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Global Search for JAIN Aagam & Scriptures| Scripture Name | Translated Name | Mool Language | Chapter | Section | Translation | Sutra # | Type | Category | Action |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| Jambudwippragnapati | जंबुद्वीप प्रज्ञप्ति सूत्र | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Hindi | 341 | Gatha | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] छप्पन्नं खलु भाए, विच्छिण्णं चंदमंडलं होइ ।
अट्ठावीसं भाए, बाहल्लं तस्स बोद्धव्वं ॥ Translated Sutra: गौतम ! चन्द्रविमान ५६/६१ योजन चौड़ा, उतना ही लम्बा तथा २८/६१ योजन ऊंचा है। | |||||||||
| Jambudwippragnapati | जंबुद्वीप प्रज्ञप्ति सूत्र | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Hindi | 342 | Gatha | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] अडयालीसं भाए, विच्छिण्णं सूरमंडलं होइ ।
चउवीसं खलु भाए, बाहल्लं तस्स बोद्धव्वं ॥ Translated Sutra: सूर्यविमान ४८/६१ योजन चौड़ा, उतना ही लम्बा तथा २४/६१ योजन ऊंचा है। | |||||||||
| Jambudwippragnapati | जंबुद्वीप प्रज्ञप्ति सूत्र | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Hindi | 343 | Gatha | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] दो कोसे य गहाणं, नक्खत्ताणं तु हवइ तस्सद्धं ।
तस्सद्धं ताराणं, तस्सद्धं चेव बाहल्लं ॥ Translated Sutra: ग्रहों, नक्षत्रों तथा ताराओं के विमान क्रमशः २ कोश, १ कोश तथा १/२ कोश विस्तीर्ण हैं। ऊंचाई उन से आधी होती है। | |||||||||
| Jambudwippragnapati | जंबुद्वीप प्रज्ञप्ति सूत्र | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Hindi | 344 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] चंदविमानं भंते! कइ देवसाहस्सीओ परिवहंति? गोयमा! सोलस देवसाहस्सीओ परिवहंति–चंदविमानस्स णं पुरत्थिमेणं सेयाणं सुभगाणं सुप्पभाणं संखतल विमलनिम्मलदहिधण गोखीर फेण रययणिगरप्पगासाणं थिरलट्ठपउट्ठ वट्ट पीवरसु-सिलिट्ठविसिट्ठतिक्खदाढाविडंबियमुहाणं रत्तुप्पल-पत्तमउयसूमालतालुजीहाणं महुगुलियपिंगलक्खाणं पीवरवरोरुपडिपुण्णविउलखंधाणं मिउविसय-सुहुमलक्खणपसत्थवरवण्णकेसरसडोवसोहियाणं ऊसिय सुणमिय सुजाय अप्फोडिय नंगूलाणं वइरामयणक्खाणं वइरामयदाढाणं वइरामयदंताणं तवणिज्जजीहाणं तवणिज्जतालुयाणं तवणिज्ज जोत्तगसुजोइयाणं कामगमाणं पीइगमाणं मनोगमाणं मनोरमाणं Translated Sutra: भगवन् ! चन्द्रविमान को कितने हजार देव परिवहन करते हैं ? गौतम ! सोलह हजार, चन्द्रविमान के पूर्व में श्वेत, सुभग, जनप्रिय, सुप्रभ, शंख के मध्यभाग, जमे हुए दहीं, गाय के दूध के झाग तथा रजतनिकर, उज्ज्वल दीप्तियुक्त, स्थिर, लष्ट, प्रकोष्ठक, वृत्त, पीवर, सुश्लिष्ट, विशिष्ट, तीक्ष्ण, दंष्ट्राओं प्रकटित मुखयुक्त, रक्तोत्पल, | |||||||||
| Jambudwippragnapati | जंबुद्वीप प्रज्ञप्ति सूत्र | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Hindi | 345 | Gatha | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] सोलसदेवसहस्सा, हवंति चंदेसु चेव सूरेसु ।
अट्ठेव सहस्साइं, एक्केक्कंमी गहविमाने ॥ Translated Sutra: चार – चार हजार सिंहरूपधारी देव, चार – चार हजार गजरूपधारी देव, चार – चार हजार वृषभरूपधारी देव तथा चार – चार हजार अश्वरूपधारी देव – कुल सोलह हजार देव सूर्य विमानों का परिवहन करते हैं। ग्रहों के विमानों का दो – दो हजार सिंहरूपधारी देव, दो – दो हजार गजरूपधारी देव, दो – दो हजार वृषभरूपधारी देव और दो – दो हजार अश्वरूपधारी | |||||||||
| Jambudwippragnapati | जंबुद्वीप प्रज्ञप्ति सूत्र | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Hindi | 346 | Gatha | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] चत्तारि सहस्साइं, नक्खत्तंमि य हवंति इक्किक्के ।
दो चेव सहस्साइं, तारारूवेक्कमेक्कंमि ॥ Translated Sutra: नक्षत्रों के विमानों का एक – एक हजार सिंहरूपधारी देव, एक – एक हजार गजरूपधारी देव, एक – एक हजार वृषभरूपधारी देव एवं एक – एक हजार अश्वरूपधारी देव – कुल चार – चार हजार देव परिवहन करते हैं। तारों के विमानों का पाँच – पाँच सौ सिंहरूपधारी देव, पाँच – पाँच सौ गजरूपधारी देव, पाँच – पाँच सौ वृषभरूपधारी देव तथा पाँच – पाँच | |||||||||
| Jambudwippragnapati | जंबुद्वीप प्रज्ञप्ति सूत्र | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Hindi | 347 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] एवं सूरविमानाणं जाव तारारूवविमानाणं, नवरं–एस देवसंघाए। Translated Sutra: उपर्युक्त चन्द्र – विमानों के वर्णन के अनुरूप सूर्य – विमान यावत् तारा – विमानों का वर्णन है। | |||||||||
| Jambudwippragnapati | जंबुद्वीप प्रज्ञप्ति सूत्र | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Hindi | 351 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] चंदस्स णं भंते! जोइसिंदस्स जोइसरन्नो कइ अग्गमहिसीओ पन्नत्ताओ? गोयमा! चत्तारि अग्गमहिसीओ पन्नत्ताओ, तं जहा–चंदप्पभा दोसिनाभा अच्चिमाली पभंकरा। तओ णं एगमेगाए देवीए चत्तारि-चत्तारि देवीसहस्साइं परिवारो पण्णत्तो। पभू णं ताओ एगमेगा देवी अन्नं देवीसहस्सं परिवारो विउव्वित्तए। एवामेव सपुव्वावरेणं सोलस देवी सहस्सा। सेत्तं तुडिए।
पभू णं भंते! चंदे जोइसिंदे जोइसराया चंदवडेंसए विमाने चंदाए रायहानीए सभाए सुहम्माए तुडिएणं सद्धिं महयाहयनट्ट गीय वाइय तंती तल ताल तुडिय घण मुइंगपडुप्पवाइयरवेणं दिव्वाइं भोगभोगाइं भुंजमाणे विहरित्तए? गोयमा! नो इणट्ठे समट्ठे।
से केणट्ठेणं Translated Sutra: भगवन् ! ज्योतिष्क देवों के इन्द्र, ज्योतिष्क देवों के राजा चन्द्र के कितनी अग्रमहिषियाँ हैं ? गौतम ! चार – चन्द्रप्रभा, ज्योत्सनाभा, अर्चिमाली तथा प्रभंकरा। उनमें से एक – एक अग्रमहिषी का चार – चार हजार देवी – परिवार है। एक – एक अग्रमहिषी अन्य सहस्र देवियों की विकुर्वणा करने में समर्थ होती है। यों विकुर्वणा | |||||||||
| Jambudwippragnapati | जंबुद्वीप प्रज्ञप्ति सूत्र | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Hindi | 355 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] चंदविमाने णं भंते! देवाणं केवइयं कालं ठिई पन्नत्ता? गोयमा! जहन्नेणं चउभागपलिओवमं, उक्कोसेणं पलिओवमं वाससयसहस्समब्भहियं।
