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Global Search for JAIN Aagam & Scriptures| Scripture Name | Translated Name | Mool Language | Chapter | Section | Translation | Sutra # | Type | Category | Action |
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| Saman Suttam | સમણસુત્તં | Sanskrit |
चतुर्थ खण्ड – स्याद्वाद |
३८. प्रमाणसूत्र | Gujarati | 677 | View Detail | ||
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Mool Sutra: ईहा अपोहः विमर्शः मार्गणा च गवेषणा।
संज्ञा स्मृतिः मतिः प्रज्ञा सर्वं आभिनिबोधिकम्।।४।। Translated Sutra: ઈહા, અપોહ, વિમર્શ, માર્ગણા, ગવેષણા, સંજ્ઞા, સ્મૃતિ, મતિ, પ્રજ્ઞા - આ બધાં નામ આભિનિબોધિક જ્ઞાનનાં છે. (પાંચ ઈન્દ્રિયો અને મન દ્વારા થતું જ્ઞાન તે મતિજ્ઞાન છે.) | |||||||||
| Saman Suttam | સમણસુત્તં | Sanskrit |
चतुर्थ खण्ड – स्याद्वाद |
३९. नयसूत्र | Gujarati | 693 | View Detail | ||
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Mool Sutra: तीर्थंकरवचनसंग्रहविशेषप्रस्तार - मूलव्याकरणी।
द्रव्यार्थिकश्च पर्यवनयश्च, शेषाः विकल्पाः एतेषाम्।।४।। Translated Sutra: તીર્થંકરની વાણીના બે મુખ્ય પ્રકાર છે - કેટલાંક વચન વસ્તુના સામાન્ય ધર્મના નિરૂપક છે, બીજાં વિશેષ ધર્મનાં નિરૂપક છે. સામાન્ય ધર્મપ્રતિપાદક દૃષ્ટિકોણને દ્રવ્યાર્થિક નય કહેવાય છે અને વિશેષ ધર્મપ્રતિપાદક કથનને પર્યાયાર્થિક નય કહેવાય છે. બાકીના નયો આ બે ન | |||||||||
| Saman Suttam | સમણસુત્તં | Sanskrit |
चतुर्थ खण्ड – स्याद्वाद |
४१. समन्वयसूत्र | Gujarati | 725 | View Detail | ||
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Mool Sutra: ते सापेक्षाः सुनयाः, निरपेक्षाः ते अपि दुर्नया भवन्ति।
सकलव्यवहारसिद्धिः, सुनयाद् भवति नियमेन।।४।। Translated Sutra: આવાં એકધર્માવલંબી કથનો, જો મનમાં અન્ય દૃષ્ટિકોણોની અપેક્ષા રાખીને કરાતાં હોય તો તે સુનય છે, અન્ય નયોની ઉપેક્ષા સાથે કરાતાં હોય તો તે દુર્નય છે. જગતનો સમગ્ર વ્યવહાર નિશ્ચિતરૂપે સુનય દ્વારા જ સિદ્ધ થાય છે. | |||||||||
| Saman Suttam | સમણસુત્તં | Sanskrit |
चतुर्थ खण्ड – स्याद्वाद |
४२. निक्षेपसूत्र | Gujarati | 740 | View Detail | ||
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Mool Sutra: साकारेतरा स्थापना, कृत्रिमेतरा हि बिम्बजा प्रथमा।
इतरा इतरा भणिता, स्थापनाऽर्हंश्च ज्ञातव्यः।।४।। Translated Sutra: સ્થાપના બે પ્રકારની છે : સાકાર અને નિરાકાર. પ્રતિમા કે ચિત્રરૂપે કોઈ વસ્તુ દર્શાવવી તે સાકાર સ્થાપના. ગમે તે વસ્તુમાં (તેની આકૃતિ મળતી આવતી ન હોય તો પણ) કોઈ વસ્તુની કલ્પના કરવી તે નિરાકાર સ્થાપના. અર્હતની પ્રતિમા તે સાકાર સ્થાપના અર્હત છે, અન્ય કોઈ પ | |||||||||
| Saman Suttam | સમણસુત્તં | Sanskrit |
चतुर्थ खण्ड – स्याद्वाद |
४४. वीरस्तवन | Gujarati | 753 | View Detail | ||
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Mool Sutra: हस्तिप्वेरावणमाहुः ज्ञातं, सिंहो मृगाणां सलिलानां गङ्गा।
पक्षिषु वा गरुडो वैनतेयः निर्वाणवादिनामिह ज्ञातपुत्रः।।४।। Translated Sutra: હાથીઓમાં ઐરાવણ, પશુઓમાં સિંહ, નદીઓમાં ગંગા, પક્ષીઓમાં ગરુડ શ્રેષ્ઠ છે તેમ નિર્વાણના ઉપદેશકોમાં જ્ઞાતપુત્ર મહાવીર શ્રેષ્ઠ છે. | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
