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Global Search for JAIN Aagam & Scriptures| Scripture Name | Translated Name | Mool Language | Chapter | Section | Translation | Sutra # | Type | Category | Action |
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| Saman Suttam | સમણસુત્તં | Prakrit |
चतुर्थ खण्ड – स्याद्वाद |
३८. प्रमाणसूत्र | Gujarati | 677 | View Detail | ||
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Mool Sutra: ईहा अपोह वीमंसा, मग्गणा य गवेसणा।
सण्णा सती मती पण्णा, सव्वं आभिणिबोधियं।।४।। Translated Sutra: ઈહા, અપોહ, વિમર્શ, માર્ગણા, ગવેષણા, સંજ્ઞા, સ્મૃતિ, મતિ, પ્રજ્ઞા - આ બધાં નામ આભિનિબોધિક જ્ઞાનનાં છે. (પાંચ ઈન્દ્રિયો અને મન દ્વારા થતું જ્ઞાન તે મતિજ્ઞાન છે.) | |||||||||
| Saman Suttam | સમણસુત્તં | Prakrit |
चतुर्थ खण्ड – स्याद्वाद |
३९. नयसूत्र | Gujarati | 693 | View Detail | ||
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Mool Sutra: तित्थयरवयणसंगह-विसेसपत्थार-मूलवागरणी।
दव्वट्ठिओ य पज्जवणओ, य सेसा वियप्पा सिं।।४।। Translated Sutra: તીર્થંકરની વાણીના બે મુખ્ય પ્રકાર છે - કેટલાંક વચન વસ્તુના સામાન્ય ધર્મના નિરૂપક છે, બીજાં વિશેષ ધર્મનાં નિરૂપક છે. સામાન્ય ધર્મપ્રતિપાદક દૃષ્ટિકોણને દ્રવ્યાર્થિક નય કહેવાય છે અને વિશેષ ધર્મપ્રતિપાદક કથનને પર્યાયાર્થિક નય કહેવાય છે. બાકીના નયો આ બે ન | |||||||||
| Saman Suttam | સમણસુત્તં | Prakrit |
चतुर्थ खण्ड – स्याद्वाद |
४०. स्याद्वाद व सप्तभङ्गीसूत्र | Gujarati | 717 | View Detail | ||
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Mool Sutra: अत्थि त्ति णत्थि दो वि य, अव्वत्तव्वं सिएण संजुत्तं।
अव्वत्तव्वा ते तह, पमाणभंगी सुणायव्वा।।४।। Translated Sutra: અસ્તિ, નાસ્તિ, અસ્તિ-નાસ્તિ, અવક્તવ્ય, અસ્તિ-અવ્યક્તવ્ય, નાસ્તિ-અવક્તવ્ય, અસ્તિ-નાસ્તિ-અવક્તવ્ય - કોઈ પણ વસ્તુ અંગે આવાં સાત કથન થઈ શકે છે. દરેકની સાથે સ્યાત્ શબ્દ જોડીએ તો તે પૂર્ણ અને શુદ્ધ પ્રમાણ વાક્ય બને. એને સપ્તભંગી કહે છે. કોઈ વસ્તુનું કે તેન | |||||||||
| Saman Suttam | સમણસુત્તં | Prakrit |
चतुर्थ खण्ड – स्याद्वाद |
४१. समन्वयसूत्र | Gujarati | 725 | View Detail | ||
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Mool Sutra: ते सावेक्खा सुणया णिरवेक्खा ते वि दुण्णया होंति।
सयल-ववहार-सिद्धी, सुणयादो होदि णियमेण।।४।। Translated Sutra: આવાં એકધર્માવલંબી કથનો, જો મનમાં અન્ય દૃષ્ટિકોણોની અપેક્ષા રાખીને કરાતાં હોય તો તે સુનય છે, અન્ય નયોની ઉપેક્ષા સાથે કરાતાં હોય તો તે દુર્નય છે. જગતનો સમગ્ર વ્યવહાર નિશ્ચિતરૂપે સુનય દ્વારા જ સિદ્ધ થાય છે. | |||||||||
| Saman Suttam | સમણસુત્તં | Prakrit |
चतुर्थ खण्ड – स्याद्वाद |
४२. निक्षेपसूत्र | Gujarati | 740 | View Detail | ||
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Mool Sutra: सायार इयर ठवणा, कित्तिम इयरा दु बिंबजा पढमा।
इयरा इयरा भणिया, ठवणा अरिहो य णायव्वो।।४।। Translated Sutra: સ્થાપના બે પ્રકારની છે : સાકાર અને નિરાકાર. પ્રતિમા કે ચિત્રરૂપે કોઈ વસ્તુ દર્શાવવી તે સાકાર સ્થાપના. ગમે તે વસ્તુમાં (તેની આકૃતિ મળતી આવતી ન હોય તો પણ) કોઈ વસ્તુની કલ્પના કરવી તે નિરાકાર સ્થાપના. અર્હતની પ્રતિમા તે સાકાર સ્થાપના અર્હત છે, અન્ય કોઈ પ | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