चंदविमाने णं देवीणं जहन्नेणं चउभागपलिओवमं, उक्कोसेणं अद्धपलिओवमं पन्नासाए वाससहस्सेहिमब्भहियं
सूरविमाने देवाणं जहन्नेणं चउब्भागपलिओवमं, उक्कोसेणं पलिओवमं वाससहस्समब्भहियं।
सूरविमाने देवीणं जहन्नेणं चउब्भागपलिओवमं, उक्कोसेणं अद्धपलिओवमं पंचहिं वाससएहिं अब्भहियं।
गहविमाने देवाणं जहन्नेणं चउब्भागपलिओवमं, उक्कोसेणं पलिओवमं।
गहविमाने देवीणं जहन्नेणं चउब्भागपलिओवमं, उक्कोसेणं अद्धपलिओवमं।
नक्खत्तविमाने देवाणं जहन्नेणं चउब्भागपलिओवमं, Translated Sutra: भगवन् ! चन्द्र – विमान में देवों की स्थिति कितने काल की होती है ? गौतम ! चन्द्र – विमान में देवों की स्थिति जघन्य – १/४ पल्योपम तथा उत्कृष्ट एक लाख वर्ष अधिक एक पल्योपम, देवियों की स्थिति जघन्य १/४ पल्योपम तथा उत्कृष्ट – पचास हजार वर्ष अधिक अर्ध पल्योपम होती है। सूर्य – विमान में देवों की स्थिति जघन्य १/४ पल्योपम | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार २ काळ |
Gujarati | 46 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] उसभे णं अरहा कोसलिए वज्जरिसहनारायसंघयणे समचउरंससंठाणसंठिए पंच धनुसयाइं उड्ढं उच्चत्तेणं होत्था।
उसभे णं अरहा कोसलिए वीसं पुव्वसयसहस्साइं कुमारवासमज्झावसित्ता, तेवट्ठिं पुव्वसय-सहस्साइं रज्जवासमज्झा वसित्ता, तेसीइं पुव्वसयसहस्साइं अगारवासमज्झावसित्ता मुंडे भवित्ता अगाराओ अनगारियं पव्वइए।
उसभे णं अरहा कोसलिए एगं वाससहस्सं छउमत्थपरियायं पाउणित्ता, एगं पुव्वसयसहस्सं वाससहस्सूणं केवलिपरियायं पाउणित्ता, एगं पुव्वसयसहस्सं बहुपडिपुण्णं सामण्णपरियायं पाउणित्ता, चउरासीइं पुव्वसयसहस्साइं सव्वाउयं पालइत्ता जेसे हेमंताणं तच्चे मासे पंचमे पक्खे Translated Sutra: કૌશલિક ઋષભ અરહંત વજ્રઋષભનારાચ સંઘયણી, સમચતુરસ્ર સંસ્થાનથી સંસ્થિત, ૫૦૦ ધનુષ ઉર્ધ્વ ઊંચા હતા. ઋષભ અરહંત ૨૦ લાખ પૂર્વ કુમારવાસ મધ્યે રહીને, ૬૩ લાખ પૂર્વ મહારાજાપણે રહીને, એમ કુલ ૮૩ લાખ પૂર્વ ગૃહવાસમાં રહીને મુંડ થઈને ગૃહત્યાગ કરી સાધુપણે દીક્ષા લીધી. ઋષભ અરહંત ૧૦૦૦ વર્ષ છદ્મસ્થ પર્યાય પાળીને, એક લાખ પૂર્વમાં | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ३ भरतचक्री |
Gujarati | 55 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तत्थ णं विनीयाए रायहानीए भरहे नामं राया चाउरंतचक्कवट्टी समुप्पज्जित्था–महयाहिमवंत महंत मलय मंदर महिंदसारे जाव रज्जं पसासेमाणे विहरइ।
बिइओ गमो रायवण्णगस्स इमो–तत्थ असंखेज्जकालवासंतरेण उपज्जए जसंसो उत्तमे अभिजाए सत्त-वीरियपरक्कमगुणे पसत्थवण्ण सर सार संघयण बुद्धि धारण मेहा संठाण सील प्पगई पहाणगारवच्छायागइए अनेगवयणप्पहाणे तेय आउ बल वीरियजुत्ते अझुसिरघननिचिय-लोहसंकल नारायवइरउसहसंघयणदेहधारी झस-जुग भिंगार वद्धमाणग भद्दासण संख छत्त वीयणि पडाग चक्क नंगल मुसल रह सोत्थिय अंकुस चंदाइच्च अग्गि जूव सागर इंदज्झय पुहवि पउम कुंजर सीहासन दंड कुम्भ गिरिवर तुरगवर Translated Sutra: ત્યાં વિનીતા રાજધાનીમાં ભરત નામે ચાતુરંત ચક્રવર્તી રાજા ઉત્પન્ન થયો. તે મહાહિમવંત, મહંત, મલય, મંદર સદૃશ યાવત્ રાજ્યને પ્રશાસિત કરતો વિચરતો હતો. રાજાના વર્ણનનો બીજો આલાવો આ પ્રમાણે છે – ત્યાં અસંખ્ય કાળના વાસ પછી ભરત ચક્રવર્તી ઉત્પન્ન થયો. તે યશસ્વી, ઉત્તમ, અભિજાત, સત્વ – વીર્ય – પરાક્રમ ગુણવાળો, પ્રશસ્ત – | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ३ भरतचक्री |
Gujarati | 85 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से भरहे राया उप्पिं विजयखंधावारस्स जुगमुसलमुट्ठिप्पमाणमेत्ताहिं धाराहिं ओघमेघं सत्तरत्तं वासं वासमाणं पासइ, पासित्ता चम्मरयणं परामुसइ– तए णं तं सिरिवच्छसरिसरूवं मुत्ततारद्ध-चंदचित्तं अयलमकंपं अभेज्जकवयं जंतं सलिलासु सागरेसु य उत्तरणं दिव्वं चम्मरयणं, सणसत्तर-साइं सव्वधण्णाइं जत्थ रोहंति एगदिवसेण वावियाइं, वासं णाऊण चक्कवट्टिणा परामुट्ठे दिव्वे चम्मरयणे दुवालसजोयणाइं तिरियं पवित्थरइ तत्थ साहियाइं।
तए णं से भरहे राया सखंधारबले चम्मरयणं दुरुहइ, दुरुहित्ता दिव्वं छत्तरयणं परामुसइ– तए णं नवनउइसहस्स-कंचनसलागपरिमंडियं महरिहं अओज्झं निव्वण Translated Sutra: સૂત્ર– ૮૫. ત્યારે તે ભરતરાજા, વિજય સ્કંધાવારની ઉપર યુગમુશલ મુષ્ટિ પ્રમાણમાત્ર ધારાથી સાત રાત્રિ ઓઘમેઘ વર્ષા વરસાવતા જુએ છે. જોઈને ચર્મરત્નને સ્પર્શે છે. ત્યારે અહી શ્રીવત્સ સદૃશરૂપ આલાવો કહેવો યાવત્ બાર યોજન તીર્છુ વિસ્તારે છે – ફેલાવે છે. ત્યારે તે ભરત રાજા પોતાની સ્કંધાવાર સૈન્ય સહિત ચર્મરત્ન ઉપર આરૂઢ | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ३ भरतचक्री |
Gujarati | 87 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] पमाणराईण तवगुणाण फलेगदेसभागं, विमानवासेवि दुल्लहतरं, वग्घारियमल्लदामकलावं सारय-धवलब्भरयणिगरप्पगासं दिव्वं छत्तरयणं महिवइस्स धरणियलपुण्णचंदो।
तए णं से दिव्वे छत्तरतणे भरहेणं रन्ना परामुट्ठे समाणे खिप्पामेव दुवालस जोयणाइं पवित्थरइ साहियाइं तिरियं। Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૮૫ | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ४ क्षुद्र हिमवंत |
Gujarati | 143 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] कहि णं भंते! उत्तरकुराए जमगा नामं दुवे पव्वया पन्नत्ता? गोयमा! निलवंतस्स वासहरपव्वयस्स दक्खिणि-ल्लाओ चरिमंताओ अट्ठजोयणसए चोत्तीसे चत्तारि य सत्तभाए जोयणस्स अबाहाए, सीयाए महानईए पुरत्थिम-पच्चत्थिमेणं उभओ कूले, एत्थ णं जमगा नामं दुवे पव्वया पन्नत्ता–
जोयणसहस्सं उड्ढं उच्चत्तेणं अड्ढाइज्जाइं जोयणसयाइं उव्वेहेणं मूले एगं जोयणसहस्सं आयामविक्खंभेणं, मज्झे अद्धट्ठमाणि जोयणसयाइं आयामविक्खंभेणं, उवरिं पंच जोयणसयाइं आयामविक्खंभेणं मूले तिन्नि जोयणसहस्साइं एगं च बावट्ठं जोयणसयं किंचिविसेसाहियं परि-क्खेवेणं, मज्झे दो जोयणसहस्साइं, तिन्नि य बावत्तरे जोयणसए Translated Sutra: સૂત્ર– ૧૪૩. ભગવન્ ! ઉત્તરકુરુમાં યમક નામે બંને પર્વતો ક્યાં કહેલ છે ? ગૌતમ ! નીલવંત વર્ષધર પર્વતના દક્ષિણી ચરમાંતથી – ૮૩૪ – ૪/૭ યોજનના અંતરે સીતા મહાનદીના બંને કૂલે અહીં યમક નામે બે પર્વતો કહેલા છે. તે ૧૦૦૦ યોજન ઉર્ધ્વ ઊંચા, ૨૫૦ યોજન ભૂમિમાં, લંબાઈ – પહોળાઈથી મૂલમાં ૧૦૦૦ યોજન, મધ્યમાં૭૫૦ યોજન અને ઉપર ૫૦૦ – યોજન | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ५ जिन जन्माभिषेक |