१. मङ्गलसूत्र | Hindi | 3 | View Detail | ||
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Mool Sutra: अरहंता लोगुत्तमा।
सिद्धा लोगुत्तमा।
साहू लोगुत्तमा।
केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो।।४।। Translated Sutra: अर्हत् मंगल हैं। सिद्ध मंगल हैं। साधु मंगल हैं। केवलि-प्रणीत धर्म मंगल है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
१. मङ्गलसूत्र | Hindi | 4 | View Detail | ||
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Mool Sutra: अर्हन्तः लोकोत्तमाः।
सिद्धाः लोकोत्तमाः।
साधवः लोकोत्तमाः।
केवलिप्रज्ञप्तः धर्मः लोकोत्तमः।।४।। Translated Sutra: अर्हत् लोकोत्तम हैं। सिद्ध लोकोत्तम हैं। साधु लोकोत्तम हैं। केवलि-प्रणीत धर्म लोकोत्तम है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
२. जिनशासनसूत्र | Hindi | 20 | View Detail | ||
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Mool Sutra: तस्य मुखोद्गतवचनं, पूर्वापरदोषविरहितं शुद्धम्।
`आगम' इति परिकथितं, तेन तु कथिता भवन्ति तत्त्वार्थाः।।४।। Translated Sutra: अर्हत् के मुख से उद्भूत, पूर्वापरदोष-रहित शुद्ध वचनों को आगम कहते हैं। उस आगम में जो कहा गया है वही सत्यार्थ है। (अर्हत् द्वारा उपदिष्ट तथा गणधर द्वारा संकलित श्रुत आगम है।) | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
३. संघसूत्र | Hindi | 28 | View Detail | ||
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Mool Sutra: ज्ञानस्य भवति भागी, स्थिरतरको दर्शने चरित्रे च।
धन्याः गुरुकुलवासं, यावत्कथया न मुञ्चन्ति।।४।। Translated Sutra: संघस्थित साधु ज्ञान का भागी (अधिकारी) होता है, दर्शन व चारित्र में विशेषरूप से स्थिर होता है। वे धन्य हैं जो जीवन-पर्यन्त गुरुकुलवास नहीं छोड़ते। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
४. निरूपणसूत्र | Hindi | 35 | View Detail | ||
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Mool Sutra: यः स्याद्भेदोपचारं, धर्माणां करोति एकवस्तुनः।
स व्यवहारो भणितः, विपरीतो निश्चयो भवति।।४।। Translated Sutra: जो एक अखण्ड वस्तु के विविध धर्मों में कथंचित् (किसी अपेक्षा) भेद का उपचार करता है वह व्यवहारनय है। जो ऐसा नहीं करता, अर्थात् अखण्ड पदार्थ का अनुभव अखण्ड रूप से करता है, वह निश्चय नय है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
५. संसारचक्रसूत्र | Hindi | 48 | View Detail | ||
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Mool Sutra: नरविबुधेश्वरसौख्यं, दुःखं परमार्थतस्तद् ब्रुवते।
परिणामदारुणमशाश्वतं, च यत् तस्मात् अलं तेन।।४।। Translated Sutra: नरेन्द्र-सुरेन्द्रादि का सुख परमार्थतः दुःख ही है। वह है तो क्षणिक, किन्तु उसका परिणाम दारुण होता है। अतः उससे दूर रहना ही उचित है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
६. कर्मसूत्र | Hindi | 59 | View Detail | ||
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Mool Sutra: न तस्य विभजन्ते ज्ञातयः, न मित्रवर्गा न सुता न बान्धवाः।
