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Global Search for JAIN Aagam & Scriptures| Scripture Name | Translated Name | Mool Language | Chapter | Section | Translation | Sutra # | Type | Category | Action |
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| Saman Suttam | Saman Suttam | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
९. धर्मसूत्र | English | 107 | View Detail | ||
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Mool Sutra: सुखं वसामो जीवामः, येषाम् अस्माकं नास्ति किञ्चन।
मिथिलायां दह्यमानायां, न मे दह्यते किञ्चन।।२६।। Translated Sutra: We, who have nothing of our own, reside happily and live happily. As Nami who had renounced his kingdom and become a saint, said when Mithila was in flames nothing of mine is being burnt there. I have abandoned my children and my wife, I have no occupation; I am a mendicant; there is nothing dear or disareeable to me. Refers 107-108 | |||||||||
| Saman Suttam | Saman Suttam | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
९. धर्मसूत्र | English | 108 | View Detail | ||
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Mool Sutra: त्यक्तपुत्रकलत्रस्य, निर्व्यापारस्य भिक्षोः।
प्रियं न विद्यते किञ्चित्, अप्रियमपि न विद्यते।।२७।। Translated Sutra: Please see 107; Refers 107-108 | |||||||||
| Saman Suttam | સમણસુત્તં | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
८. राग-परिहारसूत्र | Gujarati | 78 | View Detail | ||
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Mool Sutra: एवं स्वसंकल्पविकल्पनासु, संजायते समतोपस्थितस्य।
अर्थांश्च संकल्पयतस्तस्य, प्रहीयते कामगुणेषु तृष्णा।।८।। Translated Sutra: સમતામાં સ્થિત પુરુષના સંકલ્પ-વિકલ્પોનો નાશ થાય છે અને જે પદાર્થોનો સંકલ્પ તેને થાય છે તેમાં પણ વિષયસંબંધી તૃષ્ણા વધુને વધુ ક્ષીણ થતી જાય છે. | |||||||||
| Saman Suttam | સમણસુત્તં | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
९. धर्मसूत्र | Gujarati | 107 | View Detail | ||
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Mool Sutra: सुखं वसामो जीवामः, येषाम् अस्माकं नास्ति किञ्चन।
मिथिलायां दह्यमानायां, न मे दह्यते किञ्चन।।२६।। Translated Sutra: અમારું કહી શકાય એવું કશું જેની પાસે છે નહિ એવા અમે સુખેથી રહીએ છીએ, સુખેથી જીવીએ છીએ. મિથિલાનગરી બળતી હોય તો તેમાં અમારું કંઈ બળતું નથી. પુત્ર અને પત્ની આદિનો ત્યાગ કરનાર અને જેને કોઈ વ્યવસાય નથી એવા મુનિ માટે કોઈ વસ્તુ પ્રિય નથી, કોઈ વસ્તુ અપ્ર સંદર્ભ ૧૦૭-૧૦૮ | |||||||||
| Saman Suttam | સમણસુત્તં | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
९. धर्मसूत्र | Gujarati | 108 | View Detail | ||
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Mool Sutra: त्यक्तपुत्रकलत्रस्य, निर्व्यापारस्य भिक्षोः।
प्रियं न विद्यते किञ्चित्, अप्रियमपि न विद्यते।।२७।। Translated Sutra: મહેરબાની કરીને જુઓ ૧૦૭; સંદર્ભ ૧૦૭-૧૦૮ | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
८. राग-परिहारसूत्र | Hindi | 78 | View Detail | ||
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Mool Sutra: एवं स्वसंकल्पविकल्पनासु, संजायते समतोपस्थितस्य।
अर्थांश्च संकल्पयतस्तस्य, प्रहीयते कामगुणेषु तृष्णा।।८।। Translated Sutra: अपने राग-द्वेषात्मक संकल्प-विकल्प ही सब दोषों के मूल हैं--जो इस प्रकार के चिन्तन में उद्यत होता है तथा इन्द्रिय-विषय दोषों के मूल नहीं हैं--इस प्रकार का संकल्प करता है, उसके मन में समता उत्पन्न होती है। उससे उसकी काम-गुणों में होनेवाली तृष्णा प्रक्षीण हो जाती है। | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
९. धर्मसूत्र | Hindi | 107 | View Detail | ||
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Mool Sutra: सुखं वसामो जीवामः, येषाम् अस्माकं नास्ति किञ्चन।
मिथिलायां दह्यमानायां, न मे दह्यते किञ्चन।।२६।। Translated Sutra: हम लोग, जिनके पास अपना कुछ भी नहीं है, सुखपूर्वक रहते और सुख से जीते हैं। मिथिला जल रही है उसमें मेरा कुछ भी नहीं जल रहा है, क्योंकि पुत्र और स्त्रियों से मुक्त तथा व्यवसाय से निवृत्त भिक्षु के लिए कोई वस्तु प्रिय भी नहीं होती और अप्रिय भी नहीं होती। (यह बात राज्य त्यागकर साधु हो जानेवाले राजर्षि नमि के दृढ़ वैराग्य | |||||||||
| Saman Suttam | समणसुत्तं | Sanskrit |
प्रथम खण्ड – ज्योतिर्मुख |
९. धर्मसूत्र | Hindi | 108 | View Detail | ||
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Mool Sutra: त्यक्तपुत्रकलत्रस्य, निर्व्यापारस्य भिक्षोः।
प्रियं न विद्यते किञ्चित्, अप्रियमपि न विद्यते।।२७।। Translated Sutra: कृपया देखें १०७; संदर्भ १०७-१०८ | |||||||||
| Samavayang | સમવયાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
समवाय-३२ |
Gujarati | 102 | Sutra | Ang-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] बत्तीसं जोगसंगहा पन्नत्ता, तं जहा– Translated Sutra: સૂત્ર– ૧૦૨. બત્રીશ યોગ – (મન વચન કાયાની પ્રવૃત્તિ) સંગ્રહો કહ્યા છે. તે આ પ્રમાણે – સૂત્ર– ૧૦૩. ૧. આલોચના – પોતાના દોષનું કથન, ૨. નિરવલાપ – આચાર્યએ શિષ્યે લીધેલી આલોચના કોઈને ન કહેવી, ૩. આપત્તિમાં દૃઢધર્મતા હોવી, ૪. અનિશ્ચિતોપધાન – બીજાની સહાય વિના તપ કરવો, ૫. શિક્ષા – સૂત્ર અર્થનું જ્ઞાન , ૬. નિષ્પ્રતિકર્મતા – શરીરની | |||||||||
| Samavayang | સમવયાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
समवाय प्रकीर्णक |
Gujarati | 234 | Sutra | Ang-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] दुवे रासी पन्नत्ता, तं जहा–जीवरासी अजीवरासी य।
अजीवरासी दुविहे पन्नत्ते, तं जहा– रूविअजीवरासी अरूविअजीवरासी य।
से किं तं अरूविअजीवरासी?