१. मङ्गलसूत्र | Hindi | 4 | View Detail | ||
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Mool Sutra: अरहंता लोगुत्तमा। सिद्धा लोगुत्तमा। साहू लोगुत्तमा।
केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो।।४।। Translated Sutra: अर्हत् लोकोत्तम हैं। सिद्ध लोकोत्तम हैं। साधु लोकोत्तम हैं। केवलि-प्रणीत धर्म लोकोत्तम है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
२. जिनशासनसूत्र | Hindi | 20 | View Detail | ||
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Mool Sutra: तस्स मुहुग्गदवयणं, पुव्वावरदोसविरहियं सुद्धं।
आगममिदिपरिकहियं, तेण दु कहिया हवंति तच्चत्था।।४।। Translated Sutra: अर्हत् के मुख से उद्भूत, पूर्वापरदोष-रहित शुद्ध वचनों को आगम कहते हैं। उस आगम में जो कहा गया है वही सत्यार्थ है। (अर्हत् द्वारा उपदिष्ट तथा गणधर द्वारा संकलित श्रुत आगम है।) | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
३. संघसूत्र | Hindi | 28 | View Detail | ||
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Mool Sutra: नाणस्स होइ भागी, थिरयरओ दंसणे चरित्ते य।
धन्ना गुरुकुलवासं, आवकहाए न मुंचंति।।४।। Translated Sutra: संघस्थित साधु ज्ञान का भागी (अधिकारी) होता है, दर्शन व चारित्र में विशेषरूप से स्थिर होता है। वे धन्य हैं जो जीवन-पर्यन्त गुरुकुलवास नहीं छोड़ते। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
४. निरूपणसूत्र | Hindi | 35 | View Detail | ||
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Mool Sutra: जो सिय भेदुवयारं, धम्माणं कुणइ एगवत्थुस्स।
सो ववहारो भणियो, विवरीओ णिच्छयो होइ।।४।। Translated Sutra: जो एक अखण्ड वस्तु के विविध धर्मों में कथंचित् (किसी अपेक्षा) भेद का उपचार करता है वह व्यवहारनय है। जो ऐसा नहीं करता, अर्थात् अखण्ड पदार्थ का अनुभव अखण्ड रूप से करता है, वह निश्चय नय है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
५. संसारचक्रसूत्र | Hindi | 48 | View Detail | ||
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Mool Sutra: नरविबुहेसरसुक्खं, दुक्खं परमत्थओ तयं बिंति।
परिणामदारुणमसासयं च जं ता अलं तेण।।४।। Translated Sutra: नरेन्द्र-सुरेन्द्रादि का सुख परमार्थतः दुःख ही है। वह है तो क्षणिक, किन्तु उसका परिणाम दारुण होता है। अतः उससे दूर रहना ही उचित है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
६. कर्मसूत्र | Hindi | 59 | View Detail | ||
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Mool Sutra: न तस्स दुक्खं विभयन्ति नाइओ, न मित्तवग्गा न सुया न बंधवा।
एक्को सयं पच्चणुहोइ दुक्खं, कत्तारमेव अणुजाइ कम्म।।४।। Translated Sutra: ज्ञाति, मित्र-वर्ग, पुत्र और बान्धव उसका दुःख नहीं बँटा सकते। वह स्वयं अकेला दुःख का अनुभव करता है। क्योंकि कर्म कर्त्ता का अनुगमन करता है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
७. मिथ्यात्वसूत्र | Hindi | 70 | View Detail | ||
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Mool Sutra: जो जहवायं न कुणइ, मिच्छादिट्ठी तओ हु को अण्णा।