एकः स्वयं प्रत्यनुभवति दुःखं, कर्तारमेवानुयाति कर्म।।४।। Translated Sutra: ज्ञाति, मित्र-वर्ग, पुत्र और बान्धव उसका दुःख नहीं बँटा सकते। वह स्वयं अकेला दुःख का अनुभव करता है। क्योंकि कर्म कर्त्ता का अनुगमन करता है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
७. मिथ्यात्वसूत्र | Hindi | 70 | View Detail | ||
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Mool Sutra: यो यथावादं न करोति, मिथ्यादृष्टिः ततः खलु कः अन्यः।
वर्धते च मिथ्यात्वं, परस्य शंकां जनयमानः।।४।। Translated Sutra: जो तत्त्व-विचार के अनुसार नहीं चलता, उससे बड़ा मिथ्यादृष्टि और दूसरा कौन हो सकता है ? वह दूसरों को शंकाशील बनाकर अपने मिथ्यात्व को बढ़ाता रहता है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
८. राग-परिहारसूत्र | Hindi | 74 | View Detail | ||
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Mool Sutra: तद् यदीच्छसि गन्तुं, तीरं भवसागरस्य घोरस्य।
तर्हि तपःसंयमभाण्डं, सुविहित ! गृहाण त्वरमाणः।।४।। Translated Sutra: यदि तू घोर भवसागर के पार (तट पर) जाना चाहता है, तो हे सुविहित ! शीघ्र ही तप-संयमरूपी नौका को ग्रहण कर। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
९. धर्मसूत्र | Hindi | 85 | View Detail | ||
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Mool Sutra: क्रोधेन यः न तप्यते, सुरनरतिर्यग्भिः क्रियमाणेऽपि।
उपसर्गे अपि रौद्रे, तस्य क्षमा निर्मला भवति।।४।। Translated Sutra: देव, मनुष्य और तिर्यञ्चों (पशुओं) के द्वारा घोर व भयानक उपसर्ग पहुँचाने पर भी जो क्रोध से तप्त नहीं होता, उसको निर्मल क्षमाधर्म होता है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
९. धर्मसूत्र | Hindi | 121 | View Detail | ||
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Mool Sutra: आत्मानं जानाति आत्मा, यथास्थितो आत्मसाक्षिको धर्मः।
आत्मा करोति तं तथा, यथा आत्मसुखापको भवति।।४०।। Translated Sutra: आत्मा ही यथास्थित (निजस्वरूप में स्थित) आत्मा को जानता है। अतएव स्वभावरूप धर्म भी आत्मसाक्षिक होता है। इस धर्म का पालन (अनुभवन) आत्मा उसी विधि से करता है, जिससे कि वह अपने लिए सुखकारी हो। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
१०. संयमसूत्र | Hindi | 125 | View Detail | ||
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Mool Sutra: यः सहस्रं सहस्राणां, सङ्ग्रामे दुर्जये जयेत्।
एकं जयेदात्मानम्, एष तस्य परमो जयः।।४।। Translated Sutra: जो दुर्जेय संग्राम में हजारों-हजार योद्धाओं को जीतता है, उसकी अपेक्षा जो एक अपने को जीतता है उसकी विजय ही परमविजय है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
११. अपरिग्रहसूत्र | Hindi | 143 | View Detail | ||
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Mool Sutra: मिथ्यात्ववेदरागाः, तथैव हासादिकाः च षड्दोषाः।
चत्वारस्तथा कषायाः, चतुर्दश अभ्यन्तराः ग्रन्थाः।।४।। Translated Sutra: परिग्रह दो प्रकार का है--आभ्यन्तर और बाह्य। - आभ्यन्तर परिग्रह चौदह प्रकार का है : १. मिथ्यात्व, २. स्त्रीवेद, ३. पुरुषवेद, ४. नपुंसकवेद, ५. हास्य, ६. रति, ७. अरति, ८. शोक, ९. भय, १०. जुगुप्सा, ११. क्रोध, १२. मान, १३. माया, १४. लोभ। बाह्य परिग्रह दस प्रकार का है : १. खेत, २. मकान, ३. धन-धान्य, ४. वस्त्र, ५. भाण्ड, ६. दास-दासी, ७. पशु, ८. यान, | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