Gujarati | 214 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं तासिं अहेलोगवत्थव्वाणं अट्ठण्हं दिसाकुमारीमहत्तरियाणं पत्तेयं-पत्तेयं आसनाइं चलंति।
तए णं ताओ अहेलोगवत्थव्वाओ अट्ठ दिसाकुमारीओ महत्तरियाओ पत्तेयं-पत्तेयं आसनाइं चलियाइं पासंति, पासित्ता ओहिं पउंजंति, पउंजित्ता भगवं तित्थयरं ओहिणा आभोएंति, आभोएत्ता अन्नमन्नं सद्दावेंति, सद्दावेत्ता एवं वयासी– उप्पन्ने खलु भो! जंबुद्दीवे दीवे भयवं तित्थयरे, तं जीयमेयं तीयपच्चुप्पन्नमनागयाणं अहेलोगवत्थव्वाणं अट्ठण्हं दिसाकुमारीमहत्तरियाणं जम्मनमहिमं करेत्तए, तं गच्छामो णं अम्हेवि भगवओ जम्मनमहिमं करेमो त्तिकट्टु एवं वयंति, वइत्ता पत्तेयं-पत्तेयं आभिओगिए Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૨૧૨ | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ५ जिन जन्माभिषेक |
Gujarati | 227 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तेणं कालेणं तेणं समएणं सक्के नामं देविंदे देवराया वज्जपाणी पुरंदरे सयक्कऊ सहस्सक्खे मघवं पागसासने दाहिणड्ढलोगाहिवई बत्तीसविमाणावाससयसहस्साहिवई एरावणवाहने सुरिंदे अरयंबर-वत्थधरे आलइयमालमउडे णवहेमचारुचित्तचंचलकुंडलविलिहिज्जमाणगल्ले भासुरबोंदी पलंबवन-माले महिड्ढीए महज्जुईए महाबले महायसे महानुभागे महासोक्खे सोहम्मे कप्पे सोहम्मवडेंसए विमाने समाए सुहम्माए सक्कंसि सीहासनंसि निसन्ने।
से णं तत्थ बत्तीसाए विमानावाससयसाहस्सीणं, चउरासीए सामानियसाहस्सीणं, तायत्ती-साए तावत्तीसगाणं, चउण्हं लोगपालाणं, अट्ठण्हं अग्गमहिसीणं सपरिवाराणं, तिण्हं परिसाणं, Translated Sutra: તે કાળે, તે સમયે શક્ર નામે દેવેન્દ્ર દેવરાજ, વજ્રપાણી, પુરંદર, શતક્રતુ, સહસ્રાક્ષ, મઘવા, પાકશાસન, દાક્ષિણાર્દ્ધ લોકાધિપતિ, બત્રીશ લાખ વિમાનાધિપતિ, ઐરાવણ વાહન, સુરેન્દ્ર, નિર્મળ વસ્ત્રધારી, માળા – મુગટ ધારણ કરેલ, ઉજ્જવલ સુવર્ણના સુંદર – ચિત્રિત – ચંચલ કુંડલોથી જેનું કપોલ સુશોભિત છે, દેદીપ્યમાન શરીરધારી, લાંબી | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ५ जिन जन्माभिषेक |
Gujarati | 228 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से पालए देवे सक्केणं देविंदेणं देवरन्ना एवं वुत्ते समाणे हट्ठतुट्ठ-चित्तमानंदिए जाव वेउव्वियसमुग्घाएणं समोहणित्ता तहेव करेइ।
तस्स णं दिव्वस्स जाणविमानस्स तिदिसिं तओ तिसोवानपडिरूवगा वण्णओ।
तेसि णं पडिरूवगाणं पुरओ पत्तेयं-पत्तेयं तोरणे, वण्णओ जाव पडिरूवा।
तस्स णं जाणविमानस्स अंतो बहुसमरमणिज्जे भूमिभागे, से जहानामए–आलिंगपुक्खरेइ वा जाव दीवियचम्मेइ वा अनेगसंकुकीलगसहस्सवितते आवड पच्चावड सेढि प्पसेढि सोत्थिय सोवत्थिय पूसमानव वद्धमाणग मच्छंडग मगरंडग जारमार फुल्लावलि पउमपत्त सागरतरंग वसंतलय पउमलयभत्तिचित्तेहिं सच्छाएहिं सप्पभेहिं समरीइएहिं Translated Sutra: ત્યારે તે પાલકદેવ, દેવેન્દ્ર દેવરાજ શક્રએ આ પ્રમાણે કહેતા હર્ષિત, સંતુષ્ટ થયો યાવત્ વૈક્રિય સમુદ્ઘાત વડે સમવહત થઈને તે પ્રમાણે યાન – વિમાન વિકુર્વે છે. તે દિવ્ય યાન – વિમાનની ત્રણે દિશામાં ત્રિસોપાન પ્રતિરૂપક છે, વર્ણન પૂર્વવત્. તે પ્રતિરૂપકોની આગળ પ્રત્યેક પ્રત્યેકમાં તોરણો છે. વર્ણન પ્રતિરૂપ છે સુધી | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ५ जिन जन्माभिषेक |
Gujarati | 229 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तए णं से सक्के देविंदे देवराया हट्ठतुट्ठ-चित्तमानंदिए जाव हरिसवसविसप्पमाणहियए दिव्वं जिणिंदाभिगमनजोग्गं सव्वालंकारविभूसियं उत्तरवेउव्वियं रूवं विउव्वइ, विउव्वित्ता अट्ठहिं अग्ग-महिसीहिं सपरिवाराहिं नट्टाणीएणं गंधव्वाणीएण य सद्धिं तं विमानं अनुप्पयाहिणीकरेमाणे-अनुप्पयाहिणीकरेमाणे पुव्विल्लेणं तिसोमाणपडिरूवएणं दुरुहइ, दुरुहित्ता जेणेव सीहासने तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सीहासणंसि पुरत्थाभिमुहे सन्निसन्ने।
एवं चेव सामानियावि उत्तरेणं तिसोमाणपडिरूवएणं दुरुहित्ता पत्तेयं-पत्तेयं पुव्वण्णत्थेसु भद्दासणेसु निसीयंति। अवसेसा देवा य देवीओ Translated Sutra: ત્યારે તે શક્ર યાવત્ હર્ષિત હૃદયી થયો. જિનેન્દ્ર ભગવંત સંમુખ જવા યોગ્ય દિવ્ય, સર્વાલંકાર વિભૂષિત, ઉત્તર વૈક્રિય રૂપની વિકુર્વણા કરે છે. વિકુર્વીને સપરિવાર અગ્રમહિષી, નાટ્યાનીક અને ગંધર્વાનીક સાથે તે વિમાનની અનુપ્રદક્ષિણા કરતા – કરતા પૂર્વીય ત્રિસોપાનકેથી ચડે છે, ચડીને યાવત્ સિંહાસનમાં પૂર્વાભિમુખ | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ५ जिन जन्माभिषेक |
Gujarati | 230 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तेणं कालेणं तेणं समएणं ईसाणे देविंदे देवराया सूलपाणी वसभवाहणे सुरिंदे उत्तरड्ढलोगाहिवई अट्ठावीसविमनावाससयसहस्साहिवई अरयंबरवत्थधरे, एवं जहा सक्के, इमं नाणत्तं–महाघोसा घंटा, लहुपरक्कमो पायत्ताणियाहिवई, पुप्फओ विमानकारी, दक्खिणा निज्जाणभूमी, उत्तरपुरत्थिमिल्लो रइकरगपव्वओ, मंदरे समोसरिओ जाव पज्जुवासइ।
एवं अवसिट्ठावि इंदा भाणियव्वा जाव अच्चुओ, इमं नाणत्तं– Translated Sutra: સૂત્ર– ૨૩૦. તે કાળે, તે સમયે દેવેન્દ્ર દેવરાજ ઈશાન, જેના હાથમાં શૂળ છે, વૃષભ વાહન છે, સુરેન્દ્ર, ઉત્તરાર્દ્ધ લોકાધિપતિ છે, અઠ્ઠાવીસ લાખ વિમાનોનો અધિપતિ, નિર્મળ વસ્ત્રધારી, એ પ્રમાણે શક્ર મુજબ શેષ વર્ણન કહેવું. તેમાં ભેદ આટલો છે – મહાઘોષા ઘંટા, લઘુપરાક્રમ નામે પદાતિ સૈન્યાધિપતિ, વિમાનકારી દેવ પુષ્પક છે, નિર્યાણમાર્ગ | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ५ जिन जन्माभिषेक |
Gujarati | 233 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] आणयपाणयकप्पे, चत्तारि सयारनच्चुए तिन्नि ॥
एए विमाणा णं। इमे जाणविमानकारी देवा, तं जहा– Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૨૩૦ | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ५ जिन जन्माभिषेक |