वड्ढइ य मिच्छत्तं, परस्स संकं जणेमाणो।।४।। Translated Sutra: जो तत्त्व-विचार के अनुसार नहीं चलता, उससे बड़ा मिथ्यादृष्टि और दूसरा कौन हो सकता है ? वह दूसरों को शंकाशील बनाकर अपने मिथ्यात्व को बढ़ाता रहता है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
८. राग-परिहारसूत्र | Hindi | 74 | View Detail | ||
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Mool Sutra: तं जइ इच्छसि गंतुं, तीरं भवसायरस्स घोरस्स।
तो तवसंजमभंडं, सुविहिय ! गिण्हाहि तूरंतो।।४।। Translated Sutra: यदि तू घोर भवसागर के पार (तट पर) जाना चाहता है, तो हे सुविहित ! शीघ्र ही तप-संयमरूपी नौका को ग्रहण कर। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
९. धर्मसूत्र | Hindi | 85 | View Detail | ||
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Mool Sutra: कोहेण जो ण तप्पदि, सुर-णर-तिरिएहि कीरमाणे वि।
उवसग्गे वि रउद्दे, तस्स खमा णिम्मला होदि।।४।। Translated Sutra: देव, मनुष्य और तिर्यञ्चों (पशुओं) के द्वारा घोर व भयानक उपसर्ग पहुँचाने पर भी जो क्रोध से तप्त नहीं होता, उसको निर्मल क्षमाधर्म होता है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
९. धर्मसूत्र | Hindi | 121 | View Detail | ||
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Mool Sutra: अप्पा जाणइ अप्पा, जहट्ठिओ अप्पसक्खिओ धम्मो।
अप्पा करेइ तं तह, जह अप्पसुहावओ होइ।।४०।। Translated Sutra: आत्मा ही यथास्थित (निजस्वरूप में स्थित) आत्मा को जानता है। अतएव स्वभावरूप धर्म भी आत्मसाक्षिक होता है। इस धर्म का पालन (अनुभवन) आत्मा उसी विधि से करता है, जिससे कि वह अपने लिए सुखकारी हो। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
१०. संयमसूत्र | Hindi | 125 | View Detail | ||
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Mool Sutra: जो सहस्सं सहस्साणं, संगामे दुज्जए जिणे।
एगं जिणेज्ज अप्पाणं, एस से परमो जओ।।४।। Translated Sutra: जो दुर्जेय संग्राम में हजारों-हजार योद्धाओं को जीतता है, उसकी अपेक्षा जो एक अपने को जीतता है उसकी विजय ही परमविजय है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
११. अपरिग्रहसूत्र | Hindi | 143 | View Detail | ||
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Mool Sutra: मिच्छत्तवेदरागा, तहेव हासादिया य छद्दोसा।
चत्तारि तह कसाया, चउदस अब्भंतरा गंथा।।४।। Translated Sutra: परिग्रह दो प्रकार का है--आभ्यन्तर और बाह्य। - आभ्यन्तर परिग्रह चौदह प्रकार का है : १. मिथ्यात्व, २. स्त्रीवेद, ३. पुरुषवेद, ४. नपुंसकवेद, ५. हास्य, ६. रति, ७. अरति, ८. शोक, ९. भय, १०. जुगुप्सा, ११. क्रोध, १२. मान, १३. माया, १४. लोभ। बाह्य परिग्रह दस प्रकार का है : १. खेत, २. मकान, ३. धन-धान्य, ४. वस्त्र, ५. भाण्ड, ६. दास-दासी, ७. पशु, ८. यान, | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
१२. अहिंसासूत्र | Hindi | 150 | View Detail | ||
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Mool Sutra: जह ते न पिअं दुक्खं, जाणिअ एमेव सव्वजीवाणं।
सव्वायरमुवउत्तो, अत्तोवम्मेण कुणसु दयं।।४।। Translated Sutra: जैसे तुम्हें दुःख प्रिय नहीं है, वैसे ही सब जीवों को दुःख प्रिय नहीं है--ऐसा जानकर, पूर्ण आदर और सावधानीपूर्वक, आत्मौपम्य की दृष्टि से सब पर दया करो। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