१२. अहिंसासूत्र | Hindi | 150 | View Detail | ||
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Mool Sutra: यथा ते न प्रियं दुःखं, ज्ञात्वैवमेव सर्वजीवानाम्।
सर्वादरमुपयुक्तः, आत्मौपम्येन कुरु दयाम्।।४।। Translated Sutra: जैसे तुम्हें दुःख प्रिय नहीं है, वैसे ही सब जीवों को दुःख प्रिय नहीं है--ऐसा जानकर, पूर्ण आदर और सावधानीपूर्वक, आत्मौपम्य की दृष्टि से सब पर दया करो। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
१३. अप्रमादसूत्र | Hindi | 163 | View Detail | ||
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Mool Sutra: सुप्तेषु चापि प्रतिबुद्धजीवी, न विश्वसेत् पण्डित आशुप्रज्ञः।
घोराः मुहूर्त्ता अबलं शरीरम्, भारण्डपक्षीव चरेद् अप्रमत्तः।।४।। Translated Sutra: आशुप्रज्ञ पंडित सोये हुए व्यक्तियों के बीच भी जागृत रहे, प्रमाद में विश्वास न करे। मुहूर्त बड़े घोर (निर्दयी) होते हैं, शरीर दुर्बल है, इसलिए वह भारण्ड पक्षी की भाँति अप्रमत्त होकर विचरण करे। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
१४. शिक्षासूत्र | Hindi | 173 | View Detail | ||
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Mool Sutra: नाशीलो न विशीलः, न स्यादतिलोलुपः।
अक्रोधनः सत्यरतः, शिक्षाशील इत्युच्यते।।४।। Translated Sutra: कृपया देखें १७२; संदर्भ १७२-१७३ | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
१५. आत्मसूत्र | Hindi | 180 | View Detail | ||
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Mool Sutra: सशरीराः अर्हन्तः, केवलज्ञानेन ज्ञातसकलार्थाः।
ज्ञानशरीराः सिद्धाः, सर्वोत्तमसौख्यसंप्राप्ताः।।४।। Translated Sutra: केवलज्ञान से समस्त पदार्थों को जाननेवाले स-शरीरी जीव अर्हत् हैं तथा सर्वोत्तम सुख (मोक्ष) को संप्राप्त ज्ञान-शरीरी जीव सिद्ध कहलाते हैं। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
१६. मोक्षमार्गसूत्र | Hindi | 195 | View Detail | ||
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Mool Sutra: व्रतसमितिगुप्तीः शीलतपः जिनवरैः प्रज्ञप्तम्।
कुर्वन् अपि अभव्यः अज्ञानी मिथ्यादृष्टिस्तु।।४।। Translated Sutra: जिनेन्द्रदेव द्वारा प्ररूपित व्रत, समिति, गुप्ति, शील और तप का आचरण करते हुए भी अभव्य जीव अज्ञानी और मिथ्यादृष्टि ही है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
१७. रत्नत्रयसूत्र | Hindi | 211 | View Detail | ||
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Mool Sutra: नादर्शनिनो ज्ञानं, ज्ञानेन विना न भवन्ति चरणगुणाः।
अगुणिनो नास्ति मोक्षः, नास्त्यमोक्षस्य निर्वाणम्।।४।। Translated Sutra: सम्यग्दर्शन के बिना ज्ञान नहीं होता। ज्ञान के बिना चारित्रगुण नहीं होता। चारित्रगुण के बिना मोक्ष (कर्मक्षय) नहीं होता और मोक्ष के बिना निर्वाण (अनंतआनंद) नहीं होता। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
१८. सम्यग्दर्शनसूत्र | Hindi | 222 | View Detail | ||