Gujarati | 235 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] सोहम्मगाणं सणंकुमारगाणं बंभलोयगाणं महासुक्कगाणं पाणयगाणं इंदाणं सुघोसा घंटा, हरि-नेगमेसी पायत्तणीयाहिवई, उत्तरिल्ला निज्जाणभूमी, दाहिणपुरत्थिमिल्ले रइकरगपव्वए। ईसान-गाणं माहिंद लंतग सहस्सार अच्चुयगाण य इंदाणं महाघोसा घंटा, लहुपरक्कमो पायत्ताणीयाहिवई, दक्खिणिल्ले निज्जाणमग्गे, उत्तरपुरत्थिमिल्ले रइकरगपव्वए, परिसाओ णं जहा जीवाभिगमे, आयरक्खा सामानियचउग्गुणा सव्वेसिं, जानविमाना सव्वेसिं जोयणसयसहस्सविच्छिण्णा, उच्चत्तेणं सविमानप्पमाणा, महिंदज्झया सव्वेसिं जोयणसाहस्सिया, सक्कवज्जा मंदरे समोसरंति जाव पज्जुवासंति। Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૨૩૦ | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ५ जिन जन्माभिषेक |
Gujarati | 236 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तेणं कालेणं तेणं समएणं चमरे असुरिंदे असुरराया चमरचंचाए रायहानीए सभाए सुहम्माए चमरंसि सीहासणंसि चउसट्ठीए सामानियसाहस्सीहिं तायत्तीसाए तावत्तीसेहिं, चउहिं लोगपालेहिं, पंचहिं अग्गमहिसीहिं सपरिवाराहिं, तिहिं परिसाहिं, सत्तहिं अणिएहिं, सत्तहिं अनियाहिवईहिं, चउहिं चउ-सट्ठीहिं आयरक्खदेवसाहस्सीहिं, अन्नेहि य जहा सक्के, नवरं– इमं नाणत्तं–दुमो पायत्तणीयाहिवई, ओघस्सरा घंटा, विमानं पन्नासं जोयणसहस्साइं, महिंदज्झओ पंचजोयणसयाइं, विमानकारी आभि-ओगिओ देवो, अवसिट्ठं तं चेव जाव मंदरे समोसरइ पज्जुवासइ।
तेणं कालेणं तेणं समएणं बली असुरिंदे असुरराया एवमेव नवरं–सट्ठी Translated Sutra: સૂત્ર– ૨૩૬. તે કાળે, તે સમયે અસુરેન્દ્ર અસુરરાજા ચમર, ચમરચંચા રાજધાનીમાં સુધર્માસભામાં ચમર સિંહાસને, ૬૪,૦૦૦ સામાનિક દેવો, ૩૩ – ત્રાયસ્ત્રિંશક, ચાર લોકપાલ, સપરિવાર પાંચ અગ્રમહિષીઓ, ત્રણ પર્ષદા, સાત સૈન્યો, સાત સૈન્યાધિપતિઓ, ચારગણા ૬૪,૦૦૦ આત્મરક્ષક દેવો અને બીજા દેવોથી પરિવૃત્ત હતો ઇત્યાદિ શક્રવત્ જાણવું. | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ५ जिन जन्माभिषेक |
Gujarati | 238 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] दाहिणिल्लाणं पायत्ताणीयाहिवई भद्दसेणो, उत्तरिल्लाणं दक्खो।
वाणमंतरजोइसिया नेयव्वा, एवं चेव नवरं–चत्तारि सामानियसाहस्सीओ, चत्तारि अग्गमहिसीओ, सोलस आयरक्खसहस्सा, विमाणा सहस्सं, महिंदज्झया पणवीसं जोयणसयं, घंटा दाहिणाणं मंजु-स्सरा, उत्तराणं मंजुघोसा, पायत्ताणीयाहिवई विमानकारी य आभिओगा देवा, जोइसियाणं सुस्सरा सुस्सरनिग्घोसा घंटाओ, मंदरे समोसरणं जाव पज्जुवासंति। Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૨૩૬ | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Gujarati | 268 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तेसि णं भंते! देवाणं जाहे इंदे चुए भवइ से कहमियाणिं पकरेंति? गोयमा! ताहे चत्तारि पंच वा सामाणिया देवा तं ठाणं उवसंपज्जित्ताणं विहरंति जाव तत्थण्णे इंदे उववण्णे भवइ।
इंदट्ठाणे णं भंते! केवइयं कालं उववाएणं विरहिए? गोयमा! जहन्नेणं एगं समयं, उक्कोसेणं छम्मासे उववाएणं विरहिए।
बहिया णं भंते! मानुसुत्तरस्स पव्वयस्स जे चंदिम सूरिय गहगण नक्खत्त तारारूवा, तं चेव नेयव्वं, नाणत्तं– विमानोववन्नगा, नो चारोववन्नगा, चारट्ठिइया, नो गइरइया नो गइसमावन्नगा पक्किट्टगसंठाणसंठिएहिं जोयणसयसाहस्सिएहिं तावखेत्तेहिं, सयसाहस्सियाहिं वेउव्वियाहिं, बाहिराहिं परिसाहिं महयाहयनट्ट Translated Sutra: ભગવન્ ! તે જ્યોતિષ્ક દેવોના ઇન્દ્ર જ્યારે ચ્યવી જાય છે, ત્યારે તેઓ અહીં કઈ રીતે દેવો ચલાવે છે ? ગૌતમ ! ત્યારે ચાર કે પાંચ સામાનિક દેવો તે સ્થાનને સ્વીકારીને વિચરે છે અર્થાત્ ઇન્દ્ર સ્થાનનું સંચાલન કરે છે.. યાવત્ ત્યાં બીજો ઇન્દ્ર ઉત્પન્ન ન થાય ત્યાં સુધી રહે છે. ભગવન્ ! ઇન્દ્રસ્થાન કેટલો કાળ ઉપપાતરહિત રહે | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Gujarati | 339 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] मंदरस्स णं भंते! पव्वयस्स केवइयाए अबाहाए जोइसं चारं चरइ? गोयमा! एक्कारसहिं एक्कवीसेहिं जोयणसएहिं अबाहाए जोइसं चारं चरइ।
लोगंताओ णं भंते! केवइयाए अबाहाए जोइसे पन्नत्ते? गोयमा! एक्कारस एक्कारसेहिं जोयणसएहिं अबाहाए जोइसे पन्नत्ते।
धरणितलाओ णं भंते! [केवतियं अबाहाए हेट्ठिल्ले तारारूवे चारं चरति? केवतियं अबाहाए सूरविमाने चारं चरति? केवतियं अबाहाए चंदविमाने चारं चरति? केवतियं अबाहाए उवरिल्ले तारारूवे चारं चरति? गोयमा!] सत्तहिं णउएहिं जोयणसएहिं जोइसे चारं चरइ। एवं सूरविमाने अट्ठहिं सएहिं, चंदविमाने अट्ठहिं असीएहिं, उवरिल्ले तारारूवे णवहिं जोयणसएहिं चारं चरइ।
जोइसस्स Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૩૩૪ | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Gujarati | 340 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] जंबुद्दीवे णं भंते! दीवे अट्ठावीसाए नक्खत्ताणं कयरे नक्खत्ते सव्वब्भंतरिल्लं चारं चरइ? कयरे नक्खत्ते सव्वबाहिरं चारं चरइ? कयरे नक्खत्ते सव्वहिट्ठिल्लं चारं चरइ? कयरे नक्खत्ते सव्वउवरिल्लं चारं चरइ? गोयमा! अभिई नक्खत्ते सव्वब्भंतरं चारं चरइ, मूलो सव्वबाहिरं चारं चरइ, भरणी सव्वहिट्ठिल्लगं चारं चरइ, साई सव्वुवरिल्लं चारं चरइ।
चंदविमाने णं भंते! किंसंठिए पन्नत्ते? गोयमा! अद्धकविट्ठसंठाणसंठिए सव्वफालियामए अब्भुग्गयमूसियपहसिए एवं सव्वाइं नेयव्वाइं।
चंदविमाने णं भंते! केवइयं आयामविक्खंभेणं? केवइयं बाहल्लेणं? गोयमा! Translated Sutra: સૂત્ર– ૩૪૦. જંબૂદ્વીપ દ્વીપમાં ૨૮ – નક્ષત્રોમાં કેટલા નક્ષત્રો સર્વ અભ્યંતર મંડલમાં ચાર ચરે છે ? કેટલાં નક્ષત્રો સર્વ બાહ્ય મંડલમાં ચાર ચરે છે ? કેટલાં નક્ષત્રો સૌથી નીચે ચાર ચરે છે ? કેટલાં નક્ષત્રો સૌથી ઉપર ચાર ચરે છે ? ગૌતમ! અભિજિત નક્ષત્ર સર્વાભ્યંતર મંડલમાં ચાર ચરે છે, મૂલ નક્ષત્ર સર્વબાહ્ય મંડલમાં ચાર | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Gujarati | 344 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] चंदविमानं भंते! कइ देवसाहस्सीओ परिवहंति? गोयमा! सोलस देवसाहस्सीओ परिवहंति–चंदविमानस्स णं पुरत्थिमेणं सेयाणं सुभगाणं सुप्पभाणं संखतल विमलनिम्मलदहिधण गोखीर फेण रययणिगरप्पगासाणं थिरलट्ठपउट्ठ वट्ट पीवरसु-सिलिट्ठविसिट्ठतिक्खदाढाविडंबियमुहाणं रत्तुप्पल-पत्तमउयसूमालतालुजीहाणं महुगुलियपिंगलक्खाणं पीवरवरोरुपडिपुण्णविउलखंधाणं मिउविसय-सुहुमलक्खणपसत्थवरवण्णकेसरसडोवसोहियाणं ऊसिय सुणमिय सुजाय अप्फोडिय नंगूलाणं वइरामयणक्खाणं वइरामयदाढाणं वइरामयदंताणं तवणिज्जजीहाणं तवणिज्जतालुयाणं तवणिज्ज जोत्तगसुजोइयाणं कामगमाणं पीइगमाणं मनोगमाणं मनोरमाणं Translated Sutra: સૂત્ર– ૩૪૪. ભગવન્ ! ચંદ્ર વિમાનને કેટલા હજાર દેવો વહન કરે છે ? ચંદ્ર વિમાનને પૂર્વમાં શ્વેત, સુભગ, સુપ્રભ, શંખતલ – વિમલ – નિર્મલ, ધન દહીં, ગાયના દૂધના ફીણ, રજતના સમૂહની જેમ પ્રકાશક, સ્થિર, લષ્ટ, પ્રકોષ્ઠ, વૃત્ત, પીવર, સુશ્લિષ્ટ, વિશિષ્ટ, તીક્ષ્ણ દાઢાથી વિડંબિત મુખવાળા, રક્ત ઉત્પલ – મૃદુ – સુકુમાલ તાળવું અને જીભવાળા, | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Gujarati | 345 | Gatha | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] सोलसदेवसहस्सा, हवंति चंदेसु चेव सूरेसु ।