१३. अप्रमादसूत्र | Hindi | 163 | View Detail | ||
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Mool Sutra: सुत्तेसु यावी पडिबुद्धजीवी, न वीससे पण्डिए आसुपण्णे।
घोरा मुहुत्ता अबलं सरीरं, भारंड-पक्खी व चरेऽप्पमत्तो।।४।। Translated Sutra: आशुप्रज्ञ पंडित सोये हुए व्यक्तियों के बीच भी जागृत रहे, प्रमाद में विश्वास न करे। मुहूर्त बड़े घोर (निर्दयी) होते हैं, शरीर दुर्बल है, इसलिए वह भारण्ड पक्षी की भाँति अप्रमत्त होकर विचरण करे। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
१४. शिक्षासूत्र | Hindi | 173 | View Detail | ||
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Mool Sutra: नासीले न विसीले, न सिया अइलोलुए।
अकोहणे सच्चरए, सिक्खासीले त्ति वुच्चई।।४।। Translated Sutra: कृपया देखें १७२; संदर्भ १७२-१७३ | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
१६. मोक्षमार्गसूत्र | Hindi | 195 | View Detail | ||
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Mool Sutra: वदसमिदीगुत्तीओ, सीलतवं जिणवरेहि पण्णत्तं।
कुव्वंतो वि अभव्वो, अण्णाणी मिच्छदिट्ठी दु।।४।। Translated Sutra: जिनेन्द्रदेव द्वारा प्ररूपित व्रत, समिति, गुप्ति, शील और तप का आचरण करते हुए भी अभव्य जीव अज्ञानी और मिथ्यादृष्टि ही है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
१७. रत्नत्रयसूत्र | Hindi | 211 | View Detail | ||
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Mool Sutra: नादंसणिस्स नाणं, नाणेण विणा न हुंति चरणगुणा।
अगुणिस्स नत्थि मोक्खो, नत्थि अमोक्खस्स निव्वाणं।।४।। Translated Sutra: सम्यग्दर्शन के बिना ज्ञान नहीं होता। ज्ञान के बिना चारित्रगुण नहीं होता। चारित्रगुण के बिना मोक्ष (कर्मक्षय) नहीं होता और मोक्ष के बिना निर्वाण (अनंतआनंद) नहीं होता। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
१८. सम्यग्दर्शनसूत्र | Hindi | 222 | View Detail | ||
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Mool Sutra: सम्मत्तविरहिया णं, सुट्ठु वि उग्गं तवं चरंता णं।
ण लहंति वोहिलाहं, अवि वाससहस्सकोडीहिं।।४।। Translated Sutra: सम्यक्त्वविहीन व्यक्ति हजारों-करोड़ वर्षों तक भलीभाँति उग्र तप करने पर भी बोधिलाभ प्राप्त नहीं करता। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
१९. सम्यग्ज्ञानसूत्र | Hindi | 248 | View Detail | ||
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Mool Sutra: सूई जहा ससुत्ता, न नस्सई कयवरम्मि पडिआ वि।
जीवो वि तह ससुत्तो, न नस्सइ गओ वि संसारे।।४।। Translated Sutra: जैसे धागा पिरोयी हुई सुई कचरे में गिर जाने पर भी खोती नहीं है, वैसे ही ससूत्र अर्थात् शास्त्रज्ञानयुक्त जीव संसार में पड़कर भी नष्ट नहीं होता। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२०. सम्यक्चारित्रसूत्र | Hindi | 265 | View Detail | ||
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Mool Sutra: सक्किरियाविरहातो, इच्छितसंपावयं ण नाणं ति।