अरूविअजीवरासी दसविहे पन्नत्ते, तं जहा–धम्मत्थिकाए, धम्मत्थिकायस्स देसे, धम्मत्थिकायस्स पदेसा, अधम्मत्थिकाए, अधम्मत्थिकायस्स देसे, अधम्मत्थिकायस्स पदेसा, आगासत्थिकाए, आगासत्थिकायस्स देसे, आगासत्थिकायस्स पदेसा, अद्धासमए। जाव–
से किं तं अनुत्तरोववाइआ?
अनुत्तरोववाइओ पंचविहा पन्नत्ता, तं जहा–विजय-वेजयंत-जयंत-अपराजित-सव्वट्ठसिद्धिया। सेत्तं अनुत्तरोववाइया। सेत्तं पंचिंदियसंसारसमावण्णजीवरासी।
दुविहा णेरइया पन्नत्ता, Translated Sutra: સૂત્ર– ૨૩૪. રાશિ બે કહી છે – જીવરાશિ અને અજીવરાશિ. અજીવરાશિ બે ભેદે છે – રૂપી અજીવરાશિ, અરૂપી અજીવરાશિ. અરૂપી અજીવરાશિ દશ પ્રકારે છે – ધર્માસ્તિકાય યાવત્ અદ્ધાસમય. રૂપી અજીવરાશિ અનેક પ્રકારે છે યાવત્ તે અનુત્તરોપપાતિક કેટલા છે ? અનુત્તરોપપાતિક પાંચ પ્રકારે છે – વિજય, વૈજયંત, જયંત, અપરાજિત, સર્વાર્થસિદ્ધિક. | |||||||||
| Sanstarak | સંસ્તારક | Ardha-Magadhi |
भावना |
Gujarati | 107 | Gatha | Painna-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] इय तहविहारिणो से विग्घकरी वेयणा समुट्ठेइ ।
तीसे विज्झवणाए अणुसट्ठिं दिंती निज्जवया ॥ Translated Sutra: સૂત્ર– ૧૦૭. આ અવસરે સંથારા આરૂઢ ક્ષપકને કદાચ વિઘ્નકારી વેદના ઉદયમાં આવે તો તેને શમાવવા માટે નિર્યામક આચાર્યમાં હિતશિક્ષા આપે છે. સૂત્ર– ૧૦૮. હે પુણ્ય પુરુષ ! આત્મામાં આરાધનાનો વિસ્તાર આરોપી પૂર્વકાલીન મુનિવરો, પર્વતના ભાગે પાદપોપગમ અનશન કરી કાયોત્સર્ગ – ધ્યાને રહેતા હતા.. સૂત્ર– ૧૦૯. વળી અત્યંત ધૃતિ – સંતોષ | |||||||||
| Sanstarak | સંસ્તારક | Ardha-Magadhi |
भावना |
Gujarati | 108 | Gatha | Painna-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] जइ ताव ते मुनिवरा आरोवियवित्थरा अपरिकम्मा ।
गिरिपब्भारविलग्गा बहुसावयसंकडं भीमं ॥ Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧૦૭ | |||||||||
| Sanstarak | સંસ્તારક | Ardha-Magadhi |
भावना |
Gujarati | 109 | Gatha | Painna-06 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] धीधणियबद्धकच्छा अनुत्तरविहारिणो समक्खाया ।
सावयदाढगया वि हु साहंती उत्तमं अट्ठं ॥ Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧૦૭ | |||||||||
| Sthanang | स्थानांग सूत्र | Ardha-Magadhi |
स्थान-२ |
उद्देशक-३ | Hindi | 96 | Sutra | Ang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] धायइसंडे दीवे पच्चत्थिमद्धे णं मंदरस्स पव्वयस्स उत्तर-दाहिणे णं दो वासा पन्नत्ता–बहुसमतुल्ला जाव तं जहा –भरहे चेव, एरवए चेव।
एवं–जहा जंबुद्दीवे तहा एत्थवि भाणियव्वं जाव छव्विहंपि कालं पच्चणुभवमाणा विहरंति, तं जहा–भरहे चेव, एरवए चेव, नवरं–कूडसामली चेव, महाधायईरुक्खे चेव। देवा–गरुले चेव वेणुदेवे, पियदंसणे चेव।
धायइसंडे णं दीवे दो भरहाइं, दो एरवयाइं, दो हेमवयाइं, दो हेरण्णवयाइं, दो हरिवासाइं, दो रम्मगवासाइं, दो पुव्वविदेहाइं, दो अवरविदेहाइं, दो देवकुराओ, दो देवकुरुमहद्दुमा, दो देवकुरुमहद्दुमवासी देवा, दो उत्तरकुराओ, दो उत्तरकुरुमह-द्दुमा, दो उत्तरकुरुमहद्दुमवासी Translated Sutra: पूर्वार्ध धातकीखंडवर्ती मेरु पर्वत के उत्तर और दक्षिण में दो क्षेत्र कहे गए हैं जो अति समान हैं – यावत् उनके नाम – भरत और ऐरवत। पहले जम्बूद्वीप के अधिकार में कहा वैसे यहाँ भी कहना चाहिए यावत् – दो क्षेत्र में मनुष्य छः प्रकार के काल का अनुभव करते हुए रहते हैं, उनके नाम – भरत और ऐरवत। विशेषता यह है कि वहाँ कूटशाल्मली | |||||||||
| Sthanang | સ્થાનાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
स्थान-२ |
उद्देशक-४ | Gujarati | 107 | Sutra | Ang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] दुविहे कोहे पन्नत्ते, तं जहा–आयपइट्ठिए चेव, परपइट्ठिए चेव।