अट्ठेव सहस्साइं, एक्केक्कंमी गहविमाने ॥ Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૩૪૪ | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Gujarati | 347 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] एवं सूरविमानाणं जाव तारारूवविमानाणं, नवरं–एस देवसंघाए। Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૩૪૪ | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Gujarati | 351 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] चंदस्स णं भंते! जोइसिंदस्स जोइसरन्नो कइ अग्गमहिसीओ पन्नत्ताओ? गोयमा! चत्तारि अग्गमहिसीओ पन्नत्ताओ, तं जहा–चंदप्पभा दोसिनाभा अच्चिमाली पभंकरा। तओ णं एगमेगाए देवीए चत्तारि-चत्तारि देवीसहस्साइं परिवारो पण्णत्तो। पभू णं ताओ एगमेगा देवी अन्नं देवीसहस्सं परिवारो विउव्वित्तए। एवामेव सपुव्वावरेणं सोलस देवी सहस्सा। सेत्तं तुडिए।
पभू णं भंते! चंदे जोइसिंदे जोइसराया चंदवडेंसए विमाने चंदाए रायहानीए सभाए सुहम्माए तुडिएणं सद्धिं महयाहयनट्ट गीय वाइय तंती तल ताल तुडिय घण मुइंगपडुप्पवाइयरवेणं दिव्वाइं भोगभोगाइं भुंजमाणे विहरित्तए? गोयमा! नो इणट्ठे समट्ठे।
से केणट्ठेणं Translated Sutra: સૂત્ર– ૩૫૧. ભગવન્ ! જ્યોતિષેન્દ્ર જ્યોતિષરાજ ચંદ્રની કેટલી અગ્રમહિષીઓ કહેલી છે ? ગૌતમ ! ચાર અગ્રમહિષીઓ કહેલી છે, તે આ પ્રમાણે – ચંદ્રપ્રભા, જ્યોત્સનાભા, અર્ચિમાલી, પ્રભંકરા. તેમાં એક – એક અગ્રમહિષીનો ચાર – ચાર હજાર દેવીનો પરિવાર બતાવાયેલ છે. એક – એક અગ્રમહિષી બીજી હજાર દેવીની વિકુર્વણા કરવાને સમર્થ હોય છે. | |||||||||
| Jambudwippragnapati | જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
वक्षस्कार ७ ज्योतिष्क |
Gujarati | 355 | Sutra | Upang-07 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] चंदविमाने णं भंते! देवाणं केवइयं कालं ठिई पन्नत्ता? गोयमा! जहन्नेणं चउभागपलिओवमं, उक्कोसेणं पलिओवमं वाससयसहस्समब्भहियं।
चंदविमाने णं देवीणं जहन्नेणं चउभागपलिओवमं, उक्कोसेणं अद्धपलिओवमं पन्नासाए वाससहस्सेहिमब्भहियं
सूरविमाने देवाणं जहन्नेणं चउब्भागपलिओवमं, उक्कोसेणं पलिओवमं वाससहस्समब्भहियं।
सूरविमाने देवीणं जहन्नेणं चउब्भागपलिओवमं, उक्कोसेणं अद्धपलिओवमं पंचहिं वाससएहिं अब्भहियं।
गहविमाने देवाणं जहन्नेणं चउब्भागपलिओवमं, उक्कोसेणं पलिओवमं।
गहविमाने देवीणं जहन्नेणं चउब्भागपलिओवमं, उक्कोसेणं अद्धपलिओवमं।
नक्खत्तविमाने देवाणं जहन्नेणं चउब्भागपलिओवमं, Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૩૫૧ | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
त्रिविध जीव प्रतिपत्ति |
Hindi | 53 | Sutra | Upang-03 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] से किं तं इत्थीओ? इत्थीओ तिविहाओ पन्नत्ताओ, तं जहा–तिरिक्खजोणित्थीओ मनुस्सित्थीओ देवित्थीओ।
से किं तं तिरिक्खजोणित्थीओ? तिरिक्खजोणित्थीओ तिविहाओ पन्नत्ताओ, तं जहा–जलयरीओ थलयरीओ खहयरीओ।
से किं तं जलयरीओ? जलयरीओ पंचविहाओ पन्नत्ताओ, तं जहा–मच्छीओ जाव सुंसुमारीओ। से तं जलयरीओ।
से किं तं थलयरीओ? थलयरीओ दुविहाओ पन्नत्ताओ, तं० चउप्पईओ य परिसप्पीओ य।
से किं तं चउप्पईओ? चउप्पईओ चउव्विहाओ पन्नत्ताओ, तं जहा–एगखुरीओ जाव सणप्फईओ। से तं चउप्पयथलयरतिरिक्खजोणित्थीओ।
से किं तं परिसप्पीओ? परिसप्पीओ दुविहाओ पन्नत्ताओ, तं जहा– उरपरिसप्पीओ य भुयपरिसप्पीओ य।
से किं तं उरपरिसप्पीओ? Translated Sutra: स्त्रियाँ कितने प्रकार की हैं ? तीन प्रकार की – तिर्यंचयोनिक स्त्रियाँ, मनुष्य स्त्रियाँ और देव स्त्रियाँ। तिर्यंच – योनिक स्त्रियाँ कितने प्रकार की हैं ? तीन प्रकार की – जलचरी, स्थलचरी और खेचरी। जलचरी स्त्रियाँ कितने प्रकार की हैं ? पाँच प्रकार की – मत्स्यी यावत् सुंसुमारी। स्थलचरी स्त्रियाँ कितने प्रकार | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
त्रिविध जीव प्रतिपत्ति |
Hindi | 55 | Sutra | Upang-03 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] तिरिक्खजोणित्थीणं भंते! केवतियं कालं ठिती पन्नत्ता? गोयमा! जहन्नेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं तिन्नि पलिओवमाइं।
जलयरतिरिक्खजोणित्थीणं भंते! केवतियं कालं ठिती पन्नत्ता? गोयमा! जहन्नेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं पुव्वकोडी।
चउप्पयथलयरतिरिक्खजोणित्थीणं भंते! केवतियं कालं ठिती पन्नत्ता? गोयमा! जहा तिरिक्खजोणित्थीओ।
उरपरिसप्पथलयरतिरिक्खजोणित्थीणं भंते! केवतियं कालं ठिती पन्नत्ता? गोयमा! जहन्नेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं पुव्वकोडी। एवं भुयपरिसप्पतिरिक्खजोणित्थीओ।
एवं खहयरतिरिक्खत्थीणं जहन्नेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं पलिओवमस्स असंखेज्जइभागो।
मनुस्सित्थीणं Translated Sutra: हे भगवन् ! तिर्यक्योनि स्त्रियों की स्थिति कितने समय की है ? गौतम ! जघन्य से अन्तमुहूर्त्त और उत्कृष्ट से तीन पल्योपम की। भगवन् ! जलचर तिर्यक् योनि स्त्रियों की स्थिति ? गौतम ! जघन्य अन्तमुहूर्त्त और उत्कृष्ट पूर्वकोटी की है। भगवन् ! चतुष्पद स्थलचरतिर्यक्स्त्रियों की स्थिति क्या है ? गौतम ! जैसे तिर्यंचयोनिक | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
त्रिविध जीव प्रतिपत्ति |
Hindi | 61 | Sutra | Upang-03 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] पुरिसस्स णं भंते! केवतियं कालं ठिती पन्नत्ता? गोयमा! जहन्नेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं तेत्तीसं सागरोवमाइं।
तिरिक्खजोणियपुरिसाणं मनुस्सपुरिसाणं जा चेव इत्थीणं ठिती सा चेव भाणियव्वा।
देवपुरिसाणवि जाव सव्वट्ठसिद्धाणं ति ताव ठिती जहा पन्नवणाए तहा भाणियव्वा। Translated Sutra: हे भगवन् ! पुरुष की कितने काल की स्थिति है ? गौतम ! जघन्य से अन्तमुहूर्त्त और उत्कर्ष से तेंतीस सागरोपम। तिर्यंचयोनिक पुरुषों की और मनुष्य पुरुषों की स्थिति उनकी स्त्रियों के समान है। देवयोनिक पुरुषों की यावत् सर्वार्थसिद्ध विमान के देव पुरुषों की स्थिति प्रज्ञापना के स्थितिपद समान है। | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
चतुर्विध जीव प्रतिपत्ति |
तिर्यंच उद्देशक-१ | Hindi | 133 | Sutra | Upang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] अत्थि णं भंते! विमानाइं अच्चीणि अच्चियावत्ताइं अच्चिप्पभाइं अच्चिकंताइं अच्चिवण्णाइं अच्चि-लेस्साइं अच्चि ज्झयाइं अच्चिसिंगाइं अच्चिसिट्ठाइं अच्चिकूडाइं अच्चुत्तरवडिंसगाइं? हंता अत्थि।
ते णं भंते! विमाना केमहालता पन्नत्ता? गोयमा! जावतिए णं सूरिए उदेति जावइएणं च सूरिए अत्थमेति एवतियाइं तिन्नोवासंतराइं अत्थेगतियस्स देवस्स एगे विक्कमे सिता। से णं देवे ताए उक्किट्ठाए तुरियाए चवलाए चंडाए सिग्घाए उद्धुयाए जइणाए छेयाए दिव्वाए देवगतीए वीतीवयमाणे-वीतीवयमाणे जहन्नेणं एकाहं वा दुयाहं वा, उक्कोसेणं छम्मासे बीतीवएज्जा–अत्थेगतियं विमाणं वीतीवएज्जा अत्थेगतियं Translated Sutra: हे भगवन् ! क्या स्वस्तिक नामवाले, स्वस्तिकावर्त नामवाले, स्वस्तिकप्रभ, स्वस्तिककान्त, स्वस्तिकवर्ण, स्वस्तिकलेश्य, स्वस्तिकध्वज, स्वस्तिकशृंगार, स्वस्तिककूट, स्वस्तिकशिष्ट और स्वस्तिकोत्तरावतंसक नामक विमान हैं ? हाँ, गौतम ! हैं। भगवन् ! वे विमान कितने बड़े हैं ? गौतम ! जितनी दूरी से सूर्य उदित होता दीखता | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
चतुर्विध जीव प्रतिपत्ति |
देवयोनिक | Hindi | 160 | Sutra | Upang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] कहि णं भंते! जोतिसियाणं देवाणं विमाना पन्नत्ता? कहि णं भंते! जोतिसिया देवा परिवसंति? गोयमा! उप्पिं दीवसमुद्दाणं इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए बहुसमरमणिज्जाओ भूमिभागाओ सत्तनउए जोयणसते उड्ढं उप्पतित्ता दसुत्तरजोयणसयबाहल्ले, एत्थ णं जोतिसियाणं देवाणं तिरिय-मसंखेज्जा जोतिसियविमानावाससतसहस्सा भवंतीतिमक्खायं। ते णं विमाना अद्धकविट्ठकसंठाण-संठिया एवं जहा ठाणपदे जाव चंदिमसूरिया य, एत्थ णं जोतिसिंदा जोतिसरायाणो परिवसंति महिड्ढिया जाव विहरंति।
चंदस्स णं भंते! जोतिसिंदस्स जोतिसरन्नो कति परिसाओ पन्नत्ताओ? गोयमा! तिन्नि परिसाओ पन्नत्ताओ तं जहा–तुंबा तुडिया पव्वा। Translated Sutra: हे भगवन् ! ज्योतिष्क देवों के विमान कहाँ हैं ? ज्योतिष्क देव कहाँ रहते हैं ? गौतम ! द्वीपसमुद्रों से ऊपर और इस रत्नप्रभापृथ्वी के बहुत समतल एवं रमणीय भूमिभाग से सात सौ नब्बे योजन ऊपर जान पर एक सौ दस योजन प्रमाण ऊंचाईरूप क्षेत्र में तिरछे ज्योतिष्क देवों के असंख्यात लाख विमानावास कहे गये हैं। वे विमान आधे कपीठ | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
चतुर्विध जीव प्रतिपत्ति |
चंद्र सूर्य अने तेना द्वीप | Hindi | 256 | Gatha | Upang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [गाथा] एवइयं तारग्गं, जं भणियं माणुसंमि लोगंमि ।
चारं कलंबुयापुप्फसंठियं जोइसं चरइ ॥ Translated Sutra: मनुष्यलोक में जो पूर्वोक्त तारागणों का प्रमाण है वे ज्योतिष्क देवविमानरूप हैं, वे कदम्ब के फूल के आकार के हैं तथाविध जगत् – स्वभाव से गतिशील हैं। | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
चतुर्विध जीव प्रतिपत्ति |
चंद्र सूर्य अने तेना द्वीप | Hindi | 270 | Gatha | Upang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [गाथा] केणं वड्ढति चंदो? परिहाणी केण होइ चंदस्स?
कालो वा जोण्हो वा, केणनुभावेण चंदस्स? ॥ Translated Sutra: भगवन् ! चन्द्रमा शुक्लपक्ष में क्यों बढ़ता है और कृष्णपक्ष में क्यों घटता है ? किस कारण से कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष होते हैं ? कृष्ण राहु – विमान चन्द्रमा से सदा चार अंगुल दूर रहकर चन्द्रविमान के नीचे चलता है। वह शुक्लपक्ष में धीरे – धीरे चन्द्रमा को प्रकट करता है और कृष्णपक्ष में धीरे – धीरे उसे ढ़ंक लेता है। | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
चतुर्विध जीव प्रतिपत्ति |
चंद्र सूर्य अने तेना द्वीप | Hindi | 271 | Gatha | Upang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [गाथा] किण्हं राहुविमानं, निच्चं चंदेण होइ अविरहियं ।
चउरंगुलमप्पत्तं, हेट्ठा चंदस्स तं चरइ ॥ Translated Sutra: देखो सूत्र २७० | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
चतुर्विध जीव प्रतिपत्ति |
चंद्र सूर्य अने तेना द्वीप | Hindi | 288 | Sutra | Upang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] अंतो णं भंते! मानुसुत्तरस्स पव्वतस्स जे चंदिमसूरियगहगणनक्खत्ततारारूवा ते णं भंते! देवा किं उड्ढोववन्नगा? कप्पोववन्नगा? विमाणोववन्नगा? चारोववन्नगा? चारट्ठितीया? गतिरतिया? गति-समावन्नगा? गोयमा! ते णं देवा नो उड्ढोववन्नगा, नो कप्पोववन्नगा, विमाणोववन्नगा, चारोववन्नगा, नो चारट्ठितीया, गतिरतिया गतिसमावन्नगा, उड्ढीमुहकलंबुयापुप्फसंठाणसंठितेहिं जोयण-साहस्सि-तेहिं तावखेत्तेहिं, साहस्सियाहिं बाहिरियाहिं वेउव्वियाहिं परिसाहिं महयाहयनट्ट गीत वादित तंती तल ताल तुडिय घन मुइंग पडुप्पवादितरवेणं दिव्वाइं भोगभोगाइं भुंजमाणा महया उक्किट्ठसीहनाय-वोलकलकलरवेणं Translated Sutra: भदन्त ! मनुष्यक्षेत्र के अन्दर जो चन्द्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र और तारागण हैं, वे ज्योतिष्क देव क्या ऊर्ध्व विमानों में उत्पन्न हुए हैं या सौधर्म आदि कल्पों में उत्पन्न हुए हैं या (ज्योतिष्क) विमानों में उत्पन्न हुए हैं ? वे गतिशील हैं या गतिरहित हैं ? गतिशील और गति को प्राप्त हुए हैं ? गौतम ! वे देव ज्योतिष्क विमानों | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
चतुर्विध जीव प्रतिपत्ति |
ज्योतिष्क उद्देशक | Hindi | 312 | Sutra | Upang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] जंबूदीवे णं भंते! दीवे मंदरस्स पव्वयस्स केवतियं अबाहाए जोतिसं चारं चरति?