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Mool Sutra: सम्यक्त्वविरहिता णं, सुष्ठु अपि उग्रं तपः चरन्तः णं।
न लभन्ते बोधिलाभं, अपि वर्षसहस्रकोटिभिः।।४।। Translated Sutra: सम्यक्त्वविहीन व्यक्ति हजारों-करोड़ वर्षों तक भलीभाँति उग्र तप करने पर भी बोधिलाभ प्राप्त नहीं करता। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
१९. सम्यग्ज्ञानसूत्र | Hindi | 248 | View Detail | ||
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Mool Sutra: सूची यथा ससूत्रा, न नश्यति कचवरे पतिताऽपि।
जीवोऽपि तथा ससूत्रो, न नश्यति गतोऽपि संसारे।।४।। Translated Sutra: जैसे धागा पिरोयी हुई सुई कचरे में गिर जाने पर भी खोती नहीं है, वैसे ही ससूत्र अर्थात् शास्त्रज्ञानयुक्त जीव संसार में पड़कर भी नष्ट नहीं होता। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२०. सम्यक्चारित्रसूत्र | Hindi | 265 | View Detail | ||
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Mool Sutra: सत्क्रियाविरहात् ईप्सित संप्रापकं न ज्ञानमिति।
मार्गज्ञो वाऽचेष्टो, वातविहीनोऽथवा पोतः।।४।। Translated Sutra: (शास्त्र द्वारा मोक्षमार्ग को जान लेने पर भी) सत्क्रिया से रहित ज्ञान इष्ट लक्ष्य प्राप्त नहीं करा सकता। जैसे मार्ग का जानकार पुरुष इच्छित देश की प्राप्ति के लिए समुचित प्रयत्न न करे तो वह गन्तव्य तक नहीं पहुँच सकता अथवा अनुकूल वायु की प्रेरणा के अभाव में जलयान इच्छित स्थान तक नहीं पहुँच सकता। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२१. साधनासूत्र | Hindi | 291 | View Detail | ||
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Mool Sutra: आहारमिच्छेद् मितमेषणीयं, सखायमिच्छेद् निपुणार्थबुद्धिम्।
निकेतमिच्छेद् विवेकयोग्यं, समाधिकामः श्रमणस्तपस्वी।।४।। Translated Sutra: समाधि का अभिलाषी तपस्वी श्रमण परिमित तथा एषणीय आहार की ही इच्छा करे, तत्त्वार्थ में निपुण (प्राज्ञ) साथी को ही चाहे तथा विवेकयुक्त अर्थात् विविक्त (एकान्त) स्थान में ही निवास करे। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२२. द्विविध धर्मसूत्र | Hindi | 299 | View Detail | ||
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Mool Sutra: नो खल्वहं तथा संशक्नोमि मुण्डो यावत् प्रव्रजितुम्।
अहं खलु देवानुप्रियाणाम् अन्तिके पञ्चानुव्रतिकम् सप्तशिक्षाव्रतिकंद्वादशविधम् गृहिधर्मं प्रतिपत्स्ये।।४।। Translated Sutra: मैं मुण्डित (प्रव्रजित) होकर अनगारधर्म स्वीकार करने में असमर्थ हूँ, अतः मैं जिनेन्द्रदेव द्वारा प्ररूपित द्वादशव्रतयुक्त श्रावकधर्म कों अंगीकार करुुंगा। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२३. श्रावकधर्मसूत्र | Hindi | 304 | View Detail | ||
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Mool Sutra: मांसाशनेन वर्धते दर्पः दर्पेण मद्यम् अभिलषति।
द्यूतम् अपि रमते ततः तद् अपि वर्णितान् प्राप्नोति दोषान्।।४।। Translated Sutra: मांसाहार से दर्प बढ़ता है। दर्प से मनुष्य में मद्यपान की अभिलाषा जागती है और तब वह जुआ भी खेलता है। इस प्रकार (एक मांसाहार से ही) मनुष्य उक्त वर्णित सर्व दोषों को प्राप्त हो जाता है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२४. श्रमणधर्मसूत्र | Hindi | 339 | View Detail | ||