[सूत्र] दुविहे माने, दुविहा माया, दुविहे लोभे, दुविहे पेज्जे, दुविहे दोसे, दुविहे कलहे, दुविहे अब्भक्खाणे, दुविहे पेसुन्ने, दुविहे परपरिवाए, दुविहा अरतिरती, दुविहे मायामोसे, दुविहे मिच्छादंसणसल्ले पन्नत्ते, तं जहा–आयपइट्ठिए चेव, परपइट्ठिए चेव। एवं नेरइयाणं जाव वेमाणियाणं। Translated Sutra: સૂત્ર– ૧૦૭. ક્રોધ બે પ્રકારે છે – આત્મપ્રતિષ્ઠિત અને પરપ્રતિષ્ઠિત. એ રીતે નૈરયિકથી લઈને વૈમાનિક પર્યંત જાણવું. એ રીતે માં, માયા, લોભ થી મિથ્યાદર્શનશલ્ય પર્યંત જાણવું. સૂત્ર– ૧૦૮. સંસાર સમાપન્નક – (સંસારી) જીવો બે ભેદે છે – ત્રસ અને સ્થાવર. – સર્વે જીવો બે ભેદે કહ્યા છે – સિદ્ધ, અસિદ્ધ. – સર્વે જીવો બે ભેદે કહ્યા | |||||||||
| Sthanang | સ્થાનાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
स्थान-२ |
उद्देशक-४ | Gujarati | 108 | Sutra | Ang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] दुविहा संसारसमावन्नगा जीवा पन्नत्ता, तं जहा–तसा चेव, थावरा चेव।
दुविहा सव्वजीवा पन्नत्ता, तं जहा–सिद्धा चेव, असिद्धा चेव।
दुविहा सव्वजीवा पन्नत्ता, तं जहा–सइंदिया चेव अनिंदिया चेव, सकायच्चेव अकायच्चेव, सजोगी चेव अजोगी चेव, सवेया चेव अवेया चेव, सकसाया चेव अकसाया चेव, सलेसा चेव अलेसा चेव, नाणी चेव अणानाणी चेव, सागारोवउत्ता चेव अनागारोवउत्ता चेव, आहारगा चेव अनाहारगा चेव, भासगा चेव अभासगा चेव, चरिमा चेव अचरिमा चेव, ससरीरी चेव असरीरी चेव। Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧૦૭ | |||||||||
| Sthanang | સ્થાનાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
स्थान-२ |
उद्देशक-४ | Gujarati | 109 | Gatha | Ang-03 | View Detail |
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Mool Sutra: [गाथा] सिद्ध सइंदिय काए, जोगे वेए कसाय लेसा य।
नाणुवओगाहारे, भासग चरिमे य ससरीरी ॥ Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧૦૭ | |||||||||
| Suryapragnapti | सूर्यप्रज्ञप्ति सूत्र | Ardha-Magadhi |
प्राभृत-१ |
प्राभृत-प्राभृत-८ | Hindi | 30 | Sutra | Upang-05 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] ता सव्वावि णं मंडलवता केवतियं बाहल्लेणं, केवतियं आयाम-विक्खंभेणं, केवतियं परिक्खेवेणं अहिताति वएज्जा? तत्थ खलु इमाओ तिन्नि पडिवत्तीओ पन्नत्ताओ।
तत्थ एगे एवमाहंसु–ता सव्वावि णं मंडलवता जोयणं बाहल्लेणं, एगं जोयणसहस्सं एगं च तेत्तीसं जोयणसयं आयाम-विक्खंभेणं, तिन्नि जोयणसहस्साइं तिन्नि य नवनउए जोयणसए परिक्खेवेणं पन्नत्ता–एगे एवमाहंसु १
एगे पुण एवमाहंसु–ता सव्वावि णं मंडलवता जोयणं बाहल्लेणं, एगं जोयणसहस्सं एगं च चउतीसं जोयणसयं आयाम-विक्खंभेणं, तिन्नि जोयणसहस्साइं चत्तारि बिउत्तरे जोयणसए परिक्खेवेणं पन्नत्ता–एगे एवमाहंसु २
एगे पुण एवमाहंसु–ता सव्वावि Translated Sutra: हे भगवन् ! सर्व मंडलपद कितने बाहल्य से, कितने आयाम विष्कंभ से तथा कितने परिक्षेप से युक्त हैं ? इस विषय में तीन प्रतिपत्तियाँ हैं। पहला परमतवादी कहता है कि सभी मंडल बाहल्य से एक योजन, आयाम – विष्कम्भ से ११३३ योजन और परिक्षेप से ३३९९ योजन है। दूसरा बताता है कि सर्वमंडल बाहल्य से एक योजन, आयामविष्कम्भ से ११३४ | |||||||||
| Suryapragnapti | सूर्यप्रज्ञप्ति सूत्र | Ardha-Magadhi |
प्राभृत-३ |
Hindi | 34 | Sutra | Upang-05 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] ता केवतियं खेत्तं चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति आहिताति वएज्जा? तत्थ खलु इमाओ बारस पडिवत्तीओ पन्नत्ताओ।
तत्थेगे एवमाहंसु–ता एगं दीवं एगं समुद्दं चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति १
एगे पुण एवमाहंसु–ता तिन्नि दीवे तिन्नि समुद्दे चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति–एगे एवमाहंसु २
एगे पुण एवमाहंसु–ता अद्धुट्ठे दीवे अद्धुट्ठे समुद्दे चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति–एगे एवमाहंसु ३
एगे पुण एवमाहंसु–ता सत्त दीवे सत्त समुद्दे चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति–एगे एवमाहंसु ४