गोयमा! एक्कारस एक्कवीसे जोयणसते अबाहाए जोतिसं चारं चरति।
लोगंताओ भंते! केवतियं अबाहाए जोतिसे पन्नत्ते?
गोयमा! एक्कारस एक्कारे जोयणसते अबाहाए जोतिसे पन्नत्ते।
इमीसे णं भंते! रयणप्पभाए पुढवीए बहुसमरमणिज्जाओ भूमिभागाओ केवतियं अबाहाए हेट्ठिल्ले तारारूवे चारं चरति? केवतियं अबाहाए सूरविमाणे चारं चरति? केवतिए अबाहाए चंदविमाणे चारं चरति? केवतियं अबाहाए उवरिल्ले तारारूवे चारं चरति?
गोयमा! सत्त नउते जोयणसते अबाहाए हेट्ठिल्ले तारारूवे चारं चरति, अट्ठं जोयणसताइं अबाहाए सूरविमाणे चारं चरति, Translated Sutra: भगवन् ! जम्बूद्वीप में मेरुपर्वत के पूर्व चरमान्त से ज्योतिष्कदेव कितनी दूर रहकर उसकी प्रदक्षिणा करते हैं ? गौतम ! ११२१ योजन की दूरी से प्रदक्षिणा करते हैं। इसी तरह दक्षिण, पश्चिम और उत्तर चरमान्त से भी समझना। भगवन् ! लोकान्त से कितनी दूरी पर ज्योतिष्कचक्र हैं ? गौतम ! ११११ योजन पर ज्योतिष्कचक्र है। इस रत्नप्रभापृथ्वी | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
चतुर्विध जीव प्रतिपत्ति |
ज्योतिष्क उद्देशक | Hindi | 314 | Sutra | Upang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] चंदविमाने णं भंते! किंसंठिते पन्नत्ते? गोयमा! अद्धकविट्ठगसंठाणसंठिते सव्वफालियामए अब्भुग्गतमूसितपहसिते वण्णओ।
एवं सूरविमानेवि नक्खत्तविमानेवि गहविमानेवि ताराविमानेवि।
चंदविमाने णं भंते! केवतियं आयामविक्खंभेणं? केवतियं परिक्खेवेणं? केवतियं बाहल्लेणं पन्नत्ते?
गोयमा! छप्पन्ने एगसट्ठिभागे जोयणस्स आयामविक्खंभेणं, तं तिगुणं सविसेसं परिक्खेवेणं, अट्ठावीसं एगसट्ठिभागे जोयणस्स बाहल्लेणं पन्नत्ते।
सूरविमानस्सवि सच्चेव पुच्छा।
गोयमा! अडयालीसं एगसट्ठिभागे जोयणस्स आयाम-विक्खंभेणं, तं तिगुणं सविसेसं परिक्खेवेणं, चउवीसं एगसट्ठिभागे जोयणस्स बाहल्लेणं Translated Sutra: भगवन् ! चन्द्रमा का विमान किस आकार का है ? गौतम ! चन्द्रविमान अर्धकबीठ के आकार का है। वह सर्वात्मना स्फटिकमय है, इसकी कान्ति सब दिशा – विदिशा में फैलती है, जिससे यह श्वेत, प्रभासित है इत्यादि। इसी प्रकार सूर्य, ग्रह और ताराविमान भी अर्धकबीठ आकार के हैं। भगवन् ! चन्द्रविमान का आयाम – विष्कम्भ कितना है ? परिधि | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
चतुर्विध जीव प्रतिपत्ति |
ज्योतिष्क उद्देशक | Hindi | 315 | Sutra | Upang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] चंदविमाने णं भंते कति देवसाहस्सीओ परिवहंति गोयमा चंदविमाणस्स णं पुरच्छिमेणं सेयाणं सुभ-गाणं सुप्पभाणं संखतलविमलनिम्मलदधिघणगोखीरफेणरययणिगरप्पगासाणं थिरलट्ठपउवट्टपीवर-सुसिलिट्ठविसिट्ठ-तिक्खदाढा-विडंबितमुहाणं रत्तुप्पलपत्त-मउयसुमालालु-जीहाणं मधुगुलियपिंग-लक्खाणं पसत्थसत्थवेरुलियभिसंतकक्कडनहाणं विसालपीवरोरुपडिपुन्नविउलखंधाणं मिउविसय पसत्थसुहुमलक्खण-विच्छिण्णकेसरसडोवसोभिताणं चंकमितललिय-पुलितथवलगव्वित-गतीणं उस्सियसुणिम्मि-यसुजायअप्फोडियणंगूलाणं वइरामयनक्खाणं वइरामयदंताणं पीतिगमाणं मनोगमाणं मनोरमाणं मनोहराणं अमीयगतीणं अमियबलवीरियपुरिसकारपरक्कमाणं Translated Sutra: भगवन् ! चन्द्रविमान को कितने हजार देव वहन करते हैं ? गौतम ! १६००० देव, उनमें से ४००० देव सिंह का रूप धारण कर पूर्वदिशा से उठाते हैं। वे सिंह श्वेत हैं, सुन्दर हैं, श्रेष्ठ कांति वाले हैं, शंख के तल के समान विमल और निर्मल तथा जमे हुए दहीं, गाय का दूध, फेन चाँदी के नीकर के समान श्वेत प्रभावाले हैं, उनकी आँखें शहद की गोली | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
चतुर्विध जीव प्रतिपत्ति |
ज्योतिष्क उद्देशक | Hindi | 320 | Sutra | Upang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] पभू णं भंते! चंदे जोतिसिंदे जोतिसराया चंदवडेंसए विमाणे सभाए सुधम्माए चंदंसि सीहासनंसि तुडिएण सद्धिं दिव्वाइं भोगभोगाइं भुंजमाणे विहरित्तए? नो तिणट्ठे समट्ठे।
से केणट्ठेणं भंते! एवं वुच्चति–नो पभू चंदे जोतिसिंदे जोतिसराया चंदवडेंसए विमाणे सभाए सुधम्माए चंदंसि सीहासनंसि तुडिएणं सद्धिं दिव्वाइं भोगभोगाइं भुंजमाणे विहरित्तए?
गोयमा! चंदस्स जोतिसिंदस्स जोतिसरन्नो चंदवडेंसए विमाणे सभाए सुधम्माए मानवगंसि चेतियखंभंसि वइरामएसु गोलवट्टसमुग्गएसु बहुयाओ जिनसकहाओ सन्निखित्ताओ चिट्ठंति, जाओ णं चंदस्स जोतिसिंदस्स जोतिसरन्नो अन्नेसिं च बहूणं जोतिसियाणं देवाण Translated Sutra: भगवन् ! ज्योतिष्केन्द्र ज्योतिषराज चन्द्र चन्द्रावतंसक विमान में सुधर्मासभा में चन्द्र नामक सिंहासन पर अपने अन्तःपुर के साथ दिव्य भोगोपभोग भोगने में समर्थ हैं क्या ? गौतम ! नहीं है। भगवन् ! ऐसा क्यों कहा जाता है ? गौतम ! ज्योतिष्केन्द्र ज्योतिषराज चन्द्र के चन्द्रावतंसक विमान में सुधर्मासभा में माणवक | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
चतुर्विध जीव प्रतिपत्ति |
ज्योतिष्क उद्देशक | Hindi | 321 | Sutra | Upang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] सूरस्स णं भंते! जोतिसिंदस्स जोतिसरन्नो कति अग्गमहिसीओ पन्नत्ताओ?