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Mool Sutra: ज्ञानदर्शनसम्पन्नं, संयमे च तपसि रतम्।
एवं गुणसमायुक्तं, संयतं साधुमालपेत्।।४।। Translated Sutra: ज्ञान और दर्शन से सम्पन्न, संयम और तप में लीन तथा इसी प्रकार के गुणों से युक्त संयमी को ही साधु कहना चाहिए। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२५. व्रतसूत्र | Hindi | 367 | View Detail | ||
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Mool Sutra: कुलयोनिजीवमार्गणा-स्थानादिषु ज्ञात्वा जीवानाम्।
तस्यारम्भनिवर्तनपरिणामो भवति प्रथमव्रतम्।।४।। Translated Sutra: कुल, योनि, जीवस्थान, मार्गणास्थान आदि में जीवों को जानकर उनसे सम्बन्धित आरम्भ से निवृत्तिरूप (आभ्यन्तर) परिणाम प्रथम अहिंसाव्रत है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२६. समिति-गुप्तिसूत्र | Hindi | 387 | View Detail | ||
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Mool Sutra: यथा गुप्तस्य ईर्यादि (जन्या) न भवन्ति दोषाः, तथैव समितस्य।
गुप्तिस्थितो प्रमादं, रुणद्धि समिति (स्थितः) सचेष्टस्य।।४।। Translated Sutra: | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२७. आवश्यकसूत्र | Hindi | 420 | View Detail | ||
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Mool Sutra: वचनमयं प्रतिक्रमणं, वचनमयं प्रत्याख्यानं नियमश्च।
आलोचनं वचनमयं, तत्सर्वं जानीहि स्वाध्यायम्।।४।। Translated Sutra: (परन्तु) वचनमय प्रतिक्रमण, वचनमय प्रत्याख्यान, वचनमय नियम और वचनमय आलोचना--ये सब तो केवल स्वाध्याय हैं (चारित्र नहीं हैं)। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२८. तपसूत्र | Hindi | 442 | View Detail | ||
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Mool Sutra: कर्मणां निर्जरार्थम्, आहारं परिहरति लीलया।
एकदिनादिप्रमाणं, तस्य तपः अनशनं भवति।।४।। Translated Sutra: जो कर्मों की निर्जरा के लिए एक-दो दिन आदिका (यथाशक्ति) प्रमाण तय करके आहार का त्याग करता है, उसके अनशन तप होता है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२८. तपसूत्र | Hindi | 478 | View Detail | ||
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Mool Sutra: ज्ञानेन ध्यानसिद्धिः ध्यानात् सर्वकर्मनिर्जरणम्।
निर्जरणफलं मोक्षः ज्ञानाभ्यासं ततः कुर्यात्।।४०।। Translated Sutra: ज्ञान से ध्यान की सिद्धि होती है। ध्यान से सब कर्मों की निर्जरा होती है। निर्जरा का फल मोक्ष है। अतः सतत ज्ञानाभ्यास करना चाहिए। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२८. तपसूत्र | Hindi | 479 | View Detail | ||
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Mool Sutra: द्वादशविधेऽपि तपसि, साभ्यन्तरबाह्ये कुशलदृष्टे।
नापि अस्ति नापि च भविष्यति, स्वाध्यायसमं तपःकर्म।।४१।। Translated Sutra: बाह्याभ्यन्तर बारह तपों में स्वाध्याय के समान तप न तो है, न हुआ है, न होगा। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२८. तपसूत्र | Hindi | 480 | View Detail | ||
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Mool Sutra: शयनासनस्थाने वा, यस्तु भिक्षुर्न व्याप्रियते।