एगे Translated Sutra: चंद्र – सूर्य कितने क्षेत्र को अवभासित – उद्योतित – तापित एवं प्रकाशीत करता है ? इस विषय में बारह प्रति – पत्तियाँ हैं। वह इस प्रकार – (१) गमन करते हुए चंद्र – सूर्य एक द्वीप और एक समुद्र को अवभासित यावत् प्रकाशित करते हैं। (२) तीन द्वीप – तीन समुद्र को अवभासित यावत् प्रकाशीत करते हैं। (३) अर्द्ध चतुर्थद्वीप | |||||||||
| Suryapragnapti | सूर्यप्रज्ञप्ति सूत्र | Ardha-Magadhi |
प्राभृत-१९ |
Hindi | 129 | Sutra | Upang-05 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] ता कति णं चंदिमसूरिया सव्वलोयं ओभासंति उज्जोएंति तवेंति पभासेंति आहितेति वएज्जा? तत्थ खलु इमाओ दुवालस पडिवत्तीओ पन्नत्ताओ।
तत्थेगे एवमाहंसु–ता एगे चंदे सूरे सव्वलोयं ओभासति उज्जोएति तवेति पभासेति–एगे एवमा-हंसु १
एगे पुण एवमाहंसु–ता तिन्नि चंदा तिन्नि सूरा सव्वलोयं ओभासंति उज्जोएंति तवेंति पभासेंति–एगे एवमाहंसु २
एगे पुण एवमाहंसु–ता आहुट्ठिं चंदा आहुट्ठिं सूरा सव्वलोयं ओभासंति उज्जोएंति तवेंति पभासेंति–एगे एवमाहंसु ३
एगे पुण एवमाहंसु–एतेणं अभिलावेणं नेतव्वं–सत्त चंदा सत्त सूरा ४
दस चंदा दस सूरा ५ बारस चंदा बारस सूरा ६ बातालीसं चंदा बातालीसं सूरा Translated Sutra: कितने चंद्र – सूर्य सर्वलोक को प्रकाशित – उद्योतीत तापीत और प्रभासीत करते हैं। इस विषय में बारह प्रतिपत्तियाँ हैं – सर्वलोक को प्रकाशित यावत् प्रभासीत करनेवाले चंद्र और सूर्य – (१) एक – एक हैं, (२) तीन – तीन हैं, (३) साडेतीन – साडेतीन हैं, (४) सात – सात हैं, (५) दश – दश हैं, (६) बारह – बारह हैं, (७) ४२ – ४२ हैं, (८) ७२ – ७२ हैं, | |||||||||
| Suryapragnapti | સૂર્યપ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
प्राभृत-१ |
प्राभृत-प्राभृत-८ | Gujarati | 30 | Sutra | Upang-05 | View Detail |
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Mool Sutra: [सूत्र] ता सव्वावि णं मंडलवता केवतियं बाहल्लेणं, केवतियं आयाम-विक्खंभेणं, केवतियं परिक्खेवेणं अहिताति वएज्जा? तत्थ खलु इमाओ तिन्नि पडिवत्तीओ पन्नत्ताओ।
तत्थ एगे एवमाहंसु–ता सव्वावि णं मंडलवता जोयणं बाहल्लेणं, एगं जोयणसहस्सं एगं च तेत्तीसं जोयणसयं आयाम-विक्खंभेणं, तिन्नि जोयणसहस्साइं तिन्नि य नवनउए जोयणसए परिक्खेवेणं पन्नत्ता–एगे एवमाहंसु १
एगे पुण एवमाहंसु–ता सव्वावि णं मंडलवता जोयणं बाहल्लेणं, एगं जोयणसहस्सं एगं च चउतीसं जोयणसयं आयाम-विक्खंभेणं, तिन्नि जोयणसहस्साइं चत्तारि बिउत्तरे जोयणसए परिक्खेवेणं पन्नत्ता–एगे एवमाहंसु २
एगे पुण एवमाहंसु–ता सव्वावि Translated Sutra: તે સર્વે મંડલપદ બાહલ્યથી, આયામ – વિષ્કંભ(લંબાઈ અને પહોળાઈ)થી અને પરિક્ષેપથી કેટલાં પ્રમાણમાં કહેલ છે ? તે જણાવો. આ વિષયમાં અન્યતીર્થિકોની ત્રણ પ્રતિપત્તિ(માન્યતા)ઓ કહેલી છે – તેમાં એક એ પ્રમાણે કહે છે – તે સર્વે પણ મંડલવત બાહલ્યથી એક યોજન, આયામ – વિષ્કંભથી ૧૧૩૩ યોજન અને પરિક્ષેપથી ૩૩૯૯ યોજન કહેલ છે. તેમાં બીજો | |||||||||
| Suryapragnapti | સૂર્યપ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
प्राभृत-३ |
Gujarati | 34 | Sutra | Upang-05 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] ता केवतियं खेत्तं चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति आहिताति वएज्जा? तत्थ खलु इमाओ बारस पडिवत्तीओ पन्नत्ताओ।
तत्थेगे एवमाहंसु–ता एगं दीवं एगं समुद्दं चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति १
एगे पुण एवमाहंसु–ता तिन्नि दीवे तिन्नि समुद्दे चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति–एगे एवमाहंसु २
एगे पुण एवमाहंसु–ता अद्धुट्ठे दीवे अद्धुट्ठे समुद्दे चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति–एगे एवमाहंसु ३
एगे पुण एवमाहंसु–ता सत्त दीवे सत्त समुद्दे चंदिमसूरिया ओभासंति उज्जोवेंति तवेंति पगासेंति–एगे एवमाहंसु ४
