरपुरत्थिमं दिसीभागं अवक्कमंति, अवक्कमित्ता वेउव्वियसमुग्घाएणं समोहण्णइ, समोहणित्ता संखेज्जाइं जोयणाइं दंडं निसिरति, तं जहा–रयनाणं वइराणं वेरुलियाणं लोहियक्खाणं मसारगल्लाणं हंसगब्भाणं पुलगाणं सोगंधियाणं जोईरसाणं अंजनाणं अंजनंपुलगाणं रययाणं जायरूवाणं अंकाणं फलिहाणं रिट्ठाणं अहाबायरे पोग्गले परिसाडेइ, परिसाडित्ता Translated Sutra: तदनन्तर वह आभियोगिक देव सूर्याभदेव द्वारा इस प्रकार का आदेश दिये जाने पर हर्षित एवं सन्तुष्ट हुआ यावत् प्रफुल्ल हृदय हो दोनों हाथ जोड़ यावत् आज्ञा को सूना यावत् उसे स्वीकार करके वह ईशानकोण में आया। वहाँ आकर वैक्रिय समुद्घात किया और संख्यात योजन ऊपर – नीचे लंबे दण्ड बनाया यावत् यथाबादर पुद्गलों को | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Hindi | 16 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से सूरियाभे देवे आभियोगस्स देवस्स अंतिए एयमट्ठं सोच्चा निसम्म हट्ठतुट्ठ चित्तमानंदिए पीइमने परमसोमनस्सिए हरिसवस विसप्पमाणहियए दिव्वं जिणिंदाभिगमनजोग्गं उत्तरवेउव्वियरूवं विउव्वति, विउव्वित्ता चउहिं अग्गमहिसीहिं सपरिवाराहि, दोहिं अनिएहिं, तं जहा–गंधव्वाणिएण य नट्ठाणिएण य सद्धिं संपरिवुडे तं दिव्वं जाणविमानं अनुपयाहिणी-करेमाणे पुरत्थिमिल्लेणं तिसोमाणपडिरूवएणं दुरुहति, दुरुहित्ता जेणेव सीहासने तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सीहासन-वरगए पुरत्थाभिमुहे सन्निसण्णे।
तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स चत्तारि सामानियसाहस्सीओ तं दिव्वं जाणविमानं Translated Sutra: तदनन्तर आभियोगिक देव ने उस सिंहासन के पश्चिमोत्तर, उत्तर और उत्तर पूर्व दिग्भाग में सूर्याभदेव के चार हजार सामानिक देवों के बैठने के लिए चार हजार भद्रासनों की रचना की। पूर्व दिशा में सूर्याभदेव की परिवार सहित चार अग्र महिषियों के लिए चार हजार भद्रासनों की रचना की। दक्षिणपूर्व दिशा में सूर्याभदेव की आभ्यन्तर | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Hindi | 17 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से सूरियाभे देवे तेणं पंचाणीयपरिखित्तेणं वइरामयवट्ट लट्ठ संठिय सुसिलिट्ठ परिघट्ठ मट्ठ सुपतिट्ठिएणं विसिट्ठेणं अनेगवरपंचवण्णकुडभी सहस्सपरिमंडियाभिरामेणं वाउद्धुयविजयवेजयंती-पडागच्छत्तातिच्छत्तकलिएणं तुंगेणं गगनतलमनुलिहंतसिहरेणं जोयणसहस्समूसिएणं महतिमहा-लतेणं महिंदज्झएणं पुरतो कड्ढिज्जमाणेणं चउहिं सामानियसाहस्सीहिं, चउहिं अग्गमहिसीहिं सपरिवाराहिं, तिहिं परिसाहिं, सत्तहिं अनिएहिं सत्तहिं अनियाहिवईहिं सोलसहिं आयरक्ख देवसाहस्सीहिं अन्नेहि य बहूहिं सूरियाभविमानवासीहिं वेमाणिएहिं देवीहि य सद्धिं संपरिवुडे सव्विड्ढीए जाव नाइयरवेणं Translated Sutra: तत्पश्चात् पाँच अनीकाधिपतियों द्वारा परिरक्षित वज्ररत्नमयी गोल मनोज्ञ संस्थान वाले यावत् एक हजार योजन लम्बे अत्यंत ऊंचे महेन्द्रध्वज को आगे करके वह सूर्याभदेव चार हजार सामानिक देवों यावत् सोलह हजार आत्मरक्षक देवों एवं सूर्याभविमान वासी और दूसरे वैमानिक देव – देवियों के साथ समस्त ऋद्धि यावत् वाद्यनिनादों | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Hindi | 25 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से सूरियाभे देवे तं दिव्वं देविड्ढिं दिव्वं देवजुइं दिव्वं देवानुभावं पडिसाहरइ, पडिसाहरेत्ता खणेणं जाते एगे एगभूए।
तए णं से सूरियाभे देवे समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेइ वंदति नमंसति, वंदित्ता नमंसित्ता नियगपरिवालसद्धिं संपरिवुडे तमेव दिव्वं जाणविमानं दुरुहति, दुरुहित्ता जामेव दिसिं पाउब्भूए तामेव दिसिं पडिगए। Translated Sutra: तत्पश्चात् उस सूर्याभदेव ने अपनी सब दिव्य देवऋद्धि, दिव्य देवद्युति और दिव्य देवानुभाव को समेट लिया और क्षणभर में एकाकी बन गया। इसके बाद सूर्याभदेव ने श्रमण भगवान महावीर को तीन बार प्रदक्षिणा की, वन्दन – नमस्कार किया। अपने पूर्वोक्त परिवार सहित जिस यान से आया था उसी दिव्य – यान पर आरूढ़ हुआ। जिस दिशा से आया | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Hindi | 27 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] कहिं णं भंते! सूरियाभस्स देवस्स सूरियाभे नामं विमाने पन्नत्ते? गोयमा! जंबुद्दीवे दीवे मंदरस्स पव्वयस्स दाहिणेणं इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए बहुसमरमणिज्जातो भूमिभागातो उड्ढं चंदिम सूरिय गहगण नक्खत्त तारारूवाणं पुरओ बहूइं जोयणाइं बहूइं जोयणसयाइं बहूइं जोयणसहस्साइं बहूइं जोयणसयसहस्साइं बहुईओ जोयणकोडीओ बहुईओ जोयणकोडाकोडीओ उड्ढं दूरं वीतीवइत्ता, एत्थ णं सोहम्मे नामं कप्पे पन्नत्ते–पाईणपडीणायते उदीणदाहिणवित्थिण्णे अद्धचंदसंठाणसंठिते अच्चिमालिभासरासिवण्णाभे, असंखेज्जाओ जोयणकोडाकोडीओ आयामविक्खंभेणं, असंखे-ज्जाओ जोयणकोडाकोडीओ परिक्खेवेणं, सव्वरयणामए Translated Sutra: हे भगवन् ! उस सूर्याभदेव का सूर्याभ नामक विमान कहाँ पर कहा है ? हे गौतम ! जम्बूद्वीप के मन्दर पर्वत से दक्षिण दिशा में इस रत्नप्रभा पृथ्वी के रमणीय समतल भूभाग से ऊपर ऊर्ध्वदिशा में चन्द्र, सूर्य, ग्रहगण, नक्षत्र और तारा – मण्डल से आगे भी ऊंचाई में बहुत से सैकड़ों योजनों, हजारों योजनों, लाखों, करोड़ों योजनों और सैकड़ों | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Hindi | 30 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] सूरियाभे णं विमाने एगमेगे दारे अट्ठसयं चक्कज्झयाणं, एवं मिगज्झयाणं गरुडज्झयाणं रुच्छज्झयाणं छत्तज्झयाणं पिच्छज्झयाणं सउणिज्झयाणं सीहज्झयाणं, उसभज्झयाणं, अट्ठसयं सेयाणं चउ विसानाणं नागवरकेऊणं।
एवामेव सपुव्वावरेणं सूरियाभे विमाने एगमेगे दारे असीयं असीयं केउसहस्सं भवति इति मक्खायं।
तेसि णं दाराणं एगमेगे दारे पण्णट्ठिं-पण्णट्ठिं भोमा पन्नत्ता। तेसि णं भोमाणं भूमिभागा उल्लोया य भाणियव्वा तेसि णं भोमाणं बहुमज्झदेसभाए जाणि तेत्तीसमाणि भोमाणि । तेसि णं भोमाणं बहुमज्झदेसभागे पत्तेयं पत्तेयं सीहासने पन्नत्ते? सीहासनवण्णओ सपरिवारो। अवसेसेसु भोमेसु Translated Sutra: सूर्याभ विमान के प्रत्येक द्वार के ऊपर चक्र, मृग, गरुड़, छत्र, मयूरपिच्छ, पक्षी, सिंह, वृषभ, चार दाँत वाले श्वेत हाथी और उत्तम नाग के चित्र से अंकित एक सौ आठ ध्वजाएं फहरा रही हैं। इस तरह सब मिलाकर एक हजार अस्सी ध्वजाएं उस सूर्याभ विमान के प्रत्येक द्वार पर फहरा रही हैं – ऐसा तीर्थंकर भगवंतों ने कहा है। उन द्वारों | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Hindi | 32 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तेसि णं वनसंडाणं तत्थ तत्थ देसे तहिं तहिं बहूओ खुड्डाखुड्डियाओ वावीओ पुक्खरिणीओ दीहियाओ गुंजालियाओ सरसीओ सरपंतियाओ सरसरपंतियाओ बिलपंतियाओ अच्छाओ सण्हाओ रययामयकूलाओ समतीराओ वयरामयपासाणाओ तवणिज्जतलाओ सुवण्ण सुज्झ रयय वालुयाओ वेरुलिय मणि फालिय पडल पच्चोयडाओ सुओयार सुउत्ताराओ नानामणितित्थ सुबद्धाओ चाउक्कोणाओ आनुपुव्वसुजायवप्पगंभीरसीयलजलाओ संछन्नपत्तभिस मुणालाओ बहुउप्पल कुमुय नलिन सुभग सोगंधिय पोंडरीय सयवत्त सहस्सपत्त केसरफुल्लोवचियाओ छप्पयपरि-भुज्जमाणकमलाओ अच्छविमलसलिलपुण्णाओ पडिहत्थभमंतमच्छकच्छभ अनेगसउणमिहुणग-पविचरिताओ पत्तेयं-पत्तेयं Translated Sutra: उन वनखण्डों में जहाँ – तहाँ स्थान – स्थान पर अनेक छोटी – छोटी चौरस वापिकाएं – बावड़ियाँ, गोल पुष्करिणियाँ, दीर्घिकाएं, गुंजालिकाएं, फूलों से ढंकी हुई सरोवरों की पंक्तियाँ, सर – सर पंक्तियाँ एवं कूपपंक्तियाँ बनी हुई हैं। इन सभी वापिकाओं आदि का बाहरी भाग स्फटिमणिवत् अतीव निर्मल, स्निग्ध है। इनके तट रजत – मय | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Hindi | 33 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तेसि णं वनसंडाणं बहुमज्झदेसभाए पत्तेयं-पत्तेयं पासायवडेंसगा पन्नत्ता। ते णं पासायवडेंसगा पंच जोयणसयाइं उड्ढं उच्चत्तेणं, अड्ढाइज्जाइं जोयणसयाइं विक्खंभेणं अब्भुग्गयमूसिय-पहसिया इव तहेव बहुसमरमणिज्जभूमिभागो उल्लोओ सीहासनं सपरिवारं। तत्थं णं चत्तारि देवा महिड्ढिया महज्जुइया महाबला महायसा महासोक्खा महानुभागा पलिओवमट्ठितीया परिवसंति, तं जहा–असोए सत्तपण्णे चंपए चूए।
सूरियाभस्स णं देवविमानस्स अंतो बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पन्नत्ते जाव तत्थ णं बहवे वेमाणिया देवा य देवीओ य आसयंति सयंति चिट्ठंति निसीयंति तुयट्टंति, हसंति रमंति ललंति कीलंति कित्तंति Translated Sutra: उन वनखण्डों के मध्यातिमध्य भाग में एक – एक प्रासादावतंसक हैं। ये प्रासादावतंसक पाँच सौ योजन ऊंचे और अढ़ाई सौ योजन चौड़े हैं और अपनी उज्ज्वल प्रभा से हँसते हुए से प्रतीत होते हैं। इनका भूमिभाग अतिसम एवं रमणीय है। इनके चंदेवा, सामानिक आदि देवों के भद्रासनों सहित सिंहासन आदि का वर्णन पूर्ववत् इन प्रासादावतंसकों | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Hindi | 34 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] से णं एगाए पउमवरवेइयाए एगेण य वनसंडेण सव्वओ समंता संपरिखित्ते। सा णं पउमवरवेइया अद्धजोयणं उड्ढं उच्चत्तेणं, पंच धणुसयाइं विक्खंभेणं, उवकारियलेणसमा परिक्खेवेणं।
तीसे णं पउमवरवेइयाए इमेयारूवे वण्णावासे पन्नत्ते, तं जहा–वइरामया नेमा रिट्ठामया पइट्ठाणा वेरुलियामया खंभा सुवण्णरुप्पामया फलगा लोहितक्खमईयो सूईओ वइरामया संधी नानामणिमया कलेवरा नानामणिमया कलेवरसंघाडगा नानामणिमया रूवा नानामणिमया रूव-संघाडगा अंकामया पक्खा पक्खबाहाओ, जोईरसमया वंसा वंसकवेल्लुयाओ रययामईओ पट्टियाओ जायरूवमईओ ओहाडणीओ, वइरामईओ उवरिपुंछणीओ सव्वसेयरययामए छायणे।