मग्गण्णू वाऽचेट्ठो, वातविहीणोऽधवा पोतो।।४।। Translated Sutra: (शास्त्र द्वारा मोक्षमार्ग को जान लेने पर भी) सत्क्रिया से रहित ज्ञान इष्ट लक्ष्य प्राप्त नहीं करा सकता। जैसे मार्ग का जानकार पुरुष इच्छित देश की प्राप्ति के लिए समुचित प्रयत्न न करे तो वह गन्तव्य तक नहीं पहुँच सकता अथवा अनुकूल वायु की प्रेरणा के अभाव में जलयान इच्छित स्थान तक नहीं पहुँच सकता। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२१. साधनासूत्र | Hindi | 291 | View Detail | ||
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Mool Sutra: आहारमिच्छे मियमेसणिज्जं, सहायमिच्छे निउणत्थबुद्धिं।
निकेयमिच्छेज्ज विवेगजोग्गं समाहिकामे समणे तवस्सी।।४।। Translated Sutra: समाधि का अभिलाषी तपस्वी श्रमण परिमित तथा एषणीय आहार की ही इच्छा करे, तत्त्वार्थ में निपुण (प्राज्ञ) साथी को ही चाहे तथा विवेकयुक्त अर्थात् विविक्त (एकान्त) स्थान में ही निवास करे। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२२. द्विविध धर्मसूत्र | Hindi | 299 | View Detail | ||
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Mool Sutra: नो खलु अहं तहा, संचाएमि मुंडे जाव पव्वइत्तए।
अहं णं देवाणुप्पियाणं, अंतिए पंचाणुव्वइयं सत्तसिक्खावइय।दुवालसविहं गिहिधम्मं पडिवज्जिस्सामि।।४।। Translated Sutra: मैं मुण्डित (प्रव्रजित) होकर अनगारधर्म स्वीकार करने में असमर्थ हूँ, अतः मैं जिनेन्द्रदेव द्वारा प्ररूपित द्वादशव्रतयुक्त श्रावकधर्म कों अंगीकार करुुंगा। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२३. श्रावकधर्मसूत्र | Hindi | 304 | View Detail | ||
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Mool Sutra: मांसासणेण वड्ढइ दप्पो दप्पेण मज्जमहिलसइ।
जूयं पि रमइ तो तं, पि वण्णिए पाउणइ दोसे।।४।। Translated Sutra: मांसाहार से दर्प बढ़ता है। दर्प से मनुष्य में मद्यपान की अभिलाषा जागती है और तब वह जुआ भी खेलता है। इस प्रकार (एक मांसाहार से ही) मनुष्य उक्त वर्णित सर्व दोषों को प्राप्त हो जाता है। | |||||||||
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द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२४. श्रमणधर्मसूत्र | Hindi | 339 | View Detail | ||
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Mool Sutra: नाणदंसणसंपण्णं, संजमे य तवे रयं।
एवं गुणसमाउत्तं, संजयं साहुमालवे।।४।। Translated Sutra: ज्ञान और दर्शन से सम्पन्न, संयम और तप में लीन तथा इसी प्रकार के गुणों से युक्त संयमी को ही साधु कहना चाहिए। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२६. समिति-गुप्तिसूत्र | Hindi | 387 | View Detail | ||
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Mool Sutra: जह गुत्तस्सिरियाई, न होंति दोसा तहेव समियस्स।
गुत्तीट्ठिय प्पमायं, रुंभइ समिई सचेट्ठस्स।।४।। Translated Sutra: | |||||||||
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द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२७. आवश्यकसूत्र | Hindi | 420 | View Detail | ||
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Mool Sutra: वयणमयं पडिकमणं, वयणमयं पच्चखाण णियमं च।
आलोयण वयणमयं, तं सव्वं जाण सज्झायं।।४।। Translated Sutra: (परन्तु) वचनमय प्रतिक्रमण, वचनमय प्रत्याख्यान, वचनमय नियम और वचनमय आलोचना--ये सब तो केवल स्वाध्याय हैं (चारित्र नहीं हैं)। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२८. तपसूत्र | Hindi | 442 | View Detail | ||
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Mool Sutra: कम्माण णिज्जरट्ठं, आहारं परिहरेइ लीलाए।
एगदिणादिपमाणं, तस्स तवं अणसणं होदि।।४।। Translated Sutra: जो कर्मों की निर्जरा के लिए एक-दो दिन आदिका (यथाशक्ति) प्रमाण तय करके आहार का त्याग करता है, उसके अनशन तप होता है। | |||||||||
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द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२८. तपसूत्र | Hindi | 478 | View Detail | ||
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Mool Sutra: णाणेण ज्झाणसिज्झी, झाणादो सव्वकम्मणिज्जरणं।
णिज्जरणफलं मोक्खं, णाणब्भासं तदो कुज्जा।।४०।। Translated Sutra: ज्ञान से ध्यान की सिद्धि होती है। ध्यान से सब कर्मों की निर्जरा होती है। निर्जरा का फल मोक्ष है। अतः सतत ज्ञानाभ्यास करना चाहिए। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२८. तपसूत्र | Hindi | 479 | View Detail | ||
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Mool Sutra: बारसविहम्मि वि तवे, सब्भिंतरबाहिरे कुसलदिट्ठे।
न वि अत्थि न वि य होही, सज्झायसमं तवोकम्मं।।४१।। Translated Sutra: बाह्याभ्यन्तर बारह तपों में स्वाध्याय के समान तप न तो है, न हुआ है, न होगा। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२८. तपसूत्र | Hindi | 480 | View Detail | ||
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Mool Sutra: सयणासणठाणे वा, जे उ भिक्खू न वावरे।
कायस्स विउस्सग्गो, छट्ठो सो परिकित्तिओ।।४२।। Translated Sutra: भिक्षु का शयन, आसन और खड़े होने में व्यर्थ का कायिक व्यापार न करना, काष्ठवत् रहना, छठा कायोत्सर्ग तप है। | |||||||||
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द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२८. तपसूत्र | Hindi | 481 | View Detail | ||
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Mool Sutra: देहमइजड्डसुद्धी, सुहदुक्खतितिक्खया अणुप्पेहा।
झायइ य सुहं झाणं, एगग्गो काउसग्गम्मि।।४३।। Translated Sutra: कायोत्सर्ग करने से ये लाभ प्राप्त होते हैं -- १. देहजाड्यशुद्धि--श्लेष्म आदि दोषों के क्षीण होने से देह की जड़ता नष्ट होती है। २. मतिजाड्यशुद्धि-जागरूकता के कारण बुद्धि की जड़ता नष्ट होती है। ३. सुख-दुःख तितिक्षा-सुख-दुःख को सहने की शक्ति का विकास होता है। ४. अनुप्रेक्षा-भावनाओं के लिए समुचित अवसर का लाभ होता है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२८. तपसूत्र | Hindi | 482 | View Detail | ||
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Mool Sutra: तेसिं तु तवो ण सुद्धो, निक्खंता जे महाकुला।
जं नेवन्ने वियाणंति, न सिलोगं पवेज्जइ।।४४।। Translated Sutra: उन महाकुलवालों का तप भी शुद्ध नहीं है, जो प्रव्रज्या धारणकर पूजा-सत्कार के लिए तप करते हैं। इसलिए कल्याणार्थी को इस तरह तप करना चाहिए कि दूसरे लोगों को पता तक न चले। अपने तप की किसीके समक्ष प्रशंसा भी नहीं करनी चाहिए। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२८. तपसूत्र | Hindi | 483 | View Detail | ||
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Mool Sutra: नाणमयवायसहिओ, सीलुज्जलिओ तवो मओ अग्गी।