कायस्य व्युत्सर्गः, षष्ठः स परिकीर्तितः।।४२।। Translated Sutra: भिक्षु का शयन, आसन और खड़े होने में व्यर्थ का कायिक व्यापार न करना, काष्ठवत् रहना, छठा कायोत्सर्ग तप है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२८. तपसूत्र | Hindi | 481 | View Detail | ||
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Mool Sutra: देहमति-जाड्यशुद्धिः सुखदुःख-तितिक्षता अनुप्रेक्षा।
ध्यायति च शुभं ध्यानं एकाग्रः कायोत्सर्गे।।४३।। Translated Sutra: कायोत्सर्ग करने से ये लाभ प्राप्त होते हैं -- १. देहजाड्यशुद्धि--श्लेष्म आदि दोषों के क्षीण होने से देह की जड़ता नष्ट होती है। २. मतिजाड्यशुद्धि-जागरूकता के कारण बुद्धि की जड़ता नष्ट होती है। ३. सुख-दुःख तितिक्षा-सुख-दुःख को सहने की शक्ति का विकास होता है। ४. अनुप्रेक्षा-भावनाओं के लिए समुचित अवसर का लाभ होता है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२८. तपसूत्र | Hindi | 482 | View Detail | ||
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Mool Sutra: तेषामपि तपो न शुद्धं, निष्क्रान्ताः ये महाकुलाः।
यद् नैवाऽन्ये विजानन्ति, न श्लोकं प्रवेदयेत्।।४४।। Translated Sutra: उन महाकुलवालों का तप भी शुद्ध नहीं है, जो प्रव्रज्या धारणकर पूजा-सत्कार के लिए तप करते हैं। इसलिए कल्याणार्थी को इस तरह तप करना चाहिए कि दूसरे लोगों को पता तक न चले। अपने तप की किसीके समक्ष प्रशंसा भी नहीं करनी चाहिए। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२८. तपसूत्र | Hindi | 483 | View Detail | ||
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Mool Sutra: ज्ञानमयवातसहितं, शीलोज्ज्वलितं तपो मतोऽग्निः।
संसारकरणबीजं,दहति दवाग्निरिव तृणराशिम्।।४५।। Translated Sutra: ज्ञानमयी वायुसहित तथा शील द्वारा प्रज्वलित तपोमयी अग्नि संसार के कारणभूत कर्म-बीज को वैसे ही जला डालती है, जैसे वन में लगी प्रचण्ड आग तृण-राशि को। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२९. ध्यानसूत्र | Hindi | 487 | View Detail | ||
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Mool Sutra: यस्य न विद्यते रागो, द्वेषो मोहो वा योगपरिकर्म।
तस्य शुभाशुभदहनो, ध्यानमयो जायते अग्निः।।४।। Translated Sutra: जिसके राग-द्वेष और मोह नहीं है तथा मन-वचन-कायरूप योगों का व्यापार नहीं रह गया है, उसमें समस्त शुभाशुभ कर्मों को जलानेवाली ध्यानाग्नि प्रकट होती है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
३०. अनुप्रेक्षासूत्र | Hindi | 508 | View Detail | ||
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Mool Sutra: त्यक्त्वा महामोहं, विषयान् ज्ञात्वा भङ्गुरान् सर्वान्।
निर्विषयं कुरुत मनः, येन सुखमुत्तमं लभध्वम्।।४।। Translated Sutra: महामोह को तजकर तथा सब इन्द्रिय-विषयों को क्षण-भंगुर जानकर मन को निर्विषय बनाओ, ताकि उत्तम सुख प्राप्त हो। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
३१. लेश्यासूत्र | Hindi | 534 | View Detail | ||
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Mool Sutra: कृष्णा नीला कापोता, तिस्रोऽप्येता अधर्मलेश्याः।
एताभिस्तिसृभिरपि जीवो, दुर्गतिमुपपद्यते बहुशः।।४।। Translated Sutra: कृष्ण, नील और कापोत ये तीनों अधर्म या अशुभ लेश्याएँ हैं। इनके कारण जीव विविध दुर्गतियों में उत्पन्न होता है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
३२. आत्मविकाससूत्र (गुणस्थान) | Hindi | 549 | View Detail | ||
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Mool Sutra: तद् मिथ्यात्वं यदश्रद्धानं, तत्त्वानां भवति अर्थानाम्।
संशयितमभिगृहीतम-नभिगृहीतं तु तत् त्रिविधम्।।४।। Translated Sutra: तत्त्वार्थ के प्रति श्रद्धा का अभाव मिथ्यात्व है। यह तीन प्रकार का है--संशयित, अभिगृहीत और अनभिगृहीत। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
तृतीय खण्ड - तत्त्व-दर्शन |
३४. तत्त्वसूत्र | Hindi | 591 | View Detail | ||
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Mool Sutra: जीवा अजीवाश्च बन्धश्च, पुण्यं पापास्रवः तथा।
संवरो निर्जरा मोक्षः, सन्त्येते तथ्या नव।।४।। Translated Sutra: जीव, अजीव, बन्ध, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा और मोक्ष--ये नौ तत्त्व या पदार्थ हैं। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
तृतीय खण्ड - तत्त्व-दर्शन |
३५. द्रव्यसूत्र | Hindi | 627 | View Detail | ||
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Mool Sutra: जीवाः पुद्गलकायाः, सह सक्रिया भवन्ति न च शेषाः।
पुद्गलकरणाः जीवाः, स्कन्धाः खलु कालकरणास्तु।।४।। Translated Sutra: जीव और पुद्गलकाय ये दो द्रव्य सक्रिय हैं। शेष सब द्रव्य निष्क्रिय हैं। जीव के सक्रिय होने का बाह्य साधन कर्म नोकर्मरूप पुद्गल है और पुद्गल के सक्रिय होने का बाह्य साधन कालद्रव्य है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
तृतीय खण्ड - तत्त्व-दर्शन |
३६. सृष्टिसूत्र | Hindi | 654 | View Detail | ||
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Mool Sutra: अवगाढगाढनिचितः, पुद्गलकायैः सर्वतो लोकः।
सूक्ष्मैर्बादरैश्चा-प्रायोग्यैर्योग्यैः।।४।। Translated Sutra: यह लोक सब ओर से इन सूक्ष्म-बादर पुद्गल-स्कन्धों से ठसाठस भरा हुआ है। उनमें से कुछ पुद्गल कर्मरूप से परिणमन के योग्य होते हैं और कुछ अयोग्य होते हैं। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
चतुर्थ खण्ड – स्याद्वाद |
३७. अनेकान्तसूत्र | Hindi | 663 | View Detail | ||
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Mool Sutra: न भवो भङ्गविहीनो, भङ्गो वा नास्ति सम्भवविहीनः।
उत्पादोऽपि च भङ्गो, न विना ध्रौव्येणार्थेन।।४।। Translated Sutra: उत्पाद व्यय के बिना नहीं होता और व्यय उत्पाद के बिना नहीं होता। इसी प्रकार उत्पाद और व्यय दोनों त्रिकालस्थायी ध्रौव्य अर्थ (आधार) के बिना नहीं होते। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
चतुर्थ खण्ड – स्याद्वाद |
३८. प्रमाणसूत्र | Hindi | 677 | View Detail | ||
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Mool Sutra: ईहा अपोहः विमर्शः मार्गणा च गवेषणा।
संज्ञा स्मृतिः मतिः प्रज्ञा सर्वं आभिनिबोधिकम्।।४।। Translated Sutra: ईहा, अपोह, मीमांसा, मार्गणा, गवेषणा, संज्ञा, शक्ति, मति और प्रज्ञा--ये सब आभिनिबोधिक या मतिज्ञान हैं। | |||||||||