सा णं पउमवरवेइया Translated Sutra: वह उपकारिकालयन सभी दिशा – विदिशाओं में एक पद्मवरवेदिका और एक वनखण्ड से घिरा हुआ है। वह पद्मवरवेदिका ऊंचाई में आधे योजन ऊंची, पाँच सौ धनुष चौड़ी और उपकारिकालयन जितनी इसकी परिधि है। जैसे कि वज्ररत्नमय इसकी नेम है। रिष्टरत्नमय प्रतिष्ठान है। वैडूर्यरत्नमय स्तम्भ है। स्वर्ण और रजतमय फलक है। लोहिताक्ष रत्नों | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Hindi | 41 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तेणं कालेणं तेणं समएणं से सूरियाभे देवे अहुणोववण्णमित्तए चेव समाणे पंचविहाए पज्जत्तीए पज्जत्तिभावं गच्छइ, तं जहा–आहारपज्जत्तीए सरीरपज्जत्तीए इंदियपज्जत्तीए आनपानपज्जत्तीए भासमनपज्जत्तीए।
तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स पंचविहाए पज्जत्तीए पज्जत्तिभावं गयस्स समाणस्स इमेयारूवे अज्झत्थिए चिंतिए पत्थिए मणोगए संकप्पे समुपज्जित्था–किं मे पुव्विं करणिज्जं? किं मे पच्छा करणिज्जं? किं मे पुव्विं सेयं? किं मे पच्छा सेयं? किं मे पुव्विं पि पच्छा वि हियाए सुहाए खमाए णिस्सेसयाए आणुगामियत्ताए भविस्सइ? ।
तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स सामानियपरिसोववण्णगा देवा सूरियाभस्स Translated Sutra: उस काल और उस समय में तत्काल उत्पन्न होकर वह सूर्याभ देव आहार पर्याप्ति, शरीर – पर्याप्ति, इन्द्रिय – पर्याप्ति, श्वासोच्छ्वास – पर्याप्ति और भाषामनःपर्याप्ति – इन पाँच पर्याप्तियों से पर्याप्त अवस्था को प्राप्त हुआ। पाँच प्रकार की पर्याप्तियों से पर्याप्तभाव को प्राप्त होने के अनन्तर उस सूर्याभदेव को | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Hindi | 42 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से सूरियाभे देवे तेसिं सामानियपरिसोववण्णगाणं देवाणं अंतिए एयमट्ठं सोच्चा निसम्म हट्ठतुट्ठचित्तमानंदिए पीइमने परमसोमनस्सिए हरिसवसविसप्पमाणहियए सयणिज्जाओ अब्भुट्ठेति, अब्भुट्ठेत्ता उववायसभाओ पुरत्थिमिल्लेणं दारेणं निग्गच्छइ, जेणेव हरए तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता हरयं अनुपयाहिणीकरेमाणे-अनुपयाहिणीकरेमाणे पुरत्थिमिल्लेणं तोरणेणं अनुप-विसइ, अनुपविसित्ता पुरत्थिमिल्लेणं तिसोवानपडिरूवएणं पच्चोरुहइ, पच्चोरुहित्ता जलावगाहं करेइ, करेत्ता जल-मज्जणं करेइ, करेत्ता जलकिड्डं करेइ, करेत्ता जलाभिसेयं करेइ, करेत्ता आयंते चोक्खे परमसूईभूए हरयाओ Translated Sutra: तत्पश्चात् वह सूर्याभदेव उन सामानिकपरिषदोपगत देवों से इस अर्थ को सूनकर और हृदय में अवधारित कर हर्षित, सन्तुष्ट यावत् हृदय होता हुआ शय्या से उठा और उठकर उपपात सभा के पूर्वदिग्वर्ती द्वार से नीकला, नीकलकर ह्रद पर आया, ह्रद की प्रदक्षिणा करके पूर्वदिशावर्ती तोरण से होकर उसमें प्रविष्ट हुआ। पुर्वदिशावर्ती | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Hindi | 44 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स चत्तारि सामानियसाहस्सीओ जाव सोलस आयरक्खदेवसाहस्सीओ अन्ने य बहवे सूरियाभविमानवासिणो वेमाणिया देवा य देवीओ य अप्पेगतिया उप्पलहत्थगया जाव सहस्सपत्तहत्थगया सूरियाभं देवं पिट्ठतो-पिट्ठतो समनुगच्छंति।
तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स आभिओगिया देवा य देवीओ य अप्पेगतिया वंदनकलस-हत्थगया जाव अप्पेगतिया धूवकडुच्छुयहत्थगया हट्ठतुट्ठचित्तमानंदिया पीइमणा परमसोमनस्सिया हरिसवसविसप्पमाणहियया सूरियाभं देवं पिट्ठतो-पिट्ठतो समनुगच्छंति।
तए णं से सूरियाभे देवे चउहिं सामानियसाहस्सीहिं जाव आयरक्खदेवसाहस्सीहिं अन्नेहिं बहूहि य सूरियाभविमानवासीहिं Translated Sutra: तब उस सूर्याभदेव के चार हजार सामानिक देव यावत् सोलह हजार आत्मरक्षक देव तथा कितने ही अन्य बहुत से सूर्याभविमान वासी देव और देवी भी हाथों में उत्पल यावत् शतपथ – सहस्रपत्र कमलों कोल कर सूर्याभदेव के पीछे – पीछे चले। तत्पश्चात् उस सूर्याभदेव के बहुत – से अभियोगिक देव और देवियाँ हाथों में कलश यावत् धूप – दानों | |||||||||
| Rajprashniya | राजप्रश्नीय उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
प्रदेशीराजान प्रकरण |
Hindi | 81 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं तीसे सूरियकंताए देवीए इमेयारूवे अज्झत्थिए चिंतिए पत्थिए मनोगए संकप्पे समुप्पज्जित्था –जप्पभिइं च णं पएसी राया समणोवासए जाए तप्पभिइं च णं रज्जं च रट्ठं च बलं च बाहणं च कोट्ठागारं च पुरं च अंतेउरं च ममं जनवयं च अनाढायमाणे विहरइ, तं सेयं खलु मे पएसिं रायं केणवि सत्थप्पओगेण वा अग्गिप्पओगेण वा मंतप्पओगेण वा विसप्पओगेण वा उद्दवेत्ता सूरियकंतं कुमारं रज्जे ठवित्ता सयमेव रज्जसिरिं कारेमाणीए पालेमाणीए विहरित्तए त्ति कट्टु एवं संपेहेइ, संपेहित्ता सूरियकंतं कुमारं सद्दावेइ, सद्दावेत्ता एवं वयासी–
जप्पभिइं च णं पएसी राया समणोवासए जाए तप्पभिइं च णं रज्जं च Translated Sutra: तब सूर्यकान्ता रानी को इस प्रकार का आन्तरिक यावत् विचार उत्पन्न हुआ कि कहीं ऐसा न हो कि सूर्यकान्त कुमार प्रदेशी राजा के सामने मेरे इस रहस्य को प्रकाशित कर दे। ऐसा सोचकर सूर्यकान्ता रानी प्रदेशी राजा को मारने के लिए उसके दोष रूप छिद्रों को, कुकृत्य रूप आन्तरिक मर्मों को, एकान्त में सेवित निषिद्ध आचरण रूप | |||||||||
| Rajprashniya | રાજપ્રશ્નીય ઉપાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Gujarati | 5 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तेणं कालेणं तेणं समएणं सूरियाभे देवे सोहम्मे कप्पे सूरियाभे विमाने सभाए सुहम्माए सूरियाभंसि सीहासनंसि चउहिं सामानियसाहस्सीहिं, चउहिं अग्गमहिसीहिं सपरिवाराहिं, तिहिं परिसाहिं, सत्तहिं अनिएहिं, सत्तहिं अनियाहिवईहिं, सोलसहिं आयरक्खदेवसाहस्सीहिं, अन्नेहिं बहूहिं सूरियाभ-विमानवासीहिं वेमानिएहिं देवेहिं देवीहिं य सद्धिं संपरिवुडे महयाहयनट्ट गीय वाइय तंती तल ताल तुडिय घन मुइंग पडुप्पवादियरवेणं दिव्वाइं भोगभोगाइं भुंजमाणे विहरति, इमं च णं केवलकप्पं जंबुद्दीवं दीवं विउलेणं ओहिणा आभोएमाणे-आभोएमाणे पासति।
तत्थ समणं भगवं महावीरं जंबुद्दीवे (दीवे?) भारहे Translated Sutra: [૧] તે કાળે, તે સમયે સૂર્યાભદેવ સૌધર્મકલ્પમાં સૂર્યાભવિમાનમાં સુધર્માસભામાં સૂર્યાભ સિંહાસન ઉપર ૪૦૦૦ સામાનિકો, સપરિવાર ચાર અગ્રમહિષીઓ, ત્રણ પર્ષદા, સાત સૈન્ય, સાત સૈન્યાધિપતિ, ૧૬,૦૦૦ આત્મરક્ષક દેવો, બીજા પણ ઘણા સૂર્યાભવિમાનવાસી વૈમાનિક દેવો – દેવીઓ સાથે સંપરીવરીને મોટેથી વગાડતા વાદ્ય, નૃત્ય, ગીત, વાજિંત્ર, | |||||||||
| Rajprashniya | રાજપ્રશ્નીય ઉપાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Gujarati | 10 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं ते आभिओगिया देवा समणेणं भगवया महावीरेणं एवं वुत्ता समाणा हट्ठतुट्ठ-चित्तमानंदिया पीइमणा परमसोमनस्सिया हरिसवसविसप्पमाणहियया समणं भगवं महावीरं वंदंति नमंसंति, वंदित्ता नमंसित्ता उत्तरपुरत्थिम दिसीभागं अवक्कमंति, अवक्कमित्ता वेउव्वियसमुग्घाएणं समोहण्णंति, समोहणित्ता संखेज्जाइं जोयणाइं दंडं निसिरंति, तं जहा–रयनाणं वइराणं वेरुलियाणं लोहियक्खाणं मसारगल्लाणं हंसगब्भाणं पुलगाणं सोगंधियाणं जोईरसाणं अंजनाणं अंजनं-पुलगाणं रयनाणं जायरूवाणं अंकाणं फलिहाणं रिट्ठाणं अहाबायरे पोग्गले परिसाडेंति, परिसाडेत्ता अहासुहुमे पोग्गले परियायंति, परियाइत्ता Translated Sutra: ત્યારપછી તે આભિયોગિક દેવો, શ્રમણ ભગવંત મહાવીરે આમ કહેતા હર્ષિત, સંતુષ્ટ યાવત્ પ્રસન્નહૃદયી થઈને ભગવંતને વાંદે છે, નમે છે, વાંદી – નમીને ઈશાનખૂણામાં ગયા, જઈને વૈક્રિય સમુદ્ઘાતથી સમવહત થયા, થઈને સંખ્યાત યોજનનો દંડ કાઢે છે. તે આ રીતે – રત્નો યાવત્ રિષ્ટ, યથાબાદર પુદ્ગલોને છોડે છે અને પછી બીજી વખત વૈક્રિય | |||||||||
| Rajprashniya | રાજપ્રશ્નીય ઉપાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Gujarati | 11 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से सूरियाभे देवे तेसिं आभिओगियाणं देवाणं अंतिए एयमट्ठं सोच्चा निसम्म हट्ठतुट्ठ चित्तमानंदिए पीइमने परमसोमनस्सिए हरिसवस विसप्पमाणहियए पायत्ताणियाहिवइं देवं सद्दावेति, सद्दावेत्ता एवं वयासी– खिप्पामेव भो! देवानुप्पिया! सूरियाभे विमाने सभाए सुहम्माए मेघोघरसियगभीरमहुरसद्दं जोयणपरिमंडल सूसरं घंटं तिक्खुत्तो उल्लालेमाणे-उल्लालेमाणे महया-महया सद्देणं उग्घोसेमाणे-उग्घोसेमाणे एवं वयाहि–
आणवेइ णं भो! सूरियाभे देवे, गच्छति णं भो! सूरियाभे देवे जंबुद्दीवे दीवे भारहे वासे आमलकप्पाए नयरीए अंबसालवने चेइए समणं भगवं महावीरं अभिवंदए, तुब्भेवि णं भो! देवानुप्पिया! Translated Sutra: ત્યારે તે સૂર્યાભદેવ, તે આભિયોગિક દેવોની પાસે આ વૃત્તાંત સાંભળી, અવધારી, હૃષ્ટ – તુષ્ટ યાવત્ પ્રસન્ન હૃદયી થઈને પદાનિક અધિપતિ દેવને બોલાવ્યો, બોલાવીને કહ્યું – જલદીથી, ઓ દેવાનુપ્રિય ! સૂર્યાભ વિમાનની સુધર્માસભામાં મેઘસમૂહ જેવી ગંભીર શબ્દ કરનારી, યોજન પરિમંડલ સુસ્વર ઘંટાને ત્રણ વખત વગાડી વગાડી મોટા – મોટા | |||||||||
| Rajprashniya | રાજપ્રશ્નીય ઉપાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Gujarati | 12 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से पायत्ताणियाहिवती देवे सूरियाभेणं देवेणं एवं वुत्ते समाणे हट्ठतुट्ठ-चित्तमानंदिए पीइमने परमसोमनस्सिए हरिसवसविसप्पमाणहियए करयलपरिग्गहियं दसनहं सिरसावत्तं मत्थए अंजलिं कट्टु एवं देवो! तहत्ति आणाए विनएणं वयणं पडिसुणेंति, पडिसुणेत्ता जेणेव सूरियाभे विमाने जेणेव सभा सुहम्मा जेणेव मेघोघरसिय-गंभीरमहुरसद्दा जोयणपरिमंडला सुस्सरा घंटा तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता तं मेघोघरसियगंभीरमहुरसद्दं सूसरं घंटं तिक्खुत्तो उल्लालेति।
तए णं तीसे मेघोघरसियगंभीरमहुरसद्दाए जोयणपरिमंडलाए सूसराए घंटाए तिक्खुत्तो उल्लालियाए समाणीए से सूरियाभे विमाने पासायविमान-निक्खुडावडियसद्दघंटापडिसुया-सयसहस्ससंकुले Translated Sutra: ત્યારે તે પદાનિકાધિપતિ દેવ, સૂર્યાભદેવે આમ કહેતા હૃષ્ટ – તુષ્ટ યાવત્ હૃદયી થઈ, હે દેવ ! ‘તહત્તિ’ કહી વિનયથી આજ્ઞાવચનો સ્વીકારીને સૂર્યાભવિમાનમાં સુધર્માસભામાં મેઘના સમૂહ જેવા ગંભીર મધુર શબ્દો કરતી, યોજન પરિમંડલ સુસ્વરા ઘંટા પાસે આવે છે, આવીને ત્રણ વખત તે સુસ્વરા ઘંટાને વગાડે છે. ત્યારે તે મેઘના સમૂહ જેવા | |||||||||
| Rajprashniya | રાજપ્રશ્નીય ઉપાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Gujarati | 13 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं ते सूरियाभविमानवासिणो बहवे वेमाणिया देवा य देवीओ य पायत्ताणियाहिवइस्स देवस्स अंतिए एयमट्ठं सोच्चा निसम्म हट्ठतुट्ठचित्तमानंदिया पीइना परमसोमनस्सिया हरिसवस विसप्प-माणहियया अप्पेगइया वंदनवत्तियाए अप्पेगइया पूयणवत्तियाए अप्पेगइया सक्कारवत्तियाए अप्पेगइया सम्मानवत्तियाए अप्पेगइया कोऊहलवत्तियाए अप्पेगइया असुयाइं सुणिस्सामो, अप्पेग-इया सुयाइं अट्ठाइं हेऊइं पसिणाइं कारणाइं वागरणाइं पुच्छिस्सामो, अप्पेगइया सूरियाभस्स देवस्स वयणमनुयत्तेमाणा अप्पेगइया अन्नमन्नमनुवत्तेमाणा अप्पेगइया जिनभतिरागेणं अप्पेगइया धम्मो त्ति अप्पेगइया जीयमेयं Translated Sutra: સૂત્ર– ૧૩. ત્યારે તે સૂર્યાભ વિમાનવાસી ઘણા વૈમાનિક દેવો અને દેવીઓ પદાતિ સૈન્યાધિપતિ દેવની પાસે આ અર્થ સાંભળી, સમજી, હૃષ્ટ – તુષ્ટ યાવત્ પ્રસન્ન હૃદયી થઈને કેટલાક વંદન નિમિત્તે, કેટલાક પૂજન નિમિત્તે, કેટલાક સત્કાર નિમિત્તે, કેટલાક સન્માન – નિમિત્તે, કેટલાક કુતૂહલ નિમિત્તે, કેટલાક ન સાંભળેલુ સાંભળવાને, કેટલાક | |||||||||
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सूर्याभदेव प्रकरण |
Gujarati | 14 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से सूरियाभे देवे ते सूरियाभविमानवासिणो बहवे वेमाणिया देवा य देवीओ य सव्विड्ढीए जाव अकालपरिहीनं चेव अंतियं पाउब्भवमाणे पासति, पासित्ता हट्ठतुट्ठ चित्तमानंदिए पीइमने परम-सोमनस्सिए हरिसवसविसप्पमाणहियए आभिओगियं देवं सद्दावेति, सद्दावेत्ता एवं वयासी–
खिप्पामेव भो! देवानुप्पिया! अनेगखंभसयसन्निविट्ठं लीलट्ठियसालभंजियागं ईहामिय उसभ तुरग नर मगर विहग वालग किन्नर रुरु सरभ चमर कुंजर वनलय पउमलयभत्तिचित्तं खंभुग्गय वइरवेइया परिगयाभिरामं विज्जाहर जमलजुयल जंतजुत्तं पिव अच्चीसहस्समालणीयं रूवग-सहस्सकलियं भिसमाणं भिब्भिसमाणं चक्खुल्लोयणलेसं सुहफासं Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧૩ | |||||||||
| Rajprashniya | રાજપ્રશ્નીય ઉપાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Gujarati | 15 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से आभिओगिए देवे सूरियाभेणं देवेणं एवं वुत्ते समाणे हट्ठतुट्ठ चित्तमानंदिए पीइमने परमसोमनस्सिए हरिसवस विसप्पमाणहियए करयलपरिग्गहियं दसनहं सिरसावत्तं मत्थए अंजलिं कट्टु एवं देवो! तहत्ति आणाए विनएणं वयणं पडिसुणेइ, पडिसुणित्ता उत्तरपुरत्थिमं दिसीभागं अवक्कमंति, अवक्कमित्ता वेउव्वियसमुग्घाएणं समोहण्णइ, समोहणित्ता संखेज्जाइं जोयणाइं दंडं निसिरति, तं जहा–रयनाणं वइराणं वेरुलियाणं लोहियक्खाणं मसारगल्लाणं हंसगब्भाणं पुलगाणं सोगंधियाणं जोईरसाणं अंजनाणं अंजनंपुलगाणं रययाणं जायरूवाणं अंकाणं फलिहाणं रिट्ठाणं अहाबायरे पोग्गले परिसाडेइ, परिसाडित्ता Translated Sutra: [૧] ત્યારે તે આભિયોગિક દેવ, સૂર્યાભદેવે આમ કહેતા હર્ષિત, સંતુષ્ટ યાવત્ પ્રસન્ન હૃદયી થઈ, બે હાથ જોડી યાવત્ આજ્ઞા સ્વીકારીને ઈશાન કોણમાં જાય છે, જઈને વૈક્રિય સમુદ્ઘાતથી સમવહત થઈને સંખ્યાત યોજન યાવત્ યથાબાદર પુદ્ગલો છોડીને અને યથાસૂક્ષ્મ પુદ્ગલ ગ્રહણ કરે છે. બીજી વખત પણ વૈક્રિય સમુદ્ઘાતથી સમવહત થઈને | |||||||||
| Rajprashniya | રાજપ્રશ્નીય ઉપાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Gujarati | 16 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से सूरियाभे देवे आभियोगस्स देवस्स अंतिए एयमट्ठं सोच्चा निसम्म हट्ठतुट्ठ चित्तमानंदिए पीइमने परमसोमनस्सिए हरिसवस विसप्पमाणहियए दिव्वं जिणिंदाभिगमनजोग्गं उत्तरवेउव्वियरूवं विउव्वति, विउव्वित्ता चउहिं अग्गमहिसीहिं सपरिवाराहि, दोहिं अनिएहिं, तं जहा–गंधव्वाणिएण य नट्ठाणिएण य सद्धिं संपरिवुडे तं दिव्वं जाणविमानं अनुपयाहिणी-करेमाणे पुरत्थिमिल्लेणं तिसोमाणपडिरूवएणं दुरुहति, दुरुहित्ता जेणेव सीहासने तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सीहासन-वरगए पुरत्थाभिमुहे सन्निसण्णे।
तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स चत्तारि सामानियसाहस्सीओ तं दिव्वं जाणविमानं Translated Sutra: ત્યારે તે સૂર્યાભદેવ, આભિયોગિક દેવની પાસે આ અર્થને સાંભળી, સમજીહર્ષિત, સંતુષ્ટ થઇ યાવત્ પ્રસન્ન હૃદયી થઈ, દિવ્ય જિનેન્દ્રના અભિગમન માટે યોગ્ય એવા ઉત્તરવૈક્રિય રૂપને વિકુર્વે છે, વિકુર્વીને સપરિવાર ચાર અગ્રમહિષી અને બે અનીકો – ગંધર્વાનીક, નૃત્યાનીકની સાથે સંપરિવૃત્ત થઈ, તે દિવ્ય યાનવિમાનની પ્રદક્ષિણા | |||||||||
| Rajprashniya | રાજપ્રશ્નીય ઉપાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Gujarati | 17 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से सूरियाभे देवे तेणं पंचाणीयपरिखित्तेणं वइरामयवट्ट लट्ठ संठिय सुसिलिट्ठ परिघट्ठ मट्ठ सुपतिट्ठिएणं विसिट्ठेणं अनेगवरपंचवण्णकुडभी सहस्सपरिमंडियाभिरामेणं वाउद्धुयविजयवेजयंती-पडागच्छत्तातिच्छत्तकलिएणं तुंगेणं गगनतलमनुलिहंतसिहरेणं जोयणसहस्समूसिएणं महतिमहा-लतेणं महिंदज्झएणं पुरतो कड्ढिज्जमाणेणं चउहिं सामानियसाहस्सीहिं, चउहिं अग्गमहिसीहिं सपरिवाराहिं, तिहिं परिसाहिं, सत्तहिं अनिएहिं सत्तहिं अनियाहिवईहिं सोलसहिं आयरक्ख देवसाहस्सीहिं अन्नेहि य बहूहिं सूरियाभविमानवासीहिं वेमाणिएहिं देवीहि य सद्धिं संपरिवुडे सव्विड्ढीए जाव नाइयरवेणं Translated Sutra: સૂત્ર– ૧૭. ત્યારે તે સૂર્યાભદેવ તે પાંચ અનિકાધિપતિ વડે પરિરક્ષિત વજ્રરત્નમયી ગોળ, મનોજ્ઞ સંસ્થાનવાળા યાવત્ ૧૦૦૦ યોજન લાંબા, અત્યંત ઊંચા મહેન્દ્રધ્વજને આગળ કરીને તે સૂર્યાભદેવ ૪૦૦૦ સામાનિક યાવત્ ૧૬,૦૦૦ આત્મરક્ષક દેવો અને બીજા ઘણા સૂર્યાભવિમાનવાસી વૈમાનિક દેવો અને દેવીઓ સાથે સંપરિવૃત્ત થઈ, સર્વઋદ્ધિ | |||||||||
| Rajprashniya | રાજપ્રશ્નીય ઉપાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Gujarati | 25 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से सूरियाभे देवे तं दिव्वं देविड्ढिं दिव्वं देवजुइं दिव्वं देवानुभावं पडिसाहरइ, पडिसाहरेत्ता खणेणं जाते एगे एगभूए।
तए णं से सूरियाभे देवे समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेइ वंदति नमंसति, वंदित्ता नमंसित्ता नियगपरिवालसद्धिं संपरिवुडे तमेव दिव्वं जाणविमानं दुरुहति, दुरुहित्ता जामेव दिसिं पाउब्भूए तामेव दिसिं पडिगए। Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૨૪ | |||||||||
| Rajprashniya | રાજપ્રશ્નીય ઉપાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Gujarati | 27 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] कहिं णं भंते! सूरियाभस्स देवस्स सूरियाभे नामं विमाने पन्नत्ते? गोयमा! जंबुद्दीवे दीवे मंदरस्स पव्वयस्स दाहिणेणं इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए बहुसमरमणिज्जातो भूमिभागातो उड्ढं चंदिम सूरिय गहगण नक्खत्त तारारूवाणं पुरओ बहूइं जोयणाइं बहूइं जोयणसयाइं बहूइं जोयणसहस्साइं बहूइं जोयणसयसहस्साइं बहुईओ जोयणकोडीओ बहुईओ जोयणकोडाकोडीओ उड्ढं दूरं वीतीवइत्ता, एत्थ णं सोहम्मे नामं कप्पे पन्नत्ते–पाईणपडीणायते उदीणदाहिणवित्थिण्णे अद्धचंदसंठाणसंठिते अच्चिमालिभासरासिवण्णाभे, असंखेज्जाओ जोयणकोडाकोडीओ आयामविक्खंभेणं, असंखे-ज्जाओ जोयणकोडाकोडीओ परिक्खेवेणं, सव्वरयणामए Translated Sutra: ભગવન્ ! સૂર્યાભદેવનું સૂર્યાભ નામક વિમાન ક્યાં છે ? ગૌતમ ! જંબૂદ્વીપ દ્વીપમાં મેરુ પર્વતની દક્ષિણે, આ રત્નપ્રભા પૃથ્વીના બહુસમ રમણીય ભૂમિભાગથી ઊંચે ચંદ્ર – સૂર્ય – ગ્રહગણ – નક્ષત્ર – તારા એ બધાથી ઘણા યોજનો, ઘણા સેંકડો યોજનો, ઘણા હજારો યોજનો, ઘણા લાખો યોજનો, ઘણા કરોડો યોજનો, ઘણા હજાર કરોડો યોજનો ઊંચે દૂર ગયા | |||||||||
| Rajprashniya | રાજપ્રશ્નીય ઉપાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Gujarati | 30 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] सूरियाभे णं विमाने एगमेगे दारे अट्ठसयं चक्कज्झयाणं, एवं मिगज्झयाणं गरुडज्झयाणं रुच्छज्झयाणं छत्तज्झयाणं पिच्छज्झयाणं सउणिज्झयाणं सीहज्झयाणं, उसभज्झयाणं, अट्ठसयं सेयाणं चउ विसानाणं नागवरकेऊणं।
एवामेव सपुव्वावरेणं सूरियाभे विमाने एगमेगे दारे असीयं असीयं केउसहस्सं भवति इति मक्खायं।
तेसि णं दाराणं एगमेगे दारे पण्णट्ठिं-पण्णट्ठिं भोमा पन्नत्ता। तेसि णं भोमाणं भूमिभागा उल्लोया य भाणियव्वा तेसि णं भोमाणं बहुमज्झदेसभाए जाणि तेत्तीसमाणि भोमाणि । तेसि णं भोमाणं बहुमज्झदेसभागे पत्तेयं पत्तेयं सीहासने पन्नत्ते? सीहासनवण्णओ सपरिवारो। अवसेसेसु भोमेसु Translated Sutra: સૂર્યાભ વિમાનના પ્રત્યેક દ્વારે ચક્રના ચિહ્નવાળી ૧૦૮ ધજાઓ છે. એ જ રીતે, મૃગના ચિહ્નવાળી, ગરુડના ચિહ્નવાળી, છત્રના ચિહ્નવાળી, પિચ્છના ચિહ્નવાળી, શકુનિના ચિહ્નવાળી, સિંહના ચિહ્નવાળી, વૃષભના ચિહ્નવાળી, ચાર દાંતવાળા શ્વેત હાથીના ચિહ્નવાળી અને ઉત્તમ નાગના ચિહ્નવાળી ૧૦૮ – ૧૦૮ધજાઓ ફરકે છે. આ પ્રમાણે બધી મળીને | |||||||||
| Rajprashniya | રાજપ્રશ્નીય ઉપાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Gujarati | 33 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तेसि णं वनसंडाणं बहुमज्झदेसभाए पत्तेयं-पत्तेयं पासायवडेंसगा पन्नत्ता। ते णं पासायवडेंसगा पंच जोयणसयाइं उड्ढं उच्चत्तेणं, अड्ढाइज्जाइं जोयणसयाइं विक्खंभेणं अब्भुग्गयमूसिय-पहसिया इव तहेव बहुसमरमणिज्जभूमिभागो उल्लोओ सीहासनं सपरिवारं। तत्थं णं चत्तारि देवा महिड्ढिया महज्जुइया महाबला महायसा महासोक्खा महानुभागा पलिओवमट्ठितीया परिवसंति, तं जहा–असोए सत्तपण्णे चंपए चूए।
सूरियाभस्स णं देवविमानस्स अंतो बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे पन्नत्ते जाव तत्थ णं बहवे वेमाणिया देवा य देवीओ य आसयंति सयंति चिट्ठंति निसीयंति तुयट्टंति, हसंति रमंति ललंति कीलंति कित्तंति Translated Sutra: તે વનખંડના બહુમધ્ય દેશભાગે પ્રત્યેકમાં પ્રાસાદાવતંસક(શ્રેષ્ઠ મહેલ) કહ્યા છે. તે પ્રાસાદાવતંસકો ૫૦૦ યોજન ઉર્ધ્વ ઉચ્ચત્વથી, ૨૫૦ યોજન વિષ્કંભથી, પોતાની ઉજ્જવળ પ્રભાથી જાણે હસતા હોય એવા પ્રતીત થતા હતા. તેનો ભૂમિભાગ બહુસમ અને રમણીય હતો. તેના ચંદરવા, સપરિવાર સિંહાસન આદિ વર્ણન પૂર્વવત્ જાણવું. ત્યાં ચાર મહર્દ્ધિક | |||||||||
| Rajprashniya | રાજપ્રશ્નીય ઉપાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Gujarati | 41 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तेणं कालेणं तेणं समएणं से सूरियाभे देवे अहुणोववण्णमित्तए चेव समाणे पंचविहाए पज्जत्तीए पज्जत्तिभावं गच्छइ, तं जहा–आहारपज्जत्तीए सरीरपज्जत्तीए इंदियपज्जत्तीए आनपानपज्जत्तीए भासमनपज्जत्तीए।
तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स पंचविहाए पज्जत्तीए पज्जत्तिभावं गयस्स समाणस्स इमेयारूवे अज्झत्थिए चिंतिए पत्थिए मणोगए संकप्पे समुपज्जित्था–किं मे पुव्विं करणिज्जं? किं मे पच्छा करणिज्जं? किं मे पुव्विं सेयं? किं मे पच्छा सेयं? किं मे पुव्विं पि पच्छा वि हियाए सुहाए खमाए णिस्सेसयाए आणुगामियत्ताए भविस्सइ? ।
तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स सामानियपरिसोववण्णगा देवा सूरियाभस्स Translated Sutra: સૂત્ર– ૪૧. તે કાળે તે સમયે સૂર્યાભદેવ તત્કાળ ઉત્પન્ન થઈને પાંચ પ્રકારની પર્યાપ્તિઓ પૂર્ણ કરી, તે આ – આહાર, શરીર, ઇન્દ્રિય, આનપ્રાણ,ભાષામન પર્યાપ્તિ. ત્યારે તે સૂર્યાભદેવને પંચવિધ પર્યાપ્તિથી પર્યાપ્તભાવ પામીને આવા સ્વરૂપનો અભ્યર્થિત, ચિંતિત, પ્રાર્થિત, મનોગત સંકલ્પ ઉત્પન્ન થયો – મારે પહેલા શું કરવું જોઈએ | |||||||||
| Rajprashniya | રાજપ્રશ્નીય ઉપાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Gujarati | 42 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से सूरियाभे देवे तेसिं सामानियपरिसोववण्णगाणं देवाणं अंतिए एयमट्ठं सोच्चा निसम्म हट्ठतुट्ठचित्तमानंदिए पीइमने परमसोमनस्सिए हरिसवसविसप्पमाणहियए सयणिज्जाओ अब्भुट्ठेति, अब्भुट्ठेत्ता उववायसभाओ पुरत्थिमिल्लेणं दारेणं निग्गच्छइ, जेणेव हरए तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता हरयं अनुपयाहिणीकरेमाणे-अनुपयाहिणीकरेमाणे पुरत्थिमिल्लेणं तोरणेणं अनुप-विसइ, अनुपविसित्ता पुरत्थिमिल्लेणं तिसोवानपडिरूवएणं पच्चोरुहइ, पच्चोरुहित्ता जलावगाहं करेइ, करेत्ता जल-मज्जणं करेइ, करेत्ता जलकिड्डं करेइ, करेत्ता जलाभिसेयं करेइ, करेत्ता आयंते चोक्खे परमसूईभूए हरयाओ Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૪૧ | |||||||||
| Rajprashniya | રાજપ્રશ્નીય ઉપાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
सूर्याभदेव प्रकरण |
Gujarati | 44 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स चत्तारि सामानियसाहस्सीओ जाव सोलस आयरक्खदेवसाहस्सीओ अन्ने य बहवे सूरियाभविमानवासिणो वेमाणिया देवा य देवीओ य अप्पेगतिया उप्पलहत्थगया जाव सहस्सपत्तहत्थगया सूरियाभं देवं पिट्ठतो-पिट्ठतो समनुगच्छंति।
तए णं तस्स सूरियाभस्स देवस्स आभिओगिया देवा य देवीओ य अप्पेगतिया वंदनकलस-हत्थगया जाव अप्पेगतिया धूवकडुच्छुयहत्थगया हट्ठतुट्ठचित्तमानंदिया पीइमणा परमसोमनस्सिया हरिसवसविसप्पमाणहियया सूरियाभं देवं पिट्ठतो-पिट्ठतो समनुगच्छंति।
तए णं से सूरियाभे देवे चउहिं सामानियसाहस्सीहिं जाव आयरक्खदेवसाहस्सीहिं अन्नेहिं बहूहि य सूरियाभविमानवासीहिं Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૪૩ | |||||||||
| Rajprashniya | રાજપ્રશ્નીય ઉપાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
प्रदेशीराजान प्रकरण |
Gujarati | 81 | Sutra | Upang-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं तीसे सूरियकंताए देवीए इमेयारूवे अज्झत्थिए चिंतिए पत्थिए मनोगए संकप्पे समुप्पज्जित्था –जप्पभिइं च णं पएसी राया समणोवासए जाए तप्पभिइं च णं रज्जं च रट्ठं च बलं च बाहणं च कोट्ठागारं च पुरं च अंतेउरं च ममं जनवयं च अनाढायमाणे विहरइ, तं सेयं खलु मे पएसिं रायं केणवि सत्थप्पओगेण वा अग्गिप्पओगेण वा मंतप्पओगेण वा विसप्पओगेण वा उद्दवेत्ता सूरियकंतं कुमारं रज्जे ठवित्ता सयमेव रज्जसिरिं कारेमाणीए पालेमाणीए विहरित्तए त्ति कट्टु एवं संपेहेइ, संपेहित्ता सूरियकंतं कुमारं सद्दावेइ, सद्दावेत्ता एवं वयासी–
जप्पभिइं च णं पएसी राया समणोवासए जाए तप्पभिइं च णं रज्जं च Translated Sutra: સૂત્ર– ૮૧. ત્યારે તે પ્રદેશી રાજા, સૂર્યકાંતા રાણીને આ ઉત્પાતમાં જોડાયેલી જાણીને, સૂર્યકાંતા દેવી પ્રતિ મનથી પણ પ્રદ્વેષ ન કરતો, પૌષધશાળામાં જાય છે. પૌષધશાળાને પ્રમાર્જે છે, પ્રમાર્જીને ઉચ્ચાર પ્રસ્રવણ ભૂમિને પડિલેહે છે. પછી દર્ભનો સંથારો પાથરે છે, પાથરીને તેના ઉપર આરૂઢ થાય છે. થઈને પૂર્વાભિમુખ પલ્યંકાસને | |||||||||
| Samavayang | समवयांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
समवाय-१२ |
Hindi | 25 | Sutra | Ang-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] विजया णं रायहाणी दुवालस जोयणसयसहस्साइं आयामविक्खंभेणं पन्नत्ता।
रामे णं बलदेवे दुवालस वाससयाइं सव्वाउयं पालित्ता देवत्तं गए।
मंदरस्स णं पव्वयस्स चूलिआ मूले दुवालस जोयणाइं विक्खंभेणं पन्नत्ता।
जंबूदीवस्स णं दीवस्स वेइया मूले दुवालस जोयणाइं विक्खंभेणं पन्नत्ता।
सव्वजहन्निआ राई दुवालसमुहुत्तिआ पन्नत्ता।
सव्वजहन्निओ दिवसो दुवालसमुहुत्तिओ पन्नत्तो।
सव्वट्ठसिद्धस्स णं महाविमानस्स उवरिल्लाओ थूभिअग्गाओ दुवालस जोयणाइं उड्ढं उप्पतिता ईसिपब्भारा नामं पुढवी पन्नत्ता।
ईसिपब्भाराए णं पुढवीए दुवालस नामधेज्जा पन्नत्ता, तं जहा–ईसित्ति वा ईसिपब्भारत्ति Translated Sutra: जम्बूद्वीप के पूर्वदिशावर्ती विजयद्वार के स्वामी विजयदेव की विजया राजधानी बारह लाख योजन आयाम – विष्कम्भ वाली है। राम नाम के बलदेव बारह सौ वर्ष पूर्ण आयु का पालन कर देवत्व को प्राप्त हुए। मन्दर पर्वत की चूलिका मूल में बारह योजन विस्तार वाली है। जम्बूद्वीप की वेदिका मूल में बारह योजन विस्तार वाली है। सर्व | |||||||||
| Samavayang | समवयांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
समवाय-१३ |
Hindi | 26 | Sutra | Ang-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तेरस किरियाठाणा पन्नत्ता, तं जहा–अट्ठादंडे अणट्ठादंडे हिंसादंडे अकम्हादंडे दिट्ठिविप्परिआसिआ- दंडे मुसावायवत्तिए अदिन्नादानवत्तिए अज्झत्थिए मानवत्तिए मित्तदोसवत्तिए मायावत्तिए लोभ-वत्तिए ईरियावहिए नामं तेरसमे।
सोहम्मीसानेसु कप्पेसु तेरस विमापत्थडा पन्नत्ता।
सोहम्मवडेंसगे णं विमाने णं अद्धतेरसजोयणसयसहस्साइं आयामविक्खंभेणं पन्नत्ते।
एवं ईसाणवडेंसगे वि।
जलयरपंचिंदिअतिरिक्खजोणिआणं अद्धतेरस जाइकुलकोडीजोणीपमुहसयसहस्सा पन्नत्ता।
पाणाउस्स णं पुव्वस्स तेरस वत्थू पन्नत्ता।
गब्भवक्कंतिअपंचेंदिअतिरिक्खजोणिआणं तेरसविहे पओगे पन्नत्ते, तं जहा– Translated Sutra: तेरह क्रियास्थान कहे गए हैं। जैसे – अर्थदंड, अनर्थदंड, हिंसादंड, अकस्माद् दंड, दृष्टिविपर्यास दंड, मृषावाद प्रत्यय दंड, अदत्तादान प्रत्यय दंड, आध्यात्मिक दंड, मानप्रत्यय दंड, मित्रद्वेषप्रत्यय दंड, मायाप्रत्यय दंड, लोभप्रत्यय दंड और ईर्यापथिक दंड। सौधर्म – ईशान कल्पों में तेरह विमान – प्रस्तट हैं। सौधर्मावतंसक | |||||||||
| Samavayang | समवयांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
समवाय-१४ |
Hindi | 31 | Sutra | Ang-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] अग्गेणीअस्स णं पुव्वस्स चउद्दस वत्थू पन्नत्ता।
समणस्स णं भगवओ महावीरस्स चउद्दस समणसाहस्सीओ उक्कोसिआ समणसंपया होत्था।
कम्मविसोहिमग्गणं पडुच्च चउद्दस जीवट्ठाणा पन्नत्ता, तं जहा–मिच्छदिट्ठी, सासायणसम्म-दिट्ठी, सम्मामिच्छदिट्ठी, अविरयसम्मदिट्ठी, विरयाविरए, पमत्तसंजए, अप्पमत्तसंजए, नियट्टिबायरे, अनियट्टिबायरे, सुहुमसंपराएउवसमए वा खवए वा, उवसंतमोहे, खीणमोहे, सजोगी केवली, अजोगी केवली।
भरहेरवयाओ णं जीवाओ चउद्दस-चउद्दस जोयणसहस्साइं चत्तारि य एगुत्तरे जोयणसए छच्च एकूणवीसे भागे जोयणस्स आयामेणं पन्नत्ताओ।
एगमेगस्स णं रण्णो चाउरंतचक्कवट्टिस्स चउद्दस रयणा Translated Sutra: अग्रायणीय पूर्व के वस्तु नामक चौदह अर्थाधिकार कहे गए हैं। श्रमण भगवान महावीर की उत्कृष्ट श्रमण – सम्पदा चौदह हजार साधुओं की थी। कर्मों की विशुद्धि की गवेषणा करने वाले उपायों की अपेक्षा चौदह जीवस्थान हैं। मिथ्यादृष्टि स्थान, सासादन सम्यग्दृष्टि स्थान, सम्यग्मिथ्यादृष्टि स्थान, अविरत सम्यग्दृष्टि स्थान, | |||||||||