एगे Translated Sutra: કેટલાં ક્ષેત્રને ચંદ્ર – સૂર્ય અવભાસિત, ઉદ્યોતિત, તાપિત, પ્રકાશિત કરેલ છે ? સૂર્યના પ્રકાશિત ક્ષેત્ર વિશે અન્યતિર્થીકોની નિશ્ચે આ બાર પ્રતિપત્તિ(માન્યતા)ઓ કહેલી છે. ૧. તેમાં એક એવું કહે છે કે – તે એક દ્વીપ – એક સમુદ્રને ચંદ્ર – સૂર્યો અવભાસિત યાવત્ પ્રકાશિત કરે છે. ૨. એક એમ કહે છે – તે ત્રણ દ્વીપ, ત્રણ સમુદ્રને | |||||||||
| Sutrakrutang | સૂત્રકૃતાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
श्रुतस्कन्ध १ अध्ययन-२ वैतालिक |
उद्देशक-१ | Gujarati | 107 | Gatha | Ang-02 | View Detail |
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Mool Sutra: [गाथा] सेहंति य णं ममाइणो ‘माय पिया य सुया य भारिया’ ।
पोसाहि णे पासओ तुमं ‘लोगं परं पि जहासि पोसणे’ ॥ Translated Sutra: સૂત્ર– ૧૦૭. સાધુ પ્રત્યે મમત્વ દેખાડનારા માતા, પિતા, પુત્ર, પત્ની તે સાધુને શિક્ષા આપે છે કે – તમે દૂરદર્શી છો, સમજુ છો, અમારું પોષણ કરો, આવું ન કરીને તમે આલોક – પરલોક બન્ને બગાડો છો. તો અમારું પોષણ કરો. સૂત્ર– ૧૦૮. સંયમભાવ રહિત કેટલાક અપરિપક્વ સાધુ માત – પીતાદિ અન્ય વ્યક્તિમાંમાં મૂર્ચ્છિત થઈ, મોહ પામે છે, તેઓ | |||||||||
| Sutrakrutang | સૂત્રકૃતાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
श्रुतस्कन्ध १ अध्ययन-२ वैतालिक |
उद्देशक-१ | Gujarati | 108 | Gatha | Ang-02 | View Detail |
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Mool Sutra: [गाथा] अन्ने अन्नेहि मुच्छिया मोहं जंति ‘नरा असंवुडा’ ।
विसमं विसमेहि गाहिया ते पावेहिं पुणो पगब्भिया ॥ Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧૦૭ | |||||||||
| Sutrakrutang | સૂત્રકૃતાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
श्रुतस्कन्ध १ अध्ययन-२ वैतालिक |
उद्देशक-१ | Gujarati | 109 | Gatha | Ang-02 | View Detail |
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Mool Sutra: [गाथा] तम्हा दवि इक्ख पंडिए पावाओ विरएभिणिव्वुडे ।
पणए वीरे महाविहिं सिद्धिपहं णेयाउयं धुवं ॥ Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧૦૭ | |||||||||
| Sutrakrutang | સૂત્રકૃતાંગ સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
श्रुतस्कन्ध १ अध्ययन-२ वैतालिक |
उद्देशक-१ | Gujarati | 110 | Gatha | Ang-02 | View Detail |
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Mool Sutra: [गाथा] वेयालियमग्गमागओ मणवयसा काएन संवुडो ।
चिच्चा वित्तं च नायओ आरंभं च सुसंवुडे चरे ॥ Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧૦૭ | |||||||||
| Tandulvaicharika | तंदुल वैचारिक | Ardha-Magadhi |
अनित्य, अशुचित्वादि |
Hindi | 102 | Sutra | Painna-05 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] आउसो! जं पि य इमं सरीरं इट्ठं पियं कंतं मणुन्नं मणामं मणाभिरामं थेज्जं वेसासियं सम्मयं बहुमयं अणुमयं भंडकरंडगसमाणं, रयणकरंडओ विव सुसंगोवियं, चेलपेडा विव सुसंपरिवुडं, तेल्लपेडा विव सुसंगोवियं ‘मा णं उण्हं मा णं सीयं मा णं पिवासा मा णं चोरा मा णं वाला मा णं दंसा मा णं मसगा मा णं वाइय-पित्तिय-सिंभिय-सन्निवाइया विविहा रोगायंका फुसंतु’ त्ति कट्टु। एवं पि याइं अधुवं अनिययं असासयं चओवचइयं विप्पणासधम्मं, पच्छा व पुरा व अवस्स विप्पचइयव्वं।
एयस्स वि याइं आउसो! अणुपुव्वेणं अट्ठारस य पिट्ठकरंडगसंधीओ, बारस पंसुलिकरंडया, छप्पंसुलिए कडाहे, बिहत्थिया कुच्छी, चउरंगुलिआ गीवा, Translated Sutra: हे आयुष्मान् ! यह शरीर इष्ट, प्रिय, कांत, मनोज्ञ, मनोहर, मनाभिराम, दृढ, विश्वासनीय, संमत, अभीष्ट, प्रशंसनीय, आभूषण और रत्न करंडक समान अच्छी तरह से गोपनीय, कपड़े की पेटी और तेलपात्र की तरह अच्छी तरह से रक्षित, शर्दी, गर्मी, भूख, प्यास, चोर, दंश, मशक, वात, पित्त, कफ, सन्निपात, आदि बीमारी के संस्पर्श से बचाने के योग्य माना | |||||||||