संसारकरणबीयं, दहइ दवग्गी व तणरासिं।।४५।। Translated Sutra: ज्ञानमयी वायुसहित तथा शील द्वारा प्रज्वलित तपोमयी अग्नि संसार के कारणभूत कर्म-बीज को वैसे ही जला डालती है, जैसे वन में लगी प्रचण्ड आग तृण-राशि को। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
२९. ध्यानसूत्र | Hindi | 487 | View Detail | ||
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Mool Sutra: जस्स न विज्जदि रागो, दोसो मोहो व जोगपरिकम्मो।
तस्स सुहासुहडहणो, झाणमओ जायए अग्गी।।४।। Translated Sutra: जिसके राग-द्वेष और मोह नहीं है तथा मन-वचन-कायरूप योगों का व्यापार नहीं रह गया है, उसमें समस्त शुभाशुभ कर्मों को जलानेवाली ध्यानाग्नि प्रकट होती है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
३०. अनुप्रेक्षासूत्र | Hindi | 508 | View Detail | ||
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Mool Sutra: चइऊण महामोहं, विसए मुणिऊण भंगुरे सव्वे।
णिव्विसयं कुणह मणं, जेण सुहं उत्तमं लहइ।।४।। Translated Sutra: महामोह को तजकर तथा सब इन्द्रिय-विषयों को क्षण-भंगुर जानकर मन को निर्विषय बनाओ, ताकि उत्तम सुख प्राप्त हो। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
३१. लेश्यासूत्र | Hindi | 534 | View Detail | ||
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Mool Sutra: किण्हा नीला काऊ, तिण्णि वि एयाओ अहम्मलेसाओ।
एयाहि तिहि वि जीवो, दुग्गइं उववज्जई बहुसो।।४।। Translated Sutra: कृष्ण, नील और कापोत ये तीनों अधर्म या अशुभ लेश्याएँ हैं। इनके कारण जीव विविध दुर्गतियों में उत्पन्न होता है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Prakrit |
द्वितीय खण्ड - मोक्ष-मार्ग |
३३. संलेखनासूत्र | Hindi | 570 | View Detail | ||
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Mool Sutra: इक्कं पंडियमरणं, छिंदइ जाईसयाणि बहुयाणि।
तं मरणं मरियव्वं, जेण मओ सुम्मओ होइ।।४।। Translated Sutra: एक पण्डितमरण (ज्ञानपूर्वक मरण) सैकड़ों जन्मों का नाश कर देता है। अतः इस तरह मरना चाहिए, जिससे मरण सुमरण हो जाय। | |||||||||
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तृतीय खण्ड - तत्त्व-दर्शन |
३४. तत्त्वसूत्र | Hindi | 591 | View Detail | ||
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Mool Sutra: जीवाऽजीवा य बन्धो य, पुण्णं पावाऽऽसवो तहा।
संवरो निज्जरा मोक्खो, संतेए तहिया नव।।४।। Translated Sutra: जीव, अजीव, बन्ध, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा और मोक्ष--ये नौ तत्त्व या पदार्थ हैं। | |||||||||
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तृतीय खण्ड - तत्त्व-दर्शन |
३५. द्रव्यसूत्र | Hindi | 627 | View Detail | ||
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Mool Sutra: जीवा पुग्गलकाया, सह सक्किरिया हवंति ण य सेसा।
पुग्गलकरणा जीवा, खंधा खलु कालकरणा दु।।४।। Translated Sutra: जीव और पुद्गलकाय ये दो द्रव्य सक्रिय हैं। शेष सब द्रव्य निष्क्रिय हैं। जीव के सक्रिय होने का बाह्य साधन कर्म नोकर्मरूप पुद्गल है और पुद्गल के सक्रिय होने का बाह्य साधन कालद्रव्य है। | |||||||||
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तृतीय खण्ड - तत्त्व-दर्शन |
३६. सृष्टिसूत्र | Hindi | 654 | View Detail | ||
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Mool Sutra: ओगाढगाढणिचिदो, पुग्गलकायहिं सव्वदो लोगो।
सुहुमेहि बादरेहि य, अप्पाओगेहिं जोग्गेहिं।।४।। Translated Sutra: यह लोक सब ओर से इन सूक्ष्म-बादर पुद्गल-स्कन्धों से ठसाठस भरा हुआ है। उनमें से कुछ पुद्गल कर्मरूप से परिणमन के योग्य होते हैं और कुछ अयोग्य होते हैं। | |||||||||
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चतुर्थ खण्ड – स्याद्वाद |
३७. अनेकान्तसूत्र | Hindi | 663 | View Detail | ||
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Mool Sutra: ण भवो भंगविहीणो, भंगो वा णत्थि संभवविहीणो।
उप्पादो वि य भंगो, ण विणा धोव्वेण अत्थेण।।४।। Translated Sutra: उत्पाद व्यय के बिना नहीं होता और व्यय उत्पाद के बिना नहीं होता। इसी प्रकार उत्पाद और व्यय दोनों त्रिकालस्थायी ध्रौव्य अर्थ (आधार) के बिना नहीं होते। | |||||||||
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चतुर्थ खण्ड – स्याद्वाद |
३८. प्रमाणसूत्र | Hindi | 677 | View Detail | ||
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Mool Sutra: ईहा अपोह वीमंसा, मग्गणा य गवेसणा।
सण्णा सती मती पण्णा, सव्वं आभिणिबोधियं।।४।। Translated Sutra: ईहा, अपोह, मीमांसा, मार्गणा, गवेषणा, संज्ञा, शक्ति, मति और प्रज्ञा--ये सब आभिनिबोधिक या मतिज्ञान हैं। | |||||||||
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चतुर्थ खण्ड – स्याद्वाद |
३९. नयसूत्र | Hindi | 693 | View Detail | ||
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Mool Sutra: तित्थयरवयणसंगह-विसेसपत्थार-मूलवागरणी।
दव्वट्ठिओ य पज्जवणओ, य सेसा वियप्पा सिं।।४।। Translated Sutra: तीर्थंकरों के वचन दो प्रकार के हैं--सामान्य और विशेष। दोनों प्रकार के वचनों की राशियों के (संग्रह के) मूल प्रतिपादक नय भी दो ही हैं--द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक। शेष सब नय इन दोनों के ही अवान्तर भेद हैं। (द्रव्यार्थिक नय वस्तु के सामान्य अंश का प्रतिपादक है और पर्यायार्थिक विशेषांश का।) | |||||||||
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चतुर्थ खण्ड – स्याद्वाद |
४०. स्याद्वाद व सप्तभङ्गीसूत्र | Hindi | 717 | View Detail | ||
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Mool Sutra: अत्थि त्ति णत्थि दो वि य, अव्वत्तव्वं सिएण संजुत्तं।
अव्वत्तव्वा ते तह, पमाणभंगी सुणायव्वा।।४।। Translated Sutra: स्यात् अस्ति, स्यात् नास्ति, स्यात् अस्ति-नास्ति, स्यात् अवक्तव्य, स्यात् अस्ति-अवक्तव्य, स्यात् नास्ति-अवक्तव्य, स्यात् अस्ति नास्ति-अवक्तव्य--इन्हें प्रमाण सप्तभंगी जानना चाहिए। | |||||||||
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चतुर्थ खण्ड – स्याद्वाद |
४१. समन्वयसूत्र | Hindi | 725 | View Detail | ||
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Mool Sutra: ते सावेक्खा सुणया णिरवेक्खा ते वि दुण्णया होंति।
सयल-ववहार-सिद्धी, सुणयादो होदि णियमेण।।४।। Translated Sutra: वे नय (विरोध होने पर भी) सापेक्ष हों तो सुनय कहलाते हैं और निरपेक्ष हों तो दुर्नय। सुनय से ही नियमपूर्वक समस्त व्यवहारों की सिद्धि होती है। | |||||||||