गोयमा! चत्तारि अग्गमहिसीओ पन्नत्ताओ, तं जहा– सूरप्पभा आयवाभा अच्चिमाली पभंकरा। एवं अवसेसं जहा चंदस्स, नवरिं– सूरवडेंसए विमाणे सूरंसि सीहासनंसि। तहेव सव्वेसिं गहाईणं चत्तारि अग्गमहिसीओ, तं जहा– विजया वेजयंती जयंती अपराजिया, तेसिं पि तहेव। Translated Sutra: | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
चतुर्विध जीव प्रतिपत्ति |
ज्योतिष्क उद्देशक | Hindi | 322 | Sutra | Upang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] चंदविमाने णं भंते! देवाणं केवतियं कालं ठिती पन्नत्ता? गोयमा! जहन्नेणं चउब्भागपलिओवमं, उक्कोसेणं पलिओवमं वाससयसहस्समब्भहियं।
देवीणं जहन्नेणं चउब्भागपलिओवमं, उक्कोसेणं अद्धपलिओवमं पण्णासाए वाससहस्सेहिं अब्भहियं।
सूरविमाणे देवाणं जहन्नेणं चउब्भागपलिओवमं, उक्कोसेणं पलिओवमं वाससहस्समब्भहियं।
देवीणं जहन्नेणं चउब्भागपलिओवमं, उक्कोसेणं अद्धपलिओवमं पंचहिं वाससतेहिमब्भहियं।
गहविमाने देवाणं जहन्नेणं चउब्भागपलिओवमं, उक्कोसेणं पलिओवमं।
देवीणं जहन्नेणं, चउब्भागपलिओवमं, उक्कोसेणं अद्धपलिओवमं।
नक्खत्तविमाने देवाणं जहन्नेणं चउब्भागपलिओवमं, उक्कोसेणं Translated Sutra: भगवन् ! चन्द्रविमान में देवों की कितनी स्थिति है ? प्रज्ञापना में स्थितिपद के अनुसार तारारूप पर्यन्त जानना। | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
चतुर्विध जीव प्रतिपत्ति |
वैमानिक उद्देशक-१ | Hindi | 324 | Sutra | Upang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] कहि णं भंते! वेमाणियाणं देवाणं विमाना पन्नत्ता? कहि णं भंते! वेमाणिया देवा परिवसंति? गोयमा! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए बहुसमरमणिज्जाओ भूमिभागाओ उड्ढं चंदिमसूरियगहनक्खत्त-तारारूवाणं बहूइं जोयणाइं बहूइं जोयणसताइं बहूइं जोयणसहस्साइं बहूइं जोयणसयसहस्साइं बहूइं जोयणकोडीओ बहूइं जोयणकोडाकोडीओ उड्ढं दूरं उप्पइत्ता सोहम्मीसाणं सणंकुमार माहिंद बंभलोय लंतग महासुक्क सहस्सार आनय पाणय आरण अच्चुत गेवेज्ज अनुत्तरेसु य, एत्थ णं वेमाणियाणं चतुरासीतिं विमानावाससतसहस्सा सत्तानउतिं च सहस्सा तेवीसं च विमाना भवंतीति मक्खाया। ते णं विमाना सव्वरयणामया अच्छा जाव पडिरूवा। Translated Sutra: भगवन् ! वैमानिक देवों के विमान कहाँ हैं ? भगवन् ! वैमानिक देव कहाँ रहते हैं ? इत्यादि वर्णन प्रज्ञापना सूत्र के स्थानपद समान कहना। विशेष रूप में यहाँ अच्युत विमान तक परिषदाओं का कथन भी करना यावत् बहुत से सौधर्मकल्पवासी देव और देवियों का आधिपत्य करते हुए सुखपूर्वक विचरण करते हैं। | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
चतुर्विध जीव प्रतिपत्ति |
वैमानिक उद्देशक-१ | Hindi | 325 | Sutra | Upang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] सक्कस्स णं भंते! देविंदस्स देवरन्नो कति परिसाओ पन्नत्ताओ? गोयमा! तओ परिसाओ पन्नत्ताओ, तं जहा–समिता चंडा जाता, अब्भिंतरिया समिया, मज्झिमिया चंडा, बाहिरिया जाता।
सक्कस्स णं भंते! देविंदस्स देवरन्नो अब्भिंतरियाए परिसाए कति देवसाहस्सीओ पन्नत्ताओ? मज्झिमियाए परिसाए तहेव बाहिरियाए पुच्छा। गोयमा! सक्कस्स णं देविंदस्स देवरन्नो अब्भिंतरियाए परिसाए बारस देवसाहस्सीओ पन्नत्ताओ मज्झिमियाए परिसाए चोद्दस देव-साहस्सीओ पन्नत्ताओ, बाहिरियाए परिसाए सोलस देवसाहस्सीओ पन्नत्ताओ, तहा अब्भिंतरियाए परिसाए सत्त देवीसयाणि, मज्झिमियाए छच्च देवीसयाणि, बाहिरियाए पंच देवीसयाणि Translated Sutra: भगवन् ! देवेन्द्र देवराज शक्र की कितनी पर्षदाएं हैं ? गौतम ! तीन – समिता, चण्डा और जाया। आभ्यंतर पर्षदा को समिता, मध्य पर्षदा को चण्डा और बाह्य पर्षदा को जाया कहते हैं। देवेन्द्र देवराज शक्र की आभ्यन्तर परिषद में १२००० देव, मध्यम परिषद में १४००० देव और बाह्य परिषद में १६००० देव हैं। आभ्यन्तर परिषद में ७०० देवियाँ | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
चतुर्विध जीव प्रतिपत्ति |
वैमानिक उद्देशक-२ | Hindi | 326 | Sutra | Upang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] सोहम्मीसानेसु कप्पेसु विमानपुढवी किंपइट्ठिया पन्नत्ता? गोयमा! घनोदहिपइट्ठिया पन्नत्ता।
सणंकुमारमाहिंदेसु कप्पेसु विमानपुढवी किंपइट्ठिया पन्नत्ता? गोयमा! घनवायपइट्ठिया पन्नत्ता।
बंभलोए णं भंते! कप्पे विमानपुढवी णं पुच्छा। घनवायपइट्ठिया पन्नत्ता।
लंतए तदुभयपइट्ठिया पन्नत्ता।
महासुक्कसहस्सारेसुवि तदुभयपइट्ठिया।
आनय जाव अच्चुएसु णं भंते! कप्पेसु पुच्छा। ओवासंतरपइट्ठिया पन्नत्ता।
गेवेज्जविमानपुढवीणं भंते! पुच्छा। गोयमा! ओवासंतरपइट्ठिया पन्नत्ता।
अनुत्तरोववाइयपुच्छा। ओवासंतरपइट्ठिया पन्नत्ता। Translated Sutra: भगवन् ! सौधर्म और ईशान कल्प की विमानपृथ्वी किसके आधार पर रही हुई है ? गौतम ! घनोदधि के आधार पर। सनत्कुमार और माहेन्द्र की विमानपृथ्वी घनवात पर प्रतिष्ठित है। ब्रह्मलोक विमान – पृथ्वी घनवात पर प्रतिष्ठित है। लान्तक, महाशुक्र और सहस्रार विमान पृथ्वी घनोदधि – घनवात पर प्रतिष्ठित है। आनत यावत् अच्युत विमानपृथ्वी, | |||||||||
| Jivajivabhigam | जीवाभिगम उपांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
चतुर्विध जीव प्रतिपत्ति |
वैमानिक उद्देशक-२ | Hindi | 327 | Sutra | Upang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] सोहम्मीसानकप्पेसु विमानपुढवी केवइयं बाहल्लेणं पन्नत्ता? गोयमा! सत्तावीसं जोयणसयाइं बाहल्लेणं पन्नत्ता।
एवं पुच्छा–सणंकुमारमाहिंदेसु छव्वीसं जोयणसयाइं। बंभलंतएसु पंचवीसं। महासुक्क-सहस्सारेसु चउवीसं। आनयपाणयारणाच्चुएसु तेवीसं सयाइं। गेवेज्जविमाणपुढवी बावसं। अनुत्तर-विमानपुढवी एक्कवीसं जोयणसयाइं बाहल्लेणं। Translated Sutra: भगवन् ! सौधर्म और ईशान कल्प में विमानपृथ्वी कितनी मोटी है ? गौतम ! २७०० योजन मोटी है। सनत्कुमार और माहेन्द्र में विमानपृथ्वी २६०० योजन। ब्रह्मलोक और लांतक में २५०० योजन, महाशुक्र और सहस्रार में २४०० योजन, आणत प्राणत आरण और अच्युत कल्प में २३०० योजन, ग्रैवेयकों में २२०० योजन और अनुत्तर विमानों में विमानपृथ्वी | |||||||||