| Tandulvaicharika | તંદુલ વૈચારિક | Ardha-Magadhi |
अनित्य, अशुचित्वादि |
Gujarati | 102 | Sutra | Painna-05 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] आउसो! जं पि य इमं सरीरं इट्ठं पियं कंतं मणुन्नं मणामं मणाभिरामं थेज्जं वेसासियं सम्मयं बहुमयं अणुमयं भंडकरंडगसमाणं, रयणकरंडओ विव सुसंगोवियं, चेलपेडा विव सुसंपरिवुडं, तेल्लपेडा विव सुसंगोवियं ‘मा णं उण्हं मा णं सीयं मा णं पिवासा मा णं चोरा मा णं वाला मा णं दंसा मा णं मसगा मा णं वाइय-पित्तिय-सिंभिय-सन्निवाइया विविहा रोगायंका फुसंतु’ त्ति कट्टु। एवं पि याइं अधुवं अनिययं असासयं चओवचइयं विप्पणासधम्मं, पच्छा व पुरा व अवस्स विप्पचइयव्वं।
एयस्स वि याइं आउसो! अणुपुव्वेणं अट्ठारस य पिट्ठकरंडगसंधीओ, बारस पंसुलिकरंडया, छप्पंसुलिए कडाहे, बिहत्थिया कुच्छी, चउरंगुलिआ गीवा, Translated Sutra: હે આયુષ્યમાન્ ! આ શરીર ઇષ્ટ, પ્રિય, કાંત, મનોજ્ઞ, મનોહર, મનાભિરામ, દૃઢ, વિશ્વસનીય, સંમત, બહુમત, અનુમત, ભાંડ કરંડક સમાન, રત્નકરંડકવત્ સુસંગોપિત, વસ્ત્રની પેટી સમાન સુસંપરિવૃત્ત, તેલપાત્રની જેમ સારી રીતે રક્ષણીય, ઠંડી – ગરમી – ભૂખ – તરસ – ચોર – દંશ – મશક – વાત – પિત્ત – કફ – સંનિપાત આદિ રોગોના સંસ્પર્શથી બચાવવા યોગ્ય | |||||||||
| Uttaradhyayan | उत्तराध्ययन सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-२७ खलुंकीय |
Hindi | 1070 | Gatha | Mool-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] न सा ममं वियाणाइ न वि सा मज्झ दाहिई ।
निग्गया होहिई मन्ने साहू अन्नोत्थ वच्चउ ॥ Translated Sutra: भिक्षा लाने के समय कोई शिष्य गृहस्वामिनी के सम्बन्ध में कहता है – वह मुझे नहीं जानती है, वह मुझे नहीं देगी। मैं मानता हूँ – वह घर से बाहर गई होगी, अतः इसके लिए कोई दूसरा साधु चला जाए। किसी प्रयोजनविशेष से भेजने पर वे बिना कार्य किए लौट आते हैं और अपलाप करते हैं। इधर – उधर घूमते हैं। गुरु की आज्ञा को राजा के द्वारा | |||||||||
| Uttaradhyayan | उत्तराध्ययन सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-२७ खलुंकीय |
Hindi | 1071 | Gatha | Mool-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] पेसिया पलिउंचंति ते परियंति समंतओ ।
रायवेट्ठिं व मन्नंता करेंति भिउडिं मुहे ॥ Translated Sutra: देखो सूत्र १०७० | |||||||||
| Uttaradhyayan | उत्तराध्ययन सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-२७ खलुंकीय |
Hindi | 1072 | Gatha | Mool-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] वाइया संगहिया चेव भत्तपाणे य पोसिया ।
जायपक्खा जहा हंसा पक्कमंति दिसोदिसिं ॥ Translated Sutra: जैसे पंख आने पर हंस विभिन्न दिशाओं में उड़ जाते हैं, वैसे ही शिक्षित एवं दीक्षित किए गए, भक्त – पान से पोषित किए गए कुशिष्य भी अन्यत्र चले जाते हैं। इन से खिन्न होकर धर्मयान के सारथी आचार्य सोचते हैं – मुझे इन दुष्ट शिष्यों से क्या लाभ ? इनसे तो मेरी आत्मा अवसन्न ही होती है। जैसे गलिगर्दभ होते हैं, वैसे ही ये मेरे | |||||||||
| Uttaradhyayan | उत्तराध्ययन सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-२७ खलुंकीय |
Hindi | 1073 | Gatha | Mool-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] अह सारही विचिंतेइ खलुंकेहिं समागओ ।
किं मज्झ दुट्ठसीसेहिं अप्पा मे अवसीयई ॥ Translated Sutra: देखो सूत्र १०७२ | |||||||||
| Uttaradhyayan | उत्तराध्ययन सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-२७ खलुंकीय |
Hindi | 1074 | Gatha | Mool-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] जारिसा मम सीसाउ तारिसा गलिगद्दहा ।
गलिगद्दहे चइत्ताणं दढं परिगिण्हई तवं ॥ Translated Sutra: देखो सूत्र १०७२ | |||||||||
| Uttaradhyayan | उत्तराध्ययन सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-२८ मोक्षमार्गगति |
Hindi | 1077 | Gatha | Mool-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] नाणं च दंसणं चेव चरित्तं च तवो तहा ।
एस मग्गो त्ति पन्नत्तो जिनेहिं वरदंसिहिं ॥ Translated Sutra: वरदर्शी जिनवरों ने ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप को मोक्ष का मार्ग बतलाया है। ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप के मार्ग पर आरूढ हुए जीव सद्गति को प्राप्त करते हैं। सूत्र – १०७७, १०७८ | |||||||||
| Uttaradhyayan | उत्तराध्ययन सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-२८ मोक्षमार्गगति |
Hindi | 1078 | Gatha | Mool-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] नाणं च दंसणं चेव चरित्तं च तवो तहा ।
एयं मग्गमनुप्पत्ता जीवा गच्छंति सोग्गइं ॥ Translated Sutra: देखो सूत्र १०७७ | |||||||||
| Uttaradhyayan | उत्तराध्ययन सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-२८ मोक्षमार्गगति |
Hindi | 1079 | Gatha | Mool-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] तत्थ पंचविहं नाणं सुयं आभिनिबोहियं ।
ओहीनाणं तइयं मणनाणं च केवलं ॥ Translated Sutra: उन में ज्ञान पाँच प्रकार का है – श्रुत ज्ञान, आभिनिबोधिक ज्ञान, अवधि ज्ञान, मनो ज्ञान और केवल ज्ञान। यह पाँच प्रकार का ज्ञान सब द्रव्य, गुण और पर्यायों का ज्ञान है, ऐसा ज्ञानियों ने कहा है। सूत्र – १०७९, १०८० | |||||||||
| Uttaradhyayan | उत्तराध्ययन सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-२८ मोक्षमार्गगति |
Hindi | 1080 | Gatha | Mool-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] एयं पंचविहं नाणं दव्वाण य गुणाण य ।
पज्जवाणं च सव्वेसिं नाणं नाणीहि देसियं ॥ Translated Sutra: देखो सूत्र १०७९ | |||||||||
| Uttaradhyayan | उत्तराध्ययन सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-२८ मोक्षमार्गगति |
Hindi | 1107 | Gatha | Mool-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] सामाइयत्थ पढमं छेओवट्ठावणं भवे बीयं ।
परिहारविसुद्धीयं सुहुमं तह संपरायं च ॥ Translated Sutra: चारित्र के पाँच प्रकार हैं – सामायिक, छेदोपस्थापनीय, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसम्पराय और – पाँचवाँ यथाख्यात चारित्र है, जो सर्वथा कषायरहित होता है। वह छद्मस्थ और केवली – दोनों को होता है। ये चारित्र कर्म के चय को रिक्त करते हैं, अतः इन्हें चारित्र कहते हैं। सूत्र – ११०७, ११०८ | |||||||||
| Uttaradhyayan | उत्तराध्ययन सूत्र | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-२८ मोक्षमार्गगति |
Hindi | 1108 | Gatha | Mool-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] अकसायं अहक्खायं छउमत्थस्स जिनस्स वा ।
एयं चयरित्तकरं चारित्तं होइ आहियं ॥ Translated Sutra: देखो सूत्र ११०७ | |||||||||
| Uttaradhyayan | ઉત્તરાધ્યયન સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-२७ खलुंकीय |
Gujarati | 1067 | Gatha | Mool-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] इड्ढीगारविए एगे एगेत्थ रसगारवे ।
सायागारविए एगे एगे सुचिरकोहणे ॥ Translated Sutra: સૂત્ર– ૧૦૬૭. કોઈ ઋદ્ધિનો ગારવ કરે છે, કોઈ રસનો ગારવ કરે છે, કોઈ સાતાનો ગારવ કરે છે. કોઈ દીર્ઘકાળ સુધી ક્રોધ કરે છે. સૂત્ર– ૧૦૬૮. કોઈ ભિક્ષાચર્યામાં આળસ કરે છે, કોઈ અપમાનથી ડરે છે. કોઈ સ્તબ્ધ છે. હેતુ અને કારણથી કોઈ અનુશાસિત કરાય છે તો – સૂત્ર– ૧૦૬૯. તે વચ્ચે જ બોલવા લાગે છે, આચાર્યના વચનમાં દોષ કાઢે છે અને વારંવાર | |||||||||
| Uttaradhyayan | ઉત્તરાધ્યયન સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-२७ खलुंकीय |
Gujarati | 1073 | Gatha | Mool-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] अह सारही विचिंतेइ खलुंकेहिं समागओ ।
किं मज्झ दुट्ठसीसेहिं अप्पा मे अवसीयई ॥ Translated Sutra: સૂત્ર– ૧૦૭૩. અવિનીત શિષ્યોથી ખેદ પામીને ધર્મયાનના સારથી આચાર્ય વિચારે છે – મને આ દુષ્ટ શિષ્યોથી શો લાભ ? આનાથી તો મારો આત્મા વ્યાકુળ જ થાય છે. સૂત્ર– ૧૦૭૪. જેમ ગળીયા ગર્દભ હોય, તેવા જ મારા આ શિષ્યો છે, એમ વિચારી ગર્ગાચાર્યએ તે આળસુ ગધેડા જેવા શિષ્યોને છોડીને દૃઢતાથી તપ – સાધનાને સ્વીકારી લીધી. સૂત્ર સંદર્ભ– | |||||||||
| Uttaradhyayan | ઉત્તરાધ્યયન સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-२७ खलुंकीय |
Gujarati | 1074 | Gatha | Mool-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] जारिसा मम सीसाउ तारिसा गलिगद्दहा ।
गलिगद्दहे चइत्ताणं दढं परिगिण्हई तवं ॥ Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧૦૭૩ | |||||||||
| Uttaradhyayan | ઉત્તરાધ્યયન સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-२८ मोक्षमार्गगति |
Gujarati | 1107 | Gatha | Mool-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] सामाइयत्थ पढमं छेओवट्ठावणं भवे बीयं ।
परिहारविसुद्धीयं सुहुमं तह संपरायं च ॥ Translated Sutra: ચારિત્રના પાંચ પ્રકાર છે – સામાયિક, છેદોપસ્થાપનીય, પરિહારવિશુદ્ધિ, સૂક્ષ્મસંપરાય અને અકષાય એવું યથાખ્યાત ચારિત્ર. તે છદ્મસ્થ અને કેવલી બંનેને હોય છે. જે ચારિત્ર કર્મના સંચયને રિક્ત કરે છે, તેથી તેને ચારિત્ર કહે છે. સૂત્ર સંદર્ભ– ૧૧૦૭, ૧૧૦૮ | |||||||||
| Uttaradhyayan | ઉત્તરાધ્યયન સૂત્ર | Ardha-Magadhi |
अध्ययन-२८ मोक्षमार्गगति |
Gujarati | 1108 | Gatha | Mool-04 | View Detail | |
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Mool Sutra: [गाथा] अकसायं अहक्खायं छउमत्थस्स जिनस्स वा ।
एयं चयरित्तकरं चारित्तं होइ आहियं ॥ Translated Sutra: જુઓ સૂત્ર ૧૧૦૭ | |||||||||
| Vyavaharsutra | व्यवहारसूत्र | Ardha-Magadhi | उद्देशक-४ | Hindi | 107 | Sutra | Chheda-03 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] आयरिय-उवज्झाए गिलायमाणे अन्नयरं वएज्जा–अज्जो! ममंसि णं कालगयंसि समाणंसि अयं समुक्कसियव्वे। से य समुक्कसणारिहे समुक्कसियव्वे, से य नो समुक्कसणारिहे नो समुक्कसियव्वे।
अत्थियाइं त्थ अन्ने केइ समुक्कसणारिहे से समुक्क-सियव्वे, नत्थियाइं त्थ अन्ने केइ समुक्कसणारिहे से चेव समुक्कसियव्वे।
तंसि च णं समुक्किट्ठंसि परो वएज्जा–दुस्समुक्किट्ठं ते अज्जो! निक्खिवाहि। तस्स णं निक्खिवमाणस्स नत्थि केइ छेए वा परिहारे वा।
जे तं साहम्मिया अहाकप्पेणं नो उट्ठाए विहरंति सव्वेसिं तेसिं तप्पत्तियं छेए वा परिहारे वा। Translated Sutra: आचार्य – उपाध्याय बीमारी उत्पन्न हो तब या वेश छोड़कर जाए तब दूसरों को ऐसा कहे कि हे आर्य ! मैं काल करु तब इसे आचार्य की पदवी देना। वे यदि आचार्य पदवी देने के योग्य हो तो उसे पदवी देना। योग्य न हो तो न देना। यदि कोई दूसरे वो पदवी देने के लिए योग्य हो तो उसे देना, यदि कोई वो पदवी के लिए योग्य न हो तो पहले कहा उसे ही पदवी | |||||||||
| Vyavaharsutra | व्यवहारसूत्र | Ardha-Magadhi | उद्देशक-४ | Hindi | 108 | Sutra | Chheda-03 | View Detail | |
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Mool Sutra: [सूत्र] आयरिय-उवज्झाए ओहायमाणे अन्नयरं वएज्जा–अज्जो! ममंसि णं ओहावियंसि समाणंसि अयं समुक्कसियव्वे। से य समुक्कसणारिहे समुक्कसियव्वे, से य नो समुक्कसणारिहे नो समुक्कसियव्वे।
अत्थियाइं त्थ अन्ने केइ समुक्कसणारिहे से समुक्कसियव्वे, नत्थियाइं त्थ अन्ने केइ समुक्कसणारिहे से चेव समुक्कसियव्वे। तंसि च णं समुक्किट्ठंसि परो वएज्जा– दुस्समुक्किट्ठं ते अज्जो! निक्खिवाहि। तस्स णं निक्खिवमाणस्स नत्थि केई छेए वा परिहारे वा।
जे तं साहम्मिया अहाकप्पेणं नो उट्ठाए विहरंति सव्वेसिं तेसिं तप्पत्तियं छेए वा परिहारे वा। Translated Sutra: देखो सूत्र १०७ | |||||||||