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Global Search for JAIN Aagam & Scriptures| Scripture Name | Translated Name | Mool Language | Chapter | Section | Translation | Sutra # | Type | Category | Action |
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| Anuyogdwar | अनुयोगद्वारासूत्र | Ardha-Magadhi |
अनुयोगद्वारासूत्र |
Hindi | 106 | Sutra | Chulika-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] से किं तं अनुगमे?
अनुगमे अट्ठविहे पन्नत्ते, तं जहा– Translated Sutra: संग्रहनयसम्मत अनुगम क्या है ? वह आठ प्रकार का है। सत्पदप्ररूपणा, द्रव्यप्रमाण, क्षेत्र, स्पर्शना, काल, अन्तर, भाग और भाव। इसमें अल्पबहुत्व नहीं होता है। सूत्र – १०६, १०७ | |||||||||
| Anuyogdwar | અનુયોગદ્વારાસૂત્ર | Ardha-Magadhi |
अनुयोगद्वारासूत्र |
Gujarati | 104 | Sutra | Chulika-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] से किं तं संगहस्स भंगोवदंसणया?
संगहस्स भंगोवदंसणया–१. तिपएसिया आनुपुव्वी २. परमाणुपोग्गला अनानुपुव्वी ३. दुपएसिया अवत्तव्वए अहवा ४. तिपएसिया य परमाणुपोग्गला य आनुपुव्वी य अनानुपुव्वी य अहवा ५. तिप-एसिया य दुपएसिया य आनुपुव्वी य अवत्तव्वए य अहवा ६. परमाणुपोग्गला य दुपएसिया य अनानुपुव्वी य अवत्तव्वए य अहवा ७. तिपएसिया य परमाणुपोग्गला य दुपएसिया य आनुपुव्वी य अनानुपुव्वी य अवत्तव्वए य। [एवं एए सत्त भंगा?] ।
से तं संगहस्स भंगोवदंसणया। Translated Sutra: સૂત્ર– ૧૦૪. સંગ્રહ નય સંમત ભંગોપદર્શનતાનું સ્વરૂપ કેવું છે ? ભંગોના નામ વાચ્યાર્થ સહિત બતાવવા તે ભંગોપદર્શનતા કહેવાય છે. અર્થ સહિત તે ભંગો આ પ્રમાણે બને છે. અસંયોગી ત્રણ ભંગ – ૧. ત્રિપ્રદેશી સ્કંધ આનુપૂર્વી છે. ૨. પરમાણુ પુદ્ગલ અનાનુપૂર્વી છે. ૩. દ્વિપ્રદેશી સ્કંધ અવક્તવ્ય છે. દ્વિસંયોગી ત્રણ ભંગ – ૧. ત્રિપ્રદેશી | |||||||||
| Bhagavati | ભગવતી સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
शतक-१ |
उद्देशक-५ पृथ्वी | Gujarati | 52 | Sutra | Ang-05 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] कति णं भंते! पुढवीओ पन्नत्ताओ?
गोयमा! सत्त पुढवीओ पन्नत्ताओ, तं० रयणप्पभा, सक्करप्पभा, वालुयप्पभा, पंकप्पभा, धूमप्पभा, तमप्पभा, तमतमा
इमीसे णं भंते! रयणप्पभाए पुढवीए कति निरयावाससयसहस्सा पन्नत्ता?
गोयमा! तीसं निरयावाससयसहस्सा पन्नत्ता। Translated Sutra: સૂત્ર– ૫૨. ભગવન્ ! પૃથ્વીઓ કેટલી કહી છે ? ગૌતમ ! સાત પૃથ્વીઓ(નરકભૂમિઓ) કહી છે. તે આ – રત્નપ્રભા યાવત્ તમસ્તમા. ભગવન્ ! આ રત્નપ્રભા પૃથ્વીમાં કેટલા લાખ નરકાવાસો કહ્યા છે ? ગૌતમ ! ૩૦ લાખ નરકાવાસ. સૂત્ર– ૫૩. સાતે નરકના નરકાવાસોની સંખ્યા આ પ્રમાણે – પહેલી નરકમાં ૩૦ લાખ નારાકાવાસ છે, એ પ્રમાણે – બીજીથી સાતમી નરકમાં | |||||||||
| Bhagavati | ભગવતી સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
शतक-४१ राशियुग्मं, त्र्योजराशि, द्वापर युग्मं राशि |
उद्देशक-१ थी १९६ | Gujarati | 1076 | Sutra | Ang-05 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] मिच्छादिट्ठीरासीजुम्मकडजुम्मनेरइया णं भंते! कओ उववज्जंति? एवं एत्थ वि मिच्छादिट्ठि-अभिलावेणं अभवसिद्धियसरिसा अट्ठावीसं उद्देसगा कायव्वा।
सेवं भंते! सेवं भंते! त्ति। Translated Sutra: સૂત્ર– ૧૦૭૬. મિથ્યાદૃષ્ટિ રાશિયુગ્મ કૃતયુગ્મ નૈરયિક ક્યાંથી ઉપજે ? મિથ્યાદૃષ્ટિના આલાવાથી અભવસિદ્ધિક સદૃશ ૨૮ – ઉદ્દેશા. સૂત્ર– ૧૦૭૭. કૃષ્ણપાક્ષિક૦ નૈરયિક ક્યાંથી ઉપજે ? અભવસિદ્ધિક સદૃશ ૨૮ – ઉદ્દેશા કહેવા. સૂત્ર સંદર્ભ– ૧૦૭૬, ૧૦૭૭ | |||||||||
| Bhagavati | ભગવતી સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
शतक-४१ राशियुग्मं, त्र्योजराशि, द्वापर युग्मं राशि |
उद्देशक-१ थी १९६ | Gujarati | 1077 | Sutra | Ang-05 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] कण्हपक्खियरासीजुम्मकडजुम्मनेरइयाणं भंते! कओ उववज्जंति? एवं एत्थ वि अभवसिद्धिय-सरिसा अट्ठावीसं उद्देसगा कायव्वा।
सेवं भंते! सेवं भंते! त्ति। Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧૦૭૬ | |||||||||
| Bhaktaparigna | ભક્તપરિજ્ઞા | Ardha-Magadhi |
आचरण, क्षमापना आदि |
Gujarati | 107 | Gatha | Painna-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] रक्खाहि बंभचेरं च बंभगुत्तीहिं नवहिं परिसुद्धं ।
निच्चं जिनाहि कामं दोसपकामं वियाणित्ता ॥ Translated Sutra: સૂત્ર– ૧૦૭. નવ બ્રહ્મચર્ય ગુપ્તિથી તું શુદ્ધ બ્રહ્મચર્યનું રક્ષણ કર અને કામને ઘણા દોષોથી ભરેલ જાણ. સૂત્ર– ૧૦૮. ખરેખર જેટલા દોષો આલોક – પરલોકના દુઃખને કરનાર છે, તે બધા મનુષ્યની મૈથુન – સંજ્ઞા લાવે છે. સૂત્ર– ૧૦૯. રતિ – અરતિરૂપ ચંચળ બે જીભવાળા, સંકલ્પરૂપ પ્રચંડ ફણાવાળા, વિષયરૂપ બિલમાં વસતા, મદરૂપ મુખવાળા, ગર્વથી | |||||||||
| Bhaktaparigna | ભક્તપરિજ્ઞા | Ardha-Magadhi |
आचरण, क्षमापना आदि |
Gujarati | 108 | Gatha | Painna-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] जावइआ किर दोसा इह-परलोए दुहावहा होंति ।
आवहइ ते उ सव्वे मेहुणसन्ना मनूसस्स ॥ Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧૦૭ | |||||||||
| Bhaktaparigna | ભક્તપરિજ્ઞા | Ardha-Magadhi |
आचरण, क्षमापना आदि |
Gujarati | 109 | Gatha | Painna-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] रइ-अरइतरलजीहाजुएण संकप्पउब्भडफणेणं ।
विसयबिलवासिणा मयमुहेण बिब्बोयरोसेण ॥ Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧૦૭ | |||||||||
| Bhaktaparigna | ભક્તપરિજ્ઞા | Ardha-Magadhi |
आचरण, क्षमापना आदि |
Gujarati | 110 | Gatha | Painna-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] कामभुयगेण दट्ठा लज्जानिम्मोयदप्पदाढेणं ।
नासंति नरा अवसा दुस्सहदुक्खावहविसेणं ॥ Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧૦૭ | |||||||||
| BruhatKalpa | बृहत्कल्पसूत्र | Ardha-Magadhi | उद्देशक-३ | Hindi | 106 | Sutra | Chheda-02 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] से वत्थूसु अव्वावडेसु अव्वोगडेसु अपरपरिग्गहिएसु अमरपरिग्गहिएसु सच्चेव ओग्गहस्स पुव्वाणुण्णवणा चिट्ठइ–अहालंदमवि ओग्गहे। Translated Sutra: जो घर इस्तमाल में न लिया जा रहा हो, अनेक स्वामी में से किसी एक स्वामी ने खुद के आधीन न किया हो, किसी व्यक्ति के द्वारा परिगृहीत न हो या किसी यक्ष – देव आदि ने वहाँ निवास किया हो उस घर का पहला जो मालिक हो उसकी आज्ञा लेकर वहाँ (साधु – साध्वी) रह सकते हैं, (उससे विपरीत) यदि वो घर काम में लिया जाता हो, एक स्वामी हो, अन्य से | |||||||||
| Chandrapragnapati | चंद्रप्रज्ञप्ति सूत्र | Ardha-Magadhi |
प्राभृत-१ |
प्राभृत-प्राभृत-१ | Hindi | 134 | Gatha | Upang-06 | View Detail |
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Mool Sutra: [गाथा] दो चंदा दो सूरा, नक्खत्ता खलु हवंति छप्पन्ना ।
छावत्तरं गहसतं, जंबुद्दीवे विचारी णं ॥ Translated Sutra: कितने चंद्र – सूर्य सर्वलोक को प्रकाशित – उद्योतीत तापीत और प्रभासीत करते हैं। इस विषय में बारह प्रतिपत्तियाँ हैं – सर्वलोक को प्रकाशित यावत् प्रभासीत करनेवाले चंद्र और सूर्य – (१) एक – एक हैं, (२) तीन – तीन हैं, (३) साडेतीन – साडेतीन हैं, (४) सात – सात हैं, (५) दश – दश हैं, (६) बारह – बारह हैं, (७) ४२ – ४२ हैं, (८) ७२ – ७२ हैं, | |||||||||
| Chandrapragnapati | चंद्रप्रज्ञप्ति सूत्र | Ardha-Magadhi |
प्राभृत-१ |
प्राभृत-प्राभृत-१ | Hindi | 34 | Sutra | Upang-06 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] ता सव्वावि णं मंडलवता केवतियं बाहल्लेणं, केवतियं आयाम-विक्खंभेणं, केवतियं परिक्खेवेणं अहिताति वएज्जा? तत्थ खलु इमाओ तिन्नि पडिवत्तीओ पन्नत्ताओ।
तत्थ एगे एवमाहंसु–ता सव्वावि णं मंडलवता जोयणं बाहल्लेणं, एगं जोयणसहस्सं एगं च तेत्तीसं जोयणसयं आयाम-विक्खंभेणं, तिन्नि जोयणसहस्साइं तिन्नि य नवनउए जोयणसए परिक्खेवेणं पन्नत्ता–एगे एवमाहंसु १
एगे पुण एवमाहंसु–ता सव्वावि णं मंडलवता जोयणं बाहल्लेणं, एगं जोयणसहस्सं एगं च चउतीसं जोयणसयं आयाम-विक्खंभेणं, तिन्नि जोयणसहस्साइं चत्तारि बिउत्तरे जोयणसए परिक्खेवेणं पन्नत्ता–एगे एवमाहंसु २
एगे पुण एवमाहंसु–ता सव्वावि Translated Sutra: हे भगवन् ! सर्व मंडलपद कितने बाहल्य से, कितने आयाम विष्कंभ से तथा कितने परिक्षेप से युक्त हैं ? इस विषय में तीन प्रतिपत्तियाँ हैं। पहला परमतवादी कहता है कि सभी मंडल बाहल्य से एक योजन, आयाम – विष्कम्भ से ११३३ योजन और परिक्षेप से ३३९९ योजन है। दूसरा बताता है कि सर्वमंडल बाहल्य से एक योजन, आयामविष्कम्भ से ११३४ | |||||||||
| Chandrapragnapati | चंद्रप्रज्ञप्ति सूत्र | Ardha-Magadhi |
प्राभृत-१ |
प्राभृत-प्राभृत-१ | Hindi | 38 | Sutra | Upang-06 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] ता केवतियं खेत्तं चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति आहिताति वएज्जा? तत्थ खलु इमाओ बारस पडिवत्तीओ पन्नत्ताओ।
तत्थेगे एवमाहंसु–ता एगं दीवं एगं समुद्दं चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति १
एगे पुण एवमाहंसु–ता तिन्नि दीवे तिन्नि समुद्दे चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति–एगे एवमाहंसु २
एगे पुण एवमाहंसु–ता अद्धुट्ठे दीवे अद्धुट्ठे समुद्दे चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति–एगे एवमाहंसु ३
एगे पुण एवमाहंसु–ता सत्त दीवे सत्त समुद्दे चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति–एगे एवमाहंसु ४
एगे Translated Sutra: चंद्र – सूर्य कितने क्षेत्र को अवभासित – उद्योतित – तापित एवं प्रकाशीत करता है ? इस विषय में बारह प्रति – पत्तियाँ हैं। वह इस प्रकार – (१) गमन करते हुए चंद्र – सूर्य एक द्वीप और एक समुद्र को अवभासित यावत् प्रकाशित करते हैं। (२) तीन द्वीप – तीन समुद्र को अवभासित यावत् प्रकाशीत करते हैं। (३) अर्द्ध चतुर्थद्वीप | |||||||||
| Chandrapragnapati | ચંદ્રપ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
प्राभृत-१ |
प्राभृत-प्राभृत-१ | Gujarati | 106 | Sutra | Upang-06 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] तत्थ खलु इमे छ उडू पन्नत्ता, तं जहा–पाउसे बरिसारत्ते सरदे हेमंते वसंते गिम्हे।
ता सव्वेवि णं एते चंदउडू दुवे-दुवे मासाति चउप्पण्णेणं-चउप्पण्णेणं आदानेनं गणिज्जमाणा सातिरेगाइं एगूणसट्ठिं-एगूणसट्ठिं राइंदियाइं राइंदियग्गेणं आहितेति वदेज्जा।
तत्थ खलु इमे छ ओमरत्ता पन्नत्ता, तं जहा–ततिए पव्वे सत्तमे पव्वे एक्कारसमे पव्वे पन्नरसमे पव्वे एकूणवीसतिमे पव्वे तेवीसतिमे पव्वे।
तत्थ खलु इमे छ अइरत्ता, तं जहा–चउत्थे पव्वे अट्ठमे पव्वे बारसमे पव्वे सोलसमे पव्वे वीसतिमे पव्वे चउवीसतिमे पव्वे। Translated Sutra: સૂત્ર– ૧૦૬. તેમાં નિશ્ચે આ છ ઋતુઓ કહેલ છે, તે આ પ્રમાણે – પ્રાવૃષ, વર્ષારાત્ર, શરદ, હેમંત, વસંત, ગ્રીષ્મ. આ બધી ચંદ્ર ઋતુઓ બે માસ પ્રમાણ થાય છે અને સંવત્સરના ૩૫૪ – ૩૫૪ અહોરાત્ર વડે ગણતા સાતિરેક ૫૯ – ૫૯ અહોરાત્ર પ્રમાણથી હોય છે. તેમાં નિશ્ચે આ છ અહોરાત્ર – ઘટતી રાત્રિ કહેલી છે, તે આ પ્રમાણે – ત્રીજા પર્વમાં, સાતમાં | |||||||||
| Chandrapragnapati | ચંદ્રપ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
प्राभृत-१ |
प्राभृत-प्राभृत-१ | Gujarati | 34 | Sutra | Upang-06 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] ता सव्वावि णं मंडलवता केवतियं बाहल्लेणं, केवतियं आयाम-विक्खंभेणं, केवतियं परिक्खेवेणं अहिताति वएज्जा? तत्थ खलु इमाओ तिन्नि पडिवत्तीओ पन्नत्ताओ।
तत्थ एगे एवमाहंसु–ता सव्वावि णं मंडलवता जोयणं बाहल्लेणं, एगं जोयणसहस्सं एगं च तेत्तीसं जोयणसयं आयाम-विक्खंभेणं, तिन्नि जोयणसहस्साइं तिन्नि य नवनउए जोयणसए परिक्खेवेणं पन्नत्ता–एगे एवमाहंसु १
एगे पुण एवमाहंसु–ता सव्वावि णं मंडलवता जोयणं बाहल्लेणं, एगं जोयणसहस्सं एगं च चउतीसं जोयणसयं आयाम-विक्खंभेणं, तिन्नि जोयणसहस्साइं चत्तारि बिउत्तरे जोयणसए परिक्खेवेणं पन्नत्ता–एगे एवमाहंसु २
एगे पुण एवमाहंसु–ता सव्वावि Translated Sutra: તે સર્વે મંડલપદ બાહલ્યથી, આયામ – વિષ્કંભ(લંબાઈ અને પહોળાઈ)થી અને પરિક્ષેપથી કેટલાં પ્રમાણમાં કહેલ છે ? તે જણાવો. આ વિષયમાં અન્યતીર્થિકોની ત્રણ પ્રતિપત્તિ(માન્યતા)ઓ કહેલી છે – તેમાં એક એ પ્રમાણે કહે છે – તે સર્વે પણ મંડલવત બાહલ્યથી એક યોજન, આયામ – વિષ્કંભથી ૧૧૩૩ યોજન અને પરિક્ષેપથી ૩૩૯૯ યોજન કહેલ છે. તેમાં બીજો | |||||||||
| Chandrapragnapati | ચંદ્રપ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
प्राभृत-१ |
प्राभृत-प्राभृत-१ | Gujarati | 38 | Sutra | Upang-06 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] ता केवतियं खेत्तं चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति आहिताति वएज्जा? तत्थ खलु इमाओ बारस पडिवत्तीओ पन्नत्ताओ।
तत्थेगे एवमाहंसु–ता एगं दीवं एगं समुद्दं चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति १
एगे पुण एवमाहंसु–ता तिन्नि दीवे तिन्नि समुद्दे चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति–एगे एवमाहंसु २
एगे पुण एवमाहंसु–ता अद्धुट्ठे दीवे अद्धुट्ठे समुद्दे चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति–एगे एवमाहंसु ३
एगे पुण एवमाहंसु–ता सत्त दीवे सत्त समुद्दे चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति–एगे एवमाहंसु ४
एगे Translated Sutra: કેટલાં ક્ષેત્રને ચંદ્ર – સૂર્ય અવભાસિત, ઉદ્યોતિત, તાપિત, પ્રકાશિત કરેલ છે ? સૂર્યના પ્રકાશિત ક્ષેત્ર વિશે અન્યતિર્થીકોની નિશ્ચે આ બાર પ્રતિપત્તિ(માન્યતા)ઓ કહેલી છે. ૧. તેમાં એક એવું કહે છે કે – તે એક દ્વીપ – એક સમુદ્રને ચંદ્ર – સૂર્યો અવભાસિત યાવત્ પ્રકાશિત કરે છે. ૨. એક એમ કહે છે – તે ત્રણ દ્વીપ, ત્રણ સમુદ્રને | |||||||||
| Chandravedyak | Ardha-Magadhi | Hindi | 107 | Gatha | Painna-07B | View Detail | |||
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Mool Sutra: [गाथा] न हु सुलहं मानुस्सं, लद्धूण वि होइ दुल्लहा बोही ।
बोहीए वि य लंभे सामण्णं दुल्लहं होइ ॥ Translated Sutra: सबसे पहले तो मानव जन्म पाना दुर्लभ, मानव जन्म में बोधि प्राप्ति दुर्लभ है। बोधि मिले तो भी श्रमणत्व अति दुर्लभ है। साधुपन मिलने के बावजूद भी शास्त्र का रहस्यज्ञान पाना अति दुर्लभ है। ज्ञान का रहस्य समझने के बाद चारित्र की शुद्धि होना अति दुर्लभ है। इसलिए ही ज्ञानी पुरुष आलोचनादि के द्वारा चारित्र विशुद्धि | |||||||||
| Chandravedyak | Ardha-Magadhi | Hindi | 108 | Gatha | Painna-07B | View Detail | |||
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Mool Sutra: [गाथा] सामण्णस्स वि लंभे नाणाभिगमो उ दुल्लहो हवइ ।
नाणम्मि वि आगमिए चरित्तसोही हवइ दुक्खं ॥ Translated Sutra: देखो सूत्र १०७ | |||||||||
| Chandravedyak | Ardha-Magadhi | Gujarati | 100 | Gatha | Painna-07B | View Detail | |||
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Mool Sutra: [गाथा] ते धन्ना जे धम्मं चरिउं जिनदेसियं पयत्तेणं ।
गिहपासबंधणाओ उम्मुक्का सव्वभावेणं ॥ Translated Sutra: (ચારિત્રગુણ દ્વાર) ૧૦૦. જિનેશ્વર પરમાત્માએ કહેલા ધર્મનું પ્રયત્નપૂર્વક પાલન કરવા માટે જેઓ સર્વ પ્રકારે ગૃહપાશના બંધનથી સર્વથા મુક્ત થાય છે, તેઓ ધન્ય છે. ૧૦૧. વિશુદ્ધ ભાવ વડે એકાગ્ર ચિત્તવાળા બનીને જે પુરુષો જિનવચનનું પાલન કરે છે, તે ગુણ સમૃદ્ધ મુનિ મરણ સમય પ્રાપ્ત થવા છતાં સહેજ પણ વિષાદને અથવા ગ્લાનિને અનુભવતા | |||||||||
| Dashvaikalik | દશવૈકાલિક સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-५ पिंडैषणा |
उद्देशक-१ | Gujarati | 105 | Gatha | Mool-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [गाथा] साहट्टु निक्खिवित्ताणं सच्चित्तं घट्टियाण य ।
तहेव समणट्ठाए उदगं संपणोल्लिया ॥ Translated Sutra: સૂત્ર– ૧૦૫. એ જ પ્રમાણે એકમાંથી બીજા વાસણમા નાખીને, સચિત્ત વસ્તુનો સંસ્પર્શ કરીને તથા સચિત્ત પાણી હલાવીને, સચિત્ત પાણીમાં અવગાહન કરીને, સૂત્ર– ૧૦૬. ચલિત કરીને આહાર – પાણી લાવે તો મુનિ તેને નિષેધ કરીને કહે કે – ‘‘મને આ પ્રકારે લેવું ન કલ્પે.’’ સૂત્ર– ૧૦૭. પુરોકર્મ – કૃત્ હાથીથી, કડછીથી કે વાસણથી દેનારીને સાધુ | |||||||||
| Devendrastava | देवेन्द्रस्तव | Ardha-Magadhi |
वैमानिक अधिकार |
Hindi | 180 | Gatha | Painna-09 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] तिन्नेव य गेवेज्जा हिट्ठिल्ला १ मज्झिमा २ य उवरिल्ला ३ ।
एक्केक्कं पि य तिविहं, एवं नव होंति गेवेज्जा ॥ Translated Sutra: अधो – मध्यम – ऊर्ध्व तीन ग्रैवेयक हैं और हर एक के तीन प्रकार है। इस तरह से ग्रैवेयक नौ है। सुदर्शन, अमोघ, सुप्रबुद्ध, यशोधर, वत्स, सुवत्स, सुमनस, सोमनस और प्रियदर्शन। नीचे के ग्रैवेयक में १११, मध्यम ग्रैवेयक में १०७ ऊपर के ग्रैवेयक में १०० और अनुत्तरोपपातिक में पाँच विमान बताएं हैं। सूत्र – १८०–१८२ | |||||||||
| Devendrastava | દેવેન્દ્રસ્તવ | Ardha-Magadhi |
वैमानिक अधिकार |
Gujarati | 174 | Gatha | Painna-09 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] एयाइं विमानाइं कहियाइं जाइं जत्थ कप्पम्मि ।
कप्पवईण वि सुंदरि! ठिईविसेसे निसामेहि ॥ Translated Sutra: આ પ્રકારે હે સુંદરી ! જે કલ્પમાં જેટલા વિમાનો કહ્યા છે, તે કલ્પસ્થિતિ વિશેષને સાંભળ. શક્ર મહાનુભવની બે સાગરોપમ, ઇશાનેન્દ્રની સાધિક બે સાગરોપમ કલ્પસ્થિતિ કહી છે. સનત્કુમારેન્દ્રની સાત, માહેન્દ્રની સાધિક સાત સાગરોપમ. બ્રહ્મલોકેન્દ્રની દશ, લાંતકેન્દ્રની ચૌદ સાગરોપમ. મહાશુક્રેન્દ્રની સત્તર, સહસ્રારેન્દ્રની | |||||||||
| Gacchachar | ગચ્છાચાર | Ardha-Magadhi |
गुरुस्वरूपं |
Gujarati | 106 | Gatha | Painna-07A | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] खुड्डो वुड्ढो तहा सेहो जत्थ रक्खे उवस्सयं ।
तरुणो वा जत्थ एगागी, का मेरा तत्थ भासिमो? ॥ Translated Sutra: સૂત્ર– ૧૦૬. જે ગચ્છમાં ક્ષુલ્લક કે શૈક્ષ(નવ દીક્ષિત સાધુ) કે એકલો તરુણ સાધુ રક્ષણ કરતો હોય, તે ગચ્છમાં મર્યાદા ક્યાંથી હોય? સૂત્ર– ૧૦૭. જે ગચ્છમાં એક ક્ષુલ્લિકા, નવ દીક્ષિતા કે તરુણી સાધ્વી વસતીનું રક્ષણ કરે, તે વિહારમાં બ્રહ્મચર્યની શુદ્ધિ ક્યાંથી હોય ? સૂત્ર સંદર્ભ– ૧૦૬, ૧૦૭ | |||||||||
| Gyatadharmakatha | धर्मकथांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
श्रुतस्कंध-१ अध्ययन-८ मल्ली |
Hindi | 106 | Sutra | Ang-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं मल्लिस्स अरहओ मनोरमं सीयं दुरुढस्स समाणस्स इमे अट्ठट्ठमंगला पुरओ अहाणुपुव्वीए संपत्थिया–एवं निग्गमी जहा जमालिस्स।
तए णं मल्लिस्स अरहओ निक्खममाणस्स अप्पेगइया देवा मिहिलं रायहाणिं अब्भिंतरबाहिरं आसिय-संमज्जिय-संमट्ठ-सुइ-रत्थंतरावणवीहियं करेंति जाव परिधावंति।
तए णं मल्ली अरहा जेणेव सहस्संबवणे उज्जाणे जेणेव असोगवरपायवे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सीयाओ पच्चोरुहइ, आभरणालंकारं ओमुयइ।
तए णं पभावई हंसलक्खणेणं पडसाडएणं आभरणालंकारं पडिच्छइ।
तए णं मल्ली अरहा सयमेव पंचमुट्ठियं लोयं करेइ।
तए णं सक्के देविंदे देवराया मल्लिस्स केसे पडिच्छइ, पडिच्छित्ता Translated Sutra: तत्पश्चात् मल्ली अरहंत जब मनोरमा शिबिका पर आरूढ़ हुए, उस समय उनके आगे आठ – आठ मंगल अनुक्रम से चले। जमालि के निर्गमन की तरह यहाँ मल्ली अरहंत का वर्णन समझ लेना। तत्पश्चात् मल्ली अरहंत जब दीक्षा धारण करने के लिए नीकले तो किन्हीं – किन्हीं देवों ने मिथिला राजधानी में पानी सींच दिया, उसे साफ कर दिया और भीतर तथा | |||||||||
| Gyatadharmakatha | ધર્મકથાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
श्रुतस्कंध-१ अध्ययन-८ मल्ली |
Gujarati | 96 | Sutra | Ang-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तेणं कालेणं तेणं समएणं सक्कस्स आसणं चलइ।
तए णं से सक्के देविंदे देवराया आसणं चलियं पासइ, पासित्ता ओहिं पउंजइ, पउंजित्ता मल्लिं अरहं ओहिणा आमोएइ। इमेयारूवे अज्झत्थिए चिंतिए पत्थिए मनोगए संकप्पे समुप्प-ज्जित्था–एवं खलु जंबुद्दीवे दीवे भारहे वासे मिहिलाए नय-रीए कुंभगस्स रन्नो [धूया पभावईए देवीए अत्तया?] मल्ली अरहा निक्खमिस्सामित्ति मणं पहारेइ। तं जीयमेयं तीय-पच्चुप्पण्णमणानागयाणं सक्काणं अरहंताणं भगवंताणं निक्खममाणाणं इमेयारूवं अत्थसंपयाणं दलइत्तए, [तं जहा– Translated Sutra: સૂત્ર– ૯૬. તે કાળે, તે સમયે શક્રનું આસન ચલિત થયું, ત્યારે દેવેન્દ્ર દેવરાજ શક્રે આસનને ચલિત થતું જોયું, અવધિ પ્રયોજ્યું, મલ્લ અરહંતને અવધિ વડે જોઈને આવો મનોગત સંકલ્પ ઉપજ્યો કે – નિશ્ચે જંબૂદ્વીપના ભરતક્ષેત્રમાં મિથિલામાં, કુંભકરાજાની પુત્રી, મલ્લી અરહંતે દીક્ષા લેવાનો મનોસંકલ્પ કર્યો છે. તો અતીત – અનાગત | |||||||||
| Jambudwippragnapati | जंबुद्वीप प्रज्ञप्ति सूत्र | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार १ भरतक्षेत्र |
Hindi | 13 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] कहि णं भंते! जंबुद्दीवे दीवे भरहे वासे वेयड्ढे नामं पव्वए पन्नत्ते? गोयमा! उत्तरद्धभरहवासस्स दाहिणेणं, दाहिणड्ढभरहवासस्स उत्तरेणं, पुरत्थिमलवणसमुद्दस्स पच्चत्थिमेणं, पच्चत्थिमलवण-समुद्दस्स पुरत्थिमेणं, एत्थ णं जंबुद्दीवे दीवे भरहे वासे वेयड्ढे नामं पव्वए पन्नत्ते–पाईणपडीणायए उदीणदाहिणविच्छिन्नेदुहा लवणसमुद्दं पुट्ठे–पुरत्थिमिल्लाए कोडीए पुरत्थिमिल्लं लवणसमुद्दं पुट्ठे, पच्चत्थिमिल्लाए कोडीए पच्चत्थिमिल्लं लवणसमुद्दं पुट्ठे, पणवीसं जोयणाइं उद्धं उच्चत्तेणं, छस्सकोसाइं जोयणाइं उव्वेहेणं, पन्नासं जोयणाइं विक्खंभेणं। तस्स बाहा पुरत्थिम-पच्चत्थिमेणं Translated Sutra: भगवन् ! जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में वैताढ्य पर्वत कहाँ है ? गौतम ! उत्तरार्ध भरतक्षेत्र के दक्षिण में, दक्षिणार्ध भरतक्षेत्र के उत्तर में, पूर्व – लवणसमुद्र के पश्चिम में, पश्चिम – लवणसमुद्र के पूर्व में है। यह पूर्व – पश्चिम में लम्बा तथा उत्तर – दक्षिण में चौड़ा है। अपने पूर्वी किनारे से पूर्व – लवणसमुद्र | |||||||||
| Jambudwippragnapati | जंबुद्वीप प्रज्ञप्ति सूत्र | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Hindi | 257 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] जंबुद्दीवे दीवे सव्वब्भंतरे णं भंते! सूरमंडले केवइयं आयामविक्खंभेणं, केवइयं परिक्खेवेणं पन्नत्ते? गोयमा! नवनउइं जोयणसहस्साइं छच्चं चत्ताले जोयणसए आयामविक्खंभेणं, तिन्नि य जोयणसय-सहस्साइं पन्नरस य जोयणसहस्साइं एगूनणउइं च जोयणाइं किंचिविसेसाहियाइं परिक्खेवेणं।
अब्भंतरानंतरे णं भंते! सूरमंडले केवइयं आयामविक्खंभेणं, केवइयं परिक्खेवेणं पन्नत्ते? गोयमा! नवनउइं जोयणसहस्साइं छच्च पणयाले जोयणसए पणतीसं च एगसट्ठिभाए जोयणस्स आयामविक्खंभेणं, तिन्नि य जोयणसयसहस्साइं पन्नरस य जोयणसहस्साइं एगं च सत्तुत्तरं जोयणसयं परिक्खेवेणं पन्नत्ते।
अब्भंतरतच्चे णं भंते! Translated Sutra: भगवन् ! जम्बूद्वीप में सर्वाभ्यन्तर सूर्य – मण्डल का लम्बाई – चौड़ाई तथा परिधि कितनी है ? गौतम ! लम्बाई – चौड़ाई ९९६४० योजन तथा परिधि कुछ अधिक ३१५०८९ योजन है। द्वितीय आभ्यन्तर सूर्य – मण्डल की लम्बाई – चौड़ाई ९९६४५ – ३५/६१ योजन तथा परिधि ३१५१०७ योजन है। तृतीय आभ्यन्तर सूर्य – मण्डल की लम्बाई – चौड़ाई ९९६५१ – ६/६१ | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ३ भरतचक्री |
Gujarati | 105 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से भरहे राया गंगाए महानईए पच्चत्थिमिल्ले कूले दुवालसजोयणायामं नवजोयणविच्छिण्णं वरनगरसरिच्छं विजयखंधावारणिवेसं करेइ, करेत्ता वड्ढइरयणं सद्दावेइ, सद्दावेत्ता एवं वयासी–खिप्पामेव भो देवानुप्पिया! मम आवासं पोसहसालं च करेहि, करेत्ता ममेयमाणत्तियं पच्चप्पिणाहि।
तए णं से वड्ढइरयणे भरहेणं रन्ना एवं वुत्ते समाणे हट्ठतुट्ठ-चित्तमानंदिए नंदिए पीइमणे परमसोमणस्सिए हरिसवसविसप्पमाणहियए करयलपरिग्गहियं सिरसावत्तं मत्थए अंजलिं कट्टु एवं सामी! तहत्ति आणाए विनएणं वयणं पडिसुनेइ, पडिसुणेत्ता भरहस्स रन्नो आवसहं पोसहसालं च करेइ, करेत्ता एयमाणत्तियं खिप्पामेव Translated Sutra: સૂત્ર– ૧૦૫. ત્યારપછી તે ભરતરાજા ગંગા મહાનદીના પશ્ચિમી કિનારે બાર યોજન લાંબી, નવ યોજન પહોળી યાવત્ વિજય છાવણીનો પડાવ નાંખે છે. બાકીનું પૂર્વવત્ યાવત્ નિધિરત્નો આશ્રીને અઠ્ઠમભક્ત ગ્રહણ કરે છે. ત્યારે તે ભરત રાજા પૌષધશાળામાં રહ્યો યાવત્ નિધિ રત્નને મનમાં ધ્યાન કરતો રહે છે. તે નિધિઓ અપરિમિત, રક્ત રત્નવાળી, | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Gujarati | 257 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] जंबुद्दीवे दीवे सव्वब्भंतरे णं भंते! सूरमंडले केवइयं आयामविक्खंभेणं, केवइयं परिक्खेवेणं पन्नत्ते? गोयमा! नवनउइं जोयणसहस्साइं छच्चं चत्ताले जोयणसए आयामविक्खंभेणं, तिन्नि य जोयणसय-सहस्साइं पन्नरस य जोयणसहस्साइं एगूनणउइं च जोयणाइं किंचिविसेसाहियाइं परिक्खेवेणं।
अब्भंतरानंतरे णं भंते! सूरमंडले केवइयं आयामविक्खंभेणं, केवइयं परिक्खेवेणं पन्नत्ते? गोयमा! नवनउइं जोयणसहस्साइं छच्च पणयाले जोयणसए पणतीसं च एगसट्ठिभाए जोयणस्स आयामविक्खंभेणं, तिन्नि य जोयणसयसहस्साइं पन्नरस य जोयणसहस्साइं एगं च सत्तुत्तरं जोयणसयं परिक्खेवेणं पन्नत्ते।
अब्भंतरतच्चे णं भंते! Translated Sutra: ભગવન્ ! જંબૂદ્વીપ દ્વીપમાં સર્વાભ્યંતર સૂર્યમંડલની લંબાઈ, પહોળાઈ, પરિધિ કેટલી કહેલી છે ? ગૌતમ ! ૯૯,૬૪૦ યોજન લંબાઈ – પહોળાઈ છે. તથા પરિધિ સાધિક ૩,૧૫,૦૮૧ યોજન છે. ભગવન્ ! અભ્યંતર અનંતર સૂર્યમંડલની લંબાઈ, પહોળાઈ અને પરિધિ કેટલી કહેલી છે? ગૌતમ! ૯૯,૬૪૫ યોજન અને એક યોજનના ૩૫/૬૧ ભાગ લંબાઈ – પહોળાઈ છે. તેની પરિધિ ૩,૧૫,૧૦૭ | |||||||||
| Jivajivabhigam | જીવાભિગમ ઉપાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
चतुर्विध जीव प्रतिपत्ति |
नैरयिक उद्देशक-२ | Gujarati | 106 | Sutra | Upang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] इमीसे णं भंते! रयणप्पभाए पुढवीए नेरइयाणं केवतियं कालं ठिती पन्नत्ता? गोयमा! जहन्नेवि उक्कोसेणवि ठिती भाणितव्वा जाव अधेसत्तमाए। Translated Sutra: સૂત્ર– ૧૦૬. ભગવન્ ! આ રત્નપ્રભા પૃથ્વી નૈરયિકોની કેટલા કાળની સ્થિતિ કહી છે ? ગૌતમ ! જઘન્યથી અને ઉત્કૃષ્ટથી પ્રજ્ઞાપના સૂત્રના ચોથા સ્થિતિ પદ અનુસાર અધઃસપ્તમીપૃથ્વી સુધી સ્થિતિ કહેવી. સૂત્ર– ૧૦૭. ભગવન્! આ રત્નપ્રભા નૈરયિક અનંતર ઉદ્વર્તીને(મરીને) ક્યાં જાય છે ક્યાં ઉપજે છે ? શું નૈરયિકોમાં કે તિર્યંચયોનિકોમાં | |||||||||
| Mahanishith | महानिशीय श्रुतस्कंध सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Hindi | 1070 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] गीयत्थे जे सुसंविग्गे, अणालसी दढव्वए।
अखलिय-चारित्ते सययं राग-दोस-विवज्जिए॥ Translated Sutra: अच्छी तरह से संवेग पाया हो, आलस रहित हो, दृढ़ व्रतवाले हो, हंमेशा अस्खलित चारित्रवाले हो, राग – द्वेष रहित हो, चार कषाय को उपशमाया हो, इन्द्रिय को जीतनेवाला हो, ऐसे गुणवाले जो गीतार्थ गुरु हो उनके साथ विहार करना। क्योंकि वो छद्मस्थ होने के बावजूद (श्रुत) केवली हैं। सूत्र – १०७०, १०७१ | |||||||||
| Mahanishith | महानिशीय श्रुतस्कंध सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Hindi | 1071 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] निट्ठविय अट्ठमय-ट्ठाणे समिय-कसाए जिइंदिए।
विहरेज्जा तेसिं सद्धिं तु, ते छउमत्थे वि केवली॥ Translated Sutra: देखो सूत्र १०७० | |||||||||
| Mahanishith | महानिशीय श्रुतस्कंध सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Hindi | 1072 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] सुहुमस्स पुढवि-जीवस्स जत्थेगस्स किलामणा।
अप्पारंभं तयं बेंति, गोयमा सव्व-केवली॥ Translated Sutra: हे गौतम ! जहाँ सूक्ष्म पृथ्वीकाय के एक जीव को कीलामणा होती है तो उस को सर्वज्ञ केवली अल्पारंभ कहते हैं। जहाँ छोटे पृथ्वीकाय के एक जीव का प्राण विलय हो उसे सभी केवली महारंभ कहते हैं। एक पृथ्वीकाय के जीव को थोड़ा सा भी मसला जाए तो उससे अशातावेदनीय कर्मबंध होता है कि जो पापशल्य काफी मुश्किल से छोड़ सके। उसी प्रकार | |||||||||
| Mahanishith | महानिशीय श्रुतस्कंध सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Hindi | 1073 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] सुहुमस्स पुढवि-जीवस्स, वावत्ती जत्थ संभवे।
महारंभं तयं बेंति गोयमा सव्वे वि केवली॥ Translated Sutra: देखो सूत्र १०७२ | |||||||||
| Mahanishith | महानिशीय श्रुतस्कंध सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Hindi | 1074 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] पुढवि-काइयं एक्कं दरमलेंतस्स गोयमा ।
असाय-कम्म-बंधो हु दुव्विमोक्खे ससल्लिए॥ Translated Sutra: देखो सूत्र १०७२ | |||||||||
| Mahanishith | महानिशीय श्रुतस्कंध सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Hindi | 1075 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] एवं च आऊ-तेऊ-वाऊ-तह वणस्सती।
तसकाय-मेहुणे तह य, चिक्कणं चिणइ पावगं॥ Translated Sutra: देखो सूत्र १०७२ | |||||||||
| Mahanishith | महानिशीय श्रुतस्कंध सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Hindi | 1076 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] तम्हा मेहुण-संकप्पं पुढवादीणं विराहणं।
जावज्जीवं दुरंत-फलं, तिविहं तिविहेण वज्जए॥ Translated Sutra: देखो सूत्र १०७२ | |||||||||
| Mahanishith | महानिशीय श्रुतस्कंध सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Hindi | 1077 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] ता जे अविदिय-परमत्थे, गोयमा नो य जे मुणे।
तम्हा ते विवज्जेज्जा, दोग्गई-पंथ-दायगे॥ Translated Sutra: इसलिए जो परमार्थ को नहीं जानते और हे गौतम ! जो अज्ञानी हैं, वो दुर्गति के पंथ को देनेवाले ऐसे पृथ्वीकाय आदि कि विराधना गीतार्थ गुरु निश्रा में रहकर संयम आराधना करनी। गीतार्थ के वचन से हलाहल झहर का पान करना। किसी भी विकल्प किए बिना उनके वचन के मुताबिक तत्काल झहर का भी भक्षण कर लेना। परमार्थ से सोचा जाए तो वो विष | |||||||||
| Mahanishith | महानिशीय श्रुतस्कंध सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Hindi | 1078 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] गीयत्थस्स उ वयणेणं, विसं हलाहलं पि वा।
निव्विकप्पो पभक्खेज्जा, तक्खणा जं समुद्दवे॥ Translated Sutra: देखो सूत्र १०७७ | |||||||||
| Mahanishith | महानिशीय श्रुतस्कंध सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Hindi | 1079 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] परमत्थओ विसं तोसं, अमयरसायणं खु तं।
णिव्विकप्पं न संसारे, मओ वि सो अमयस्समो॥ Translated Sutra: देखो सूत्र १०७७ | |||||||||
| Mahanishith | महानिशीय श्रुतस्कंध सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Hindi | 1080 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] अगीयत्थस्स वयणेणं, अमयं पि न घोट्टए।
जेण अयरामरे हविया, जह किलाणो मरिज्जिया॥ Translated Sutra: देखो सूत्र १०७७ | |||||||||
| Mahanishith | महानिशीय श्रुतस्कंध सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Hindi | 1081 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] परमत्थओ न तं अमयं, विसं तं हलाहलं।
ण तेण अयरामरो होज्जा, तक्खणा निहणं वए॥ Translated Sutra: देखो सूत्र १०७७ | |||||||||
| Mahanishith | महानिशीय श्रुतस्कंध सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Hindi | 1082 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] अगीयत्थ-कुसीलेहिं संगं तिविहेण वज्जए।
मोक्ख-मग्गस्सिमे विग्घे, पहम्मी तेणगे जहा॥ Translated Sutra: देखो सूत्र १०७७ | |||||||||
| Mahanishith | महानिशीय श्रुतस्कंध सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Hindi | 1105 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] ता पडिगओ जिणिंदस्स सयासे जा तं न अक्खई।
भुवणेसं जिनवरं, तो वी गणहरं आसी य ट्ठिओ॥ Translated Sutra: उतने में जिनेश्वर के पास जान के लिए नीकला। लेकिन जिनेश्वर को न देखा। इसलिए गणधर भगवंत के पास जाने के लिए प्रयाण किया। जिनेश्वर भगवंत ने बताए हुए सूत्र और मतलब की प्ररूपणा गणधर महाराजा करते हैं। जब यहाँ गणधर महाराजा व्याख्यान करते थे तब उसमें यह आलापक आया कि, ‘एक ही पृथ्वीकाय जीव सर्वत्र उपद्रव पाते हैं। वो | |||||||||
| Mahanishith | મહાનિશીય શ્રુતસ્કંધ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Gujarati | 1070 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] गीयत्थे जे सुसंविग्गे, अणालसी दढव्वए।
अखलिय-चारित्ते सययं राग-दोस-विवज्जिए॥ Translated Sutra: સારી રીતે સંવેગ પામેલા હોય, આળસ રહિત હોય, દૃઢવ્રતી હોય, નિરંતર અસ્ખલિત ચારિત્રી હોય, રાગ – દ્વેષ રહિત હોય, ચારે કષાયોને ઉપશમાવેલા હોય, ઇન્દ્રિયોને જીતનારા હોય એવા ગુણવાળા જે ગીતાર્થ હોય, તેમની સાથે વિહાર કરવો કેમ કે તેઓ છદ્મસ્થ હોવા છતાં શ્રુત. કેવલી છે. સૂત્ર સંદર્ભ– ૧૦૭૦, ૧૦૭૧ | |||||||||
| Mahanishith | મહાનિશીય શ્રુતસ્કંધ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Gujarati | 1071 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] निट्ठविय अट्ठमय-ट्ठाणे समिय-कसाए जिइंदिए।
विहरेज्जा तेसिं सद्धिं तु, ते छउमत्थे वि केवली॥ Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧૦૭૦ | |||||||||
| Mahanishith | મહાનિશીય શ્રુતસ્કંધ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Gujarati | 1072 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] सुहुमस्स पुढवि-जीवस्स जत्थेगस्स किलामणा।
अप्पारंभं तयं बेंति, गोयमा सव्व-केवली॥ Translated Sutra: ગૌતમ ! જ્યાં સૂક્ષ્મ પૃથ્વીકાયના એક જીવને પણ કીલામણા થાય. તો તેને સર્વ કેવલીએ અલ્પારંભ કહેલ છે. જ્યાં નાના પૃથ્વીકાયના એક જીવનો પણ પ્રાણવિયોગ થાય તો તેને સર્વ કેવલીઓ મહારંભ કહે છે. એક પૃથ્વીકાયના જીવને થોડો મસળવામાં આવે તો તેનાથી આશાતા વેદનીય કર્મબંધ થાય કે જે પાપશલ્ય ઘણી મુશ્કેલીથી છોડી શકાય. તે જ પ્રમાણે | |||||||||
| Mahanishith | મહાનિશીય શ્રુતસ્કંધ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Gujarati | 1073 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] सुहुमस्स पुढवि-जीवस्स, वावत्ती जत्थ संभवे।
महारंभं तयं बेंति गोयमा सव्वे वि केवली॥ Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧૦૭૨ | |||||||||
| Mahanishith | મહાનિશીય શ્રુતસ્કંધ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Gujarati | 1074 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] पुढवि-काइयं एक्कं दरमलेंतस्स गोयमा ।
असाय-कम्म-बंधो हु दुव्विमोक्खे ससल्लिए॥ Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧૦૭૨ | |||||||||
| Mahanishith | મહાનિશીય શ્રુતસ્કંધ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-६ गीतार्थ विहार |
Gujarati | 1075 | Gatha | Chheda-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] एवं च आऊ-तेऊ-वाऊ-तह वणस्सती।
तसकाय-मेहुणे तह य, चिक्कणं चिणइ पावगं॥ Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧૦૭૨ | |